अपने अस्सीवें जन्मदिन पर विदेशी धरती पर इतने खुशनुमा इंतज़ामों को देख मां की आंखों में एक अद्भुत चमक और चेहरे पर असीम खुशी की लहर तिर आई, जिसे देख आभा अवर्चनीय खुशी से उमग उठीं। आज मां का इस पकी उम्र में विदेश यात्रा का सपना पूरा हुआ। और यह कमाल हुआ था उसकी अपनी बेटियों, अन्विति और अनुकृति के प्रयासों से।
वह स्वयं तो अपनी दोनों बेटियों के पास लंदन पिछले तीन वर्षों से आती रही है। एक दिन बातों-बातों में मां ने उससे कहा था, ‘मैं अब बहुत बूढ़ी हो गई, अनुकृति, अन्विति लंदन दस सालों पहले गई होतीं तो मैं भी परदेस घूम लेती। तेरे पापा ने तो इंडिया के इंडिया में ताजमहल तक नहीं दिखाया, कहती रह गई मैं।’
और बस तभी से आभा के दिमाग में यह बात रह-रह कर कुलबुला रही थी। क्या अस्सी वर्ष की उम्र में हर व$क्त जोड़ों के दर्द से कराहती मां आठ-नौ घंटों की लंबी हवाई यात्रा की परेशानी झेल पाएंगी? लेकिन जब उसने मां की इस इच्छा के बारे में एम.एन. सीज में उच्च पदों पर कार्यरत अपनी दोनों बेटियों को बताया था, उन्होंने तपाक से कहा था, ‘बस इतनी सी बात? नानी बिजनेस क्लास में लेटे-लेटे बड़े आराम से इतना लंबा सफर तय कर लेंगी।’ और उन दोनों ने मिल कर माह भर में तो उसकी एकोनोमी क्लास और मां की बिजनेस क्लास में टिकट करवा दी थी।
बेटियों को अपनी और मां की टिकटों पर एक बहुत बड़ी रकम खर्च करते देख एकबारगी को तो वह गहन अपराध भावना से भर गई थी, कि बेटियों का बहुत पैसा नाहक में ही घूमने-फिरने जैसी गैर जरूरी बातों में खर्च हो जाएगा। अपनी बेटियों से यह कहने पर अन्विति बोली थीं, ‘मम्मा, नानी ने सारी जिंदगी आप बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए होम कर दी। नानाजी की सीमित आय में अपनी हर छोटी-बड़ी इच्छाओं का गला घोंट उन्होंने आप पांच भाई बहनों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दी। आज आप और हम जिस मुकाम तक पहुंचे हैं, उसमें उनका भी महत योगदान है। तो आप यह गिल्ट मत पालो कि हमारा बहुत पैसा नानी पर खर्च हो जाएगा। बल्कि आप तो यह सोचो कि यह विदेश यात्रा उन्हें कितनी बेहिसाब खुशी देगी। अपनी इच्छा पूरी होने पर उनके चेहरे पर जो मिलियन डालर स्माइल आएगी, उसकी तुलना में ये रुपये कुछ भी नहीं।
बेटी की ये बातें सुन आभा कि आंखें नम हो आईं थी और भर आए गले से वह बोली थी, ‘सदा सुखी रहो मेरी बच्चियों, ईश्वर तुम्हें हर खुशी दे।’
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