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आखिरी पड़ाव-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: चढ़ने लगीं हूं उम्र की सीढियांबताओ हाथ थामोगे क्या ?जब हृदय में उमड़ने लगेंगी असंख्यभावनाएं, कुछ अनकही दबी हुई संवेदनाएं ,लड़खड़ाने लगेंगे कदमऔर खाने लगेगा अकेलापन ,उस मौन और एकांत में ,जब सब साथ छोड़ देंगेबताओ साथ निभाओगे क्या ?तर्क विवाद से कोसों दूर ,अंतर्मन के इस उन्माद को कोने में बांधकरउम्र के आखिरी […]

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यात्रीगण कृप्या ध्यान दें-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: एक आम यात्री की कहानी, जो हमेशा ध्यान देता रहता है… “यात्रीगण कृपया ध्यान दें!” यह वाक्य सुनते ही दिमाग में तुरंत स्टेशन की तस्वीर उभर आती है — प्लेटफॉर्म पर भागते लोग, चाय की केतली की सीटी, ट्रेन के इंजन की गुर्राहट, और ऊपर से लाउडस्पीकर पर किसी मीठी मगर भावहीन आवाज़ […]

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निशब्द-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: क्यूं ना हो जाओ तुम ‘निशब्द ‘जब भावनाओं का ज्वार फटने लगे,और मन पर ना रहे काबू ,तब ओढ़ लेना तुम मौन की चादर को ,और हो जाना ‘ निशब्द’ ।जब खुशियां दे दरवाजे पर दस्तक,तो उनका भी करना तुम स्वागत ,मुस्कुराकरऔर समेट लेना उन्हें भी ‘निशब्द ‘होकर।जब दिल टूटे ,और मन कहना चाहे, कुछ चीख-चीखकर […]

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ऐसी होती है पत्नी-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: थोड़ा नल खुला रह गयातो ऐसा बतायेंगीसारा नल का पानीऐसे ही बर्बाद हो जाता हैआज समझ आईटंकी का पानी खालीकैसे हो जाता हैमैं तो इतना उपयोग नहीं लातीपानी बचाने का काम करतीपर तुम से कुछ नहीं होगाइतने सालों से हमनेतुम्हारी इन्हीं हरकतों सेक्या क्या नहीं होगाऔर भइया उनको कितनी भी दो सफाईपर नहीं ये सुन पातीन जाने पूरे हमारे खानदान कोक्या क्या […]

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आप हो तो हर सुबह उजाला है-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: आपसे ही हर धड़कन में एक तराना है।आपसे ही तो सपनों को मुस्कान मिली।आपसे ही हर दर्द को जान मिली।ऐसा नहीं है कि मैं बिल्कुल खो सी गई।पर आपकी प्रेरणा से ही मैं संवर सी गई।प्रेम का मतलब आपसे ही जाना,हर रिश्ता आपने ही माना।आपके लिए ही तो ये संजना—संवरना है,आपसे ही तो […]

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”  परिवार “-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: एक निर्णय, एक निश्चय, एक अटल विश्वास हो ।छल छद्म,कपट, विद्रोह, विद्वेष का जहां निकास हो।सम्मान, निष्ठा और आत्म संतोष, अपनों का जहां विकास हो।एक हिस्सा जब रूठे तो मनाने कोसब एक साथ हो।जब कोई सदस्य छूटे तो जुड़ जाए वही प्रयास हो।त्याग और समर्पण की भावना का ही जहां निवास हो।सुख दुख […]

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सुनो—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: ये जो तुम शहद में डूबे हुए शब्दों सेप्रेम परोसते हो, नये तुम पुरुष ही कर सकते होऔर शायद इसीलिएनही समझ पाते स्त्री का प्रेम  स्त्री के लिए तो प्रेमएक एहसास है जिसे वह जीती हैहृदय की धड़कन सेसाँसो की सरगम तक ! इस बार आनातो इंतजार व मिलन केसपनों केअनगिनत बिम्ब उकेरे  हुएमेरी […]

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बचपन-गृहलक्ष्मी की क​विता

Hindi Poem: इक कोने में है पड़ा हुआसहमा सहमा डरा हुआशरारत करना भूल गयाआंखों पे चश्मा चढ़ा हुआ।।हालत इसकी खस्ता हैखुद से भारी बस्ता हैघुटकर दम तोड़ रहा अबबचपन कितना सस्ता है।।वो खेलकूद से दूर हुआन चाहते भी मजबूर हुआबड़ा बनाने के चक्कर मेबचपन चकनाचूर हुआ ।।चला ट्यूशन स्कूल से आयाहोमवर्क सारा निपटायाहैं आंखे नींद […]

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भावनाएं चालीस के बाद-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: चालीस के बादस्त्रियां थोड़ी जिद्दी हो जाती हैअपनी जिम्मेदारियां पूरी करने के बादथोड़ी बेफिक्र सी हो जाती हैअब थोड़ा समय खुद केलिए निकालने लगती हैअपने शौक अपनी ख्वाहिश जो दब चुके थेजिम्मेदारियां के तले..वह भी अब अपनी भावनाएं व्यक्त करना चाहती हैंउन्हें वह फिर से जीना चाहती है40 के बाद स्त्रियांथोड़ी जिद्दी हो […]

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औरत की दिनचर्या-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: औरत करती  कितने काम, बात भले ये लगती आम, तनिक नहीं मिलता आराम, काम चले बस सुबहो शाम,*दिनचर्या*की कर लो बात,  सम है उसके तो दिन रात,पाँच बजे से पहले जाग, पूरा दिन फिर भागमभाग । सबसे पहले करें स्नान, फिर देवों का हो सम्मान,बना पिलाती सबको चाय, वो ही सबकी नींद भगाय,फिर तो कामों […]

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