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कथा-कहानी

गृहलक्ष्मी की कहानियांअपने अधूरे सपनों को पूरा करने की चाहत हर इंसान में होती है। खुली आंँखों से सपने देखने वाले ही जिंदगी में कामयाब होते हैं। बंद आंखों के सपने तो मानो आंखे खुलते ही फना हो जाते हैं। ऐसे ही खुली आंखों से सपने देखने वाली लड़की थी मेघना। अपने मन में अपने सपनों को पूरा करने की चाहत लिए मेघना मन लगाकर एमबीबीएस की एंट्रेंस परीक्षा की तैयारी कर रही थी। मेघना अपने नाम के अनुरूप ही थी अपनी आंखों के समंदर में ढेरों मोती छुपाए हुए.. जो कभी भी जज्बात के साथ ही बिखर जाते थे ..!!पर वह हमेशा से ऐसी नहीं थी!!

एक बढ़िया फुटबॉल प्लेयर मेघना बहुत हिम्मती लड़की थी। बचपन से आज तक हर प्रकार की प्रतिस्पर्धा में और पढ़ाई में सदैव आगे रही थी! पर अकस्मात् एक हादसे ने मानो उसकी जिंदगी बदल दी और फिर उसने डॉक्टर बनने की ठान ली थी।

अपने घर के बगीचे में बैठी मेघना सुंदर फूलों से भरे पौधों को देख रही थी और मन ही मन प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी। हाथ में किताब लिए वो एंट्रेंस की तैयारी में भी लगी हुई थी।
‘कैसी चल रही है आपकी पढ़ाई? उसकी मां ने पूछा और वहीं बैठ गईं।
अपनी बेटी को देख वो बहुत प्रसन्न थीं,पर उन्हें आज भी याद आ रहा था वह दिन जब मेघना की हंसती खिलखिलाती जिंदगी में मानो ग्रहण लग गया था।
उस दिन जब वह अपने बीएससी के फाइनल ईयर के लास्ट पेपर के बाद घर लौट रही थी तो एक कार ने उसे टक्कर मार दी थी। मेघना मदद के लिये पुकार रही थी पर कोरोना के खौफ से उसकी मदद करने के लिए कोई आगे ही नहीं आ रहा था। पता नहीं कहां से अचानक कार आई और सड़क पार करती हुए मेघना को टक्कर मार के चली गई।
रश्मि जी याद करने लगी वह दिन जब वो पुलिस वालों की मदद से मेघना को लेकर अस्पताल भागी थीं, परंतु वहांँ तो और भी बुरा हाल था। कोविड 19 की वजह से इस कदर मरीजों की भीड़ से सारे अस्पताल भरे हुए थे कि कोई डॉक्टर इस तरीके के केस लेने को राजी नहीं था।
किसी तरीके से उन्होंने अपनी जान-पहचान के डॉक्टर से बात कर मेघना का इलाज शुरू करवाया था।

पूरा एक महीना लग गया था उसे अपने पैरों पर खड़े होने में।
पर उसे एक महीने ने बहुत कुछ सिखा दिया था उसे। अस्पताल में भर्ती हुए समस्त मरीजों का इलाज करते डाक्टरों के सेवा भाव को देखकर मेघना ने निर्णय लिया था कि वह भी एम.बी.बी.एस करके एक सफल डॉक्टर बनेगी और मानवता की सेवा करेगी।।
आज एंट्रेंस परीक्षा देकर अपने सपने को पूरा करने के दिशा में उसका यह पहला कदम था।
रश्मि जी अपनी बेटी को देख मुस्कुरा रही थीं। मेघना ने उनकी तरफ देखा फिर धीरे से बैसाखी के सहारे खड़ी होती हुई बोली,चलती हूँ मां मुझे बहुत पढ़ना है।
अपनी बेटी को दूर तक जाते हुए देखती रश्मि जी प्रार्थना कर रही थीं कि उसका सपना जल्द से जल्द पूरा हो।

मेघना अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में अपना पहला कदम बढ़ा चुकी थी। अब बस उसे इंतजार था उस समय का जब वह अपने सपने को पूरा करके एक कामयाब डॉक्टर बने और चाहे महामारी का कोई भी दौर हो वह मरीजों की सेवा कर सके।

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