हाथी के दाँत

गृहलक्ष्मी की कहानियां- मेघना हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में मंच पर स्पीच दे रही थी, हिन्दी की ‘प्रवक्ता’ जो ठहरी और बहुत ही प्रतिभाशाली भी। उसकी स्पीच ने सबको उसकी ओर खींच लिया। चंद लाइनों ने तो सबका मन ही मोह लिया, जैसे- “हमें अपनी हिन्दी भाषा का सम्मान करना चाहिए, अंग्रेजी भाषा को अपने देश पर हावी ना होने दें, अपने बच्चों को भी भारतीय संस्कार दें, जैसे बड़ों का अभिवादन हिन्दी में करना। हाय-हेलो की जगह नमस्कार करना सिखाएं, हम भारतीय हैं, हमें अपनी मातृ भाषा हिन्दी में ही बात करना चाहिए।” और इसी प्रकार बहुत कुछ कहा उसने हिन्दी भाषा के सम्मान में। तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूँज उठा, बहुत वाह-वाही हुई और प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। हर किसी की जबान पर मेघना का नाम था, “मेघना जी! कितना अच्छा बोला आपने”, वाह आप तो छा गईं आज। तारीफों की जैसे बौछार सी हो चली। मेघना जब घर पहुंची  तो आठ बज गये थे, उसकी सासू माँ उसके दो वर्षीय बेटे को गोद मे लिए चाँद दिखा कर बहला रहीं थीं, “चंदा मामा प्यारे-प्यारे, साथ तुम्हारे लाखों तारे” अपनी ही लिखी पंक्तियाँ गा रही थीं।
मेघना पास आकर बेटे को हाथ में लेते हुए बोली,”क्या माँजी आप भी इतनी पढ़ी-लिखी होकर ये गा रही हैं, ये भी बड़े होकर ऐसे ही बोलेगा, और उसे अपनी गोद मे लेकर मेघना गाने लगी, “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार…।”  माँ जी ने उसे मिले पुरस्कार की तरफ देखा और व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ  बोली “बेटी तुमने वो मुहावरा सुना? हाथी के दांत…….”

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