सौदा—गृहलक्ष्मी की कहानियां: Sauda Grehlakshmi Story
Sauda

Grehlakshmi Story: “फिर से तुमने इश्क-मोहब्बत लिख दिया। ये सब क्या है.. कोई तो स्टैंडर्ड मेंटेन करो। 52 बरस की हो कर आधा इस्क… अरे! लिखना है तो उनके लिए लिखो जो उम्र के एक पड़ाव में आकर बच्चों के हाथों अपमानित होते हैं..कोई सामाजिक कहानी लिखो।”
आशा जी ने भले ही बड़े शहरों का रहन- सहन सीख लिया था परंतु भाषा अब भी वही थी। उनकी इस बात पर मेघा को तीन दशक पहले की वह औपचारिक चिट्ठी याद आ गई। जब राष्ट्रीय स्तर नेता की हत्या के कारण परीक्षा टल गई थी। बाद में परीक्षा की आकस्मिक उद्घोषणा होने पर उसके एक मित्र ने घर के पते पर पत्र लिखा था। उस वक्त पत्र जिसने भी खोला हो मगर पढ़ते ही वह मां को वही पत्र दिखाने गई तो उन्होंने हाथ मार कर ऐसे दूर फेंका था जैसे वह पत्र नहीं बल्कि साक्षात मेघा का आशिक हो या फिर कोई अपवित्र वस्तु हो जिसे हाथ लगाते ही उनका धर्म भ्रष्ट होगा और तब भी उनके मुंह से यही शब्द निकले थे कि नहीं पढ़नी है मुझे इस्क-मोहब्बत की चिट्ठी।
उनका इश्क़ को इस्क कहना आज भी उसे उतना ही नागवार गुजरा। स्वर में अजीब सी उग्रता और कड़वाहट थी जो मेघा बखूबी महसूस कर रही थी मगर उसे अपनी बात तो रखनी ही थी सो बोली,
“मां! सामाजिक कहानियां,कहानियां नहीं वरन जीवन की सच्ची घटनाएं होती है। उन्हें पढ़कर मन में कड़वाहट आती हैं,सहज नहीं रहा जाता।”

Also read : ” दहलीज पर खड़ी ख्वाहिशें”-गृहलक्ष्मी की कहानियां


“बिल्कुल बेबुनियाद बात है। हमारे उम्र के लोग जो जीवन का यथार्थ समझ चुके हैं वे लोग बस वही पढ़ेंगे। मेरी मानो तो वह लिखो जो जीवन की कड़वी सच्चाई है..इस्क मोहब्बत बस एक सब्ज़बाग है जिसका वास्तविक जीवन से कोई सरोकार नहीं और जो सच ही नहीं है उसे पढ़कर होगा क्या?”
उनके इसी प्रश्न ने मेघा के दिमाग में एक साथ सैकड़ों सवाल उठा दिए। एक ही विचार दिमाग में हिलोरें लेने लगा कि भला क्यों उन्हें प्यार से इतनी नफ़रत है। क्या उन्हें कभी किसी से प्यार नहीं हुआ? प्यार तो इंसान की सबसे बड़ी जरूरत है। वह इस बात को भला क्यों नहीं समझ पातीं! कुछ देर के मौन के बाद जब कुछ न सूझा तो बढ़कर पूछ ही लिया।

“मां! आम तौर पर लोग रोजमर्रे की जद्दोजहद में तकलीफ़ में बसर करते हैं। कहानी हो या सिनेमा उनमें प्रेम देखना चाहते हैं। उसे समझना चाहते हैं और महसूस करना चाहते हैं। उन्हें उदास कहानियां नहीं भाती बल्कि हर हाल में सुखांत प्रेम कहानियां पसंद आती हैं। क्या आपको कोमल प्रेम कहानियां बिल्कुल पसंद नहीं आतीं?” उनके बिगड़े मूड के बावजूद मेघा ने अपनी बात रखी मगर उन्हें ये सब न तो पहले और न ही उम्र के इस पड़ाव पर समझ में आया तो बस चिढ़ कर बोलीं।
“न किसी ने कभी मेरा मुंह देखा न ही मेरे सुंदरता की प्रशंसा की फिर मैं क्या जानूं ये सब है क्या..!”
दोष उनका नहीं उनकी परवरिश का था। इंसान जो पाता है वही लौटाता है। स्नेह व दुलार पाने की छोटी सी उम्र में उन्हें सजा मिली थी। स्कूल से घर आते हुए सिनेमा के पोस्टर पर उनकी नजर पड़ गई थी। घर आने पर स्वभावतन उन्होंने उसका जिक्र कर दिया,परिणामस्वरूप उन्हें ननिहाल यानी गांव भेज दिया गया था।
जहां पढ़ना हक़ नहीं फ़रियाद थी। पढ़ाई करने स्कूल जाने को घर के काम से बचने का बहाना समझा जाता था। उन्हें वहां कई तकलीफों का सामना करना पड़ा था। बिजली के अभाव में लालटेन जलाकर पढ़ना पड़ता। सुबह-सुबह स्कूल जाने के पहले ही बहुत से काम थमा दिए जाते। जब तक सारे काम खत्म न हो जाएं स्कूल जाने की इजाज़त नहीं होती। स्कूल से लौटकर आने पर कभी खाना मिलता तो कभी बर्तन धोकर खाने के लिए कहा जाता। ऐसा इंसान जिसके साथ इंसानियत तक न बरती गई हो उसका प्रेम कहानियों पर भड़कना जायज़ ही है।
“अच्छा मां ये बताओ! तुम्हें नाना तो प्यार करते होंगे।”
“नहीं! हमारे घर में प्यार का नाम लेना भी अपराध था। अच्छे महान लेखकों की आत्मकथाएं व उपन्यास पढ़ने दिया जाता जिनकी नायिकाएं कर्तव्यपरायण एवं त्यागमयी हुआ करतीं। ज्यादातर बड़ी बहन छोटे भाई- बहन का जीवन संवारने में अपना समग्र समर्पित कर दिया करतीं। मुझसे भी शायद उनकी यही उम्मीदें थीं।”
“और आपकी मां?”
“उन्हें अपने बेटों से प्यार था। छोटी बहन से अपने घर का काम और मुझसे अपने मायके में काम कराती रहीं। मां का प्यार तो पहली बार तब महसूस हुआ जब शादी होकर तेरे पिता के साथ आई।” छूटते ही बोलीं।
“तभी आप पापा से भी जुड़ नहीं पाईं। पहले बचपन में प्यार के लिए तरसाया गया। पढ़ाई करने के बदले आपको उनके मायके जाकर वहां के लोगों की सेवा करनी पड़ी और सोलह साल की उम्र में जब शादी हुई तब जाकर उनको आप पर लाड़ आया ताकि आप अपने परिवार की न हो जाओ बल्कि उनके मीठे बोल के लिए तरसती रहो!”
“ये सब तो तुम्हारी पीढ़ी का दोष है जो मां बाप में बस अवगुण देखना जानती है। हमारी पीढ़ी तो माता पिता को भगवान मानती थी। ऐसे भी जिसने जीवन दिया उसका अहसान तो है ही?”
“अहसान?”
“और नहीं तो क्या? लड़कों की पढ़ाई में खर्च किया जाता है और लड़कियों हिस्से के पैसे उनकी शादी में लगाकर अच्छे कुल से रिश्ता जोड़ा जाता है। जब उन्होंने मेरा जीवन संवारा तो मेरा भी धर्म है कि मैं भी उनके काम आऊं। अगर उनके या भाई बहन के कुछ काम आयी तो इसमें गलत क्या है।”
“जब तक उनके घर रही,सारा काम करती रही। पढ़ने के लिए भी परिस्थितियां प्रतिकूल थीं। किसी तरह गांव के स्कूल से मैट्रिक पास किया और शादी हो गई और ससुराल आकर भी उनकी ही एजेंट बनी रही। उनके बच्चों का ही हित सोचती रहीं। माफ़ कीजिए मां! यहां मुझे स्नेह व ममता नहीं सौदा नजर आ रहा है।” मेघा ने कहा तो उनकी आंखें फैल गईं।
“सौदा? कैसा सौदा?”
“जीवन से जीवन का सौदा…!”

“तुम्हारे पिता के घर में कौन सा कोई मुझे सिर पर बिठाए घूमता था। स्त्रियों का चाम नहीं काम ही देखा जाता था। ऐसे में मां के घर कम से कम मीठे बोल तो सुनने मिलते थे। यहां तो बस भूखे पेट सबके व्यंग्यवाण सुनते रहो…शायद यही वजह थी कि मैं बार बार मायके जाती रही। वहां अच्छा व्यवहार मिलता था। वो लोग जैसे भी हों पर प्यार करते थे।”
“और जब आपके सब भाई बहन सेटल हो गए तो लोग आपको भूल गए…?”
“हां शायद! मगर मां कहां भूलीं?”
“वो अपने जीते जी क्यों भूलेंगी? अभी भी आप उनके काम आती हो…!”
उनसे बातचीत ख़त्म होते- होते मेघा समझ चुकी थी कि उन्हें प्यार से इतनी नफ़रत क्यों है? जन्म देने वाले माता-पिता ने जिन्हें खुली हवा में जीने न दिया हो वो भला खुलकर जीना किसे कहते हैं कैसे समझ पातीं। उन्हें अधिकारों से नहीं वरन कर्तव्यों से जोड़ा गया था और वह अपने माता—पिता की दी हुई सीख के बदले आजीवन कर्तव्य निर्वाह करती रहीं। बचपन की घटनाओं का असर इतना गहरा था कि उम्र की ढलान पर आकर भी न बदल सकीं। उनके संस्कार परछाई की तरह आजीवन उनके साथ चलते रहे।