कमियों से जूझता रहता है व्यक्ति। शायद ऐसा ही होना लिखा था भाग्य में। आॅंख बन्द करके भरोसा किया। तिनका -तिनका जोड़कर घरौंदा बनाया और एक ही झटके में सब खत्म। अच्छा होता जो चल रहा था मेरे पीछे। वो मैं न देखता। कम से कम सब ठीक होने का भ्रम तो बना रहता। लेकिन मेरी आंखों को ये देखना ही लिखा था शायद । सो मैंने देख लिया। देख लेने के बाद भी सहसा भरोसा नहीं हुआ। लगा कोई भयानक सपना हो लेकिन आंख खुली की खुली रह गई।
मेरे सामने मेरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। मेरा घर ऐसे गिरा जैसे तीव्र भूकम्प से कोई इमारत रेत के ढेर की तरह ढह जाती है। अब सिर्फ मकान रह गया था और मकान भी रहने लायक नहीं रह गया था। मन में आया कि गोली मार दूं दोनों को और फिर खत्म कर लूं स्वयं को भी। फिर बेटी का ख्याल आ गया। जी मैं आया कि खुद को खत्म कर सारा तमाशा ही खत्म कर लूं। जब मैं ही नहीं रहूंगा तो फिर क्या रह जायेगा मेरे लिए। बच्ची है तो मां पालेगी या कोई रिश्तेदार। कितने लोग बिना मां बाप के पलकर बड़े होते हैं। नहीं….नहीं….ये तो बच्ची के साथ अन्याय होगा।
मुझे देखकर दोनों पल भर के लिए घबराये। फिर बेशर्मो की तरह उन्होंंने स्वीकार कर लिया अपना गुनाह और इस गुनाह को नाम दिया प्रेम का। जी मैं तो आया कि कह दूं कि ये प्रेम नहीं धोखा है, पाप है, अनैतिकता है, चरित्रहीनता है। लेकिन चुप रहा। नग्न लोगों को नैतिकता के वस्त्र पहनाने का क्या औचित्य? विजय तो चला गया। वह तो बाहरी था। कुछ दिन का दोस्त था। लेकिन जिसके साथ शादी की। सात फेरे सात वचन, सात जन्मों तक जीने – मरने की कसमें खाई। उससे सिर्फ यही कहा-‘‘चली जाओ मेरे घर से। तुमनें सब कुछ बर्बाद कर दिया है। कोई सफाई नहीं। कोई सुलह नहीं। कोई माफी नहीं। तुम सारी हदें पार कर चुकी हो।”
उसने पूरी बेशर्मी से कहा-‘‘जाना तो मुझे था ही। आज नहीं तो कल। ये तो मैं जानती थी कि ये राज ज्यादा दिन तक राज नहीं रहेगा। लेकिन सोच रही थी पूरी तैयारी से एक ही बार निकलूं। वहीं से तलाक का कागज भेजूं। कल चली जाऊंगी। ” और वह दूसरे कमरे में चली गई। रात भर सोचता रहा कि क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में। मेरी जिम्मेदारी में। फिर बेटी का ख्याल आया जो इन दिनों गर्मियों की छुट्टी में अपने नाना-नानी के घर गई थी। क्या होगा उसका? अपनी मां के बारे में पूछेगी तो क्या उत्तर दूंगा मैं? लोगों से क्या कहूंगा? रात भर डर भी लगा रहा कि कहीं सोता पाकर मेरी हत्या न कर दे साधना। बहुत कुछ उसका हो सकता है। हत्या को दुर्घटना बनाने में कितना समय लगता है। थोड़ा सा दिमाग और पुलिस को रूपया खिलाना है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी तैयारी चल रही हो उसके मन में। लेकिन अचानक पकड़े जाने से योजना घटाई में पड़ गई हो। हो सकता हो कि कोई ऐसी योजना हो कि पकड़े जाने पर ऐसा कदम उठाएं दोनों मिलकर। कितनी घटनाएं घट चुकी हैं ऐसी। मेरे मरने पर ये मकान, सरकारी नौकरी, मेरी जमा पूंजी सब कानूनन उसी की तो होनी थी। मन में तो मेरे भी ख्याल आया कि ऐसी घटना को अंजाम दूं और हत्या करके विजय के सिर पर थोप दूं। लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ी।
काश ये सब सपना होता। लेकिन ये हकीकत थी। मुझे पूछने का हक था उससे कि उसने ऐसा क्यों किया? लेकिन जो कर चुकी थी उसके बारे में पूछने की कोई जरूरत नहीं समझी मैंने। कर तो लिया स्वीकार और कल जाने की तैयारी भी है। रात भर नींद नहीं आई। करवटें बदलता रहा। दिमाग में जमाने भर के विचार आते-जाते रहे। मेरे सोचने से कुछ होता तो ये क्यों होता जो हुआ और न जाने कब से चल रहा है? दूसरे कमरे से आती आवाजों से मुझे समझ में आ रहा था कि जाने की तैयारी हो रही है। दूसरा दिन होना था, हुआ किसके साथ क्या हो रहा है इससे समय को कोई फर्क नहीं पड़ता। समय अपने हिसाब से चलता है। दुनिया के दुखियारे लोग भाड़ में जाएं समय की बला से।
दूसरे दिन साधना अटैची लेकर मेरे सामने खड़ी थी। ‘‘मैं जा रही हूं। बेटी, मेरे माता-पिता के पास रहेगी। यदि आप न रख सको तो। मैं अपने माता-पिता को सब बता चुकी हूं। विजय मेरा पहला प्यार है। माता-पिता ने आपको जबरदस्ती बलि का बकरा बना दिया था। विजय दूसरी जाति का था। इस कारण उन्होंने जल्दबाजी में आपसे विवाह कर दिया। उस समय में विरोध करने की स्थिति में नहीं थी। इस साल बाद विजय बाजार में मिला तो दिल में दबा हुआ प्यार जाग उठा। इसी मोहल्ले में किराये से रहने लगा। मुझसे मिलने की खातिर तुमसे दोस्ती की, ताकि घर आ जा सके।
मेरे माता-पिता को मुझसे नफरत होगी, ये जानकर कि मैं शादी के बाद भी अपना प्यार न भुला सकी और तुमसे हमदर्दी । मुझे अपने किये पर कोई पछतावा नहीं। मुझे तुमसे कुछ नहींं चाहिए। न रूपया -पैसा न हिस्सा न हर्जा-खर्चा। लेकिन तलाक के कागज पर दस्तखत कर देना। विजय के पास बहुत पैसा है, जो उसने मेरे लिए ही कमाया है। ‘‘और अपना सूटकेस उठाकर वह चली गई। मैं सन्नाटे में खड़ा रहा।
इसके बाद मैं अपने ससुराल गया। सास-ससुर, साले ने जमकर अपनी बेटी को कोसा। उन्हें मुझसे पूरी हमदर्दी थी। मेरी बेटी मेरे साथ जाने के लिए रोये जा रही थी। अपनी मां को बार-बार पूछ रही थी। लेकिन मैं क्या उत्तर देता? मेरी सास ने उसे अपने सीने से लगाकर बहलाकर कहा -”तुम्हारी मां अमेरिका गई है ऑपरेशन के लिए। ठीक होते ही आ जायेगी।
सास ने मुझसे कहा-जैसे -जैसे बड़ी होगी। सब समझ जायेगी। जब इसे साथ रखने की इच्छा हो, तो ले जाना। तुम्हारी अमानत है मेरे पास। ‘‘मेरे साथ चलने की जिद करने पर मेरी सास ने समझा दिया कि पापा भी मम्मी के साथ जा रहे हैं। तुम्हें अभी नहीं ले जा सकते।” बेटी के लिए मन तड़प रहा था लेकिन मेरी खुद समझ में नहीं आ रहा था कि मैं खुद को कैसे संभालूं? मेरी स्थिति समझते हुए ससुर ने मुझे विदा करते वक्त कहा-”बेटा हो सके तो साधना से शादी को बुरा सपना समझकर भूल जाना। और कोई अच्छी लड़की मिले तो फिर से अपना घर बसा लेना। अपनी बेटी को जब चाहे आकर देख जाना। हम इसे अपनी जान से ज्यादा प्यार से पालेंगे।”
मैं बस में बैठा रास्ते भर सोचता रहा कि 10 वर्ष का वैवाहिक जीवन भूलना क्या इतना आसान है। इतना सरल है फिर से घर बस लेना। मासूम बेटी का चेहरा बार-बार मेरे सामने आ रहा था। किसको दोष दूं, समझ में नही आ रहा था। साधना के इस प्रेम प्रकरण में मुझे ही बलि का बकरा बनना था। सो मैं बनकर हलाल हो गया। मैं न होता कोई और होता। क्यों मां-बाप अपनी लड़कियों की शादी उनकी इच्छा के विरुद्ध कर देते हैं। अब उस घर में मेरे लिए रहना नामुकिन था। मुहल्ले वालों की न हमदर्दी चाहिए थी मुझे। न अफसोस। न ही मेरे विषय में चर्चा ही।
मैंने रातोंरात अपने आॅफिस के सहकर्मियों की मदद से घर का जरूरी सामान उठाकर शहर के दूसरे इलाके में मकान किराये पर ले लिया । इस बीच अपने ट्रांसफर की अर्जी भी लगा दी। और जो मकान मैंने बैंक से कर्जा लेकर अपना जी.पी.एफ. निकालकर बनवाया था। उसे एक ब्रोकर के माध्यम से सस्ते में बेच दिया। अपने सपनों का घर जिसे बड़े चाव से बनवाया था। एक-एक ईंट जिसकी अपने सामने रखवाई थी। उस मकान का मोह मिनटों में खत्म हो गया। साधना कहां गई थी? मुझे ये भी पता नहीं था। जानने की जरूरत भी नहीं समझी। तलाक के कागज पर हस्ताक्षर कर दिये। पहली पेशी में ही साधना ने मजिस्ट्रेट के सामने अपनी बात स्पष्ट रख दी। मैंने कोई विरोध नहीं किया। तलाक भी हो गया कानूनी रूप से और मेरा ट्रांसफर भी।
मैं यही सोचता रहता अक्सर। हालांकि मैं सोचना नहीं चाहता था। फिर भी दिमाग में यही बात आती रहती कि अपने पहले प्यार को दिल में रखकर कोई स्त्री दूसरे पति रूपी पुरूष के साथ इतना सहज जीवन कैसे जी सकती है। दस सालों में उसके हाव-भाव, बातचीत, विचारों से जरा भी प्रगट नहीं हुआ कि उसके दिल में कोई और है। मेरे साथ रहते हुए उसने पत्नी होने के सभी धर्म निभाये। ये भी हो सकता है कि वह विजय को भूल गई हो ओर अपने विवाह को ही अपना धर्म समझकर निभा रही हो। ये भी हो सकता है कि यदि विजय से दुबारा मुलाकात न होती तो शादी के पहले का प्यार फिर से न जागता। ये भी तो हो सकता था कि विजय को वह समझाती कि अब मैं शादीशुदा हूं, एक बच्ची की मां हूूं। तुम मुझे भूल जाओ। लेकिन ये सब आदर्शवादी बातें किताबों में ही अच्छी लगती हैं। प्यार के उफनते दरिया में अच्छे-अच्छे डूब जाते हैं। यदि यही सब मेरे साथ होता। मेरा कोई पहला प्यार होता तो मैं क्या करता? तलाक दे देता अपनी पत्नी को। छोड़ देता अपनी औलाद को, क्या पता? शायद हां, शायद नहीं। मैंने तो प्यार किया नहीं था। शादी की थी और शादी की भी हत्या कर चुका था प्रेमी जोड़ा ।
मैंने नागपुर ट्रांसफर करवा लिया था। एक छोटा सा फ्लैट खरीद लिया था। बेटी से मिलने जाता रहता इस बीच। लेकर इसलिए नहीं लाया, सोचा कि उमर है अभी शादी की शायद कहीं बात चले तो विचार किया जा सकता है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बेटी 8 वीं क्लास पास कर चुकी थी, हकीकत से वाकिफ हो चुकी थी। उसने मेरे साथ चलने की जिद की मैंने भी सोचा कि छोटे शहर में पढ़ाने से अच्छा है कि महानगर में पढ़े। मुझे भी सहारा हो जायेगा। मेरा भी मन लगा रहेगा। फिर बेटी को मां का प्यार नहीं मिला तो बाप के प्यार से क्यों वंचित रहे। नागपुर के अच्छे जूनियर काॅलेज में उसका दाखिला करवा दिया। बेटी पढ़ने में होशियार थी। दिखने में सुन्दर थी।
बेटी की उम्र जैसे-जैसे बढ़ रही थी। मुझे उसके भविष्य की, विवाह की चिन्ता हो रही थी। मेरी उम्र घटती जा रही थी। बेटी के घर में रहने से मेरा एकान्त मेरा दुख सब दूर होता गया। वह बिल्कुल मां की तरह मेरा ख्याल रखती थी। सुबह चाय, नाश्ता, आॅफिस जाते समय खाने का टिफिन और शाम को जब में दफ्तर से आता तो चाय तैयार मिलती। रात का खाना वह नौ बजे तक तैयार कर लेती। हफ्ते में एक दिन या अन्य अवकाश पर हम बाप-बेटी बाहर घूमने जाते। बाहर खाना खाते, शाॅपिगं करते। पिक्चर देखते । मैं सोचता कि किचन में बेटी का हाथ बंटा दूं तो वह मुझे डांटते हुए कहती” पापा, मेरे होते हुए आप किचन में, बिल्कुल नहीं। आप आराम से टीवी देखिये। ‘‘मैं कहता–‘‘बेटी घर का काम करती रहोगी। तो पढ़ोगी कब? तुम्हारा पढ़ाई का नुकसान होगा। ‘‘लेकिन वह कहती” पापा आप चिन्ता मत करो । मैं सब कर लूंगी। पढ़ाई में कोई शिकायत नहीं मिलेगी आपको। काॅलेज रोज जाती हूँ । कोचिगं जाती हूँ । रात में तीन-चार घंटे पढ़ लेती हूॅं।”
मुझे कई बार लगता कि शायद उसे लगता है कि उसके पापा के साथ धोखा हुआ है। अत्याचारर हुआ है। मैं कभी साधना कर जिक्र छेड़ता, तो वह नाराज होकर कहती -‘‘प्लीज पापा इस घर में उस औरत का नाम दुबारा मत लेना। वो अब हमारी कोई नहीं लगती।”
समय गुजरता रहा। बेटी समझदार थी। उसे मेरी आर्थिक स्थिति का पता था सो उसने मेडिकल या इंजीनियरिंग में दाखिला नहीं लिया। वह ले सकती थी उसके अच्छे नम्बर थे। मैं उसे कर्जा लेकर भी पढ़ाता । मैंने उससे कहा भी डाॅक्टर, इंजीनियर बनने के लिए। लेकिन उसनें कहा-”मैं ग्रेजुएशन के बाद सिविल सर्विस की तैयारी करूंगी। अफसर बनूंगी। ” और इस समय वह काॅलेज समाप्त करके आइ.ए.एस की तैयारी करने लगी। शहर का प्रतिष्ठित आई.ए.एस.कोचिगं कराने वाला इन्स्टीट्यूट भी उसनें ज्वाॅइन कर लिया।
मैं अक्सर सोचता कल जब शादी करके मेघा चली जायेगी तो मैं कैसे जियूंगा बेटी के बिना। लेकिन ये भी नियति है कि हर बेटी को एक दिन विदा होना होता है। नई दुनिया बसानी होती है। यही संसार का नियम है। मेघा आजकल कोचिंग से लेट आने लगी थी। मुझे चिन्ता होने लगी थी। उम्र ही ऐसी है। कहीं किसी के प्यार में तो नहीं पड़ गई। मैं सोचता रहा, क्या मेरा पूछना उचित रहेगा। एकदम से तो नहीं। मैंने घुमा फिराकर पूछा-”बेटी कोचिंग तो 7 बजे खत्म हो जाती हैं। तुम्हें आने में इतनी देर क्यों हो जाती है।” उसनें जबरन मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा-”पापा, कोचिंग के बाद भी हम डिस्कशन करते रहते हैं पढ़ाई को लेकर । लाईब्रेरी जाते हैं और……..”
बस, बस ठीक है। मैंने तो चिन्ता के कारण पूछा। आजकल कितनी उल्टी-सीधी खबर सुनने को मिलती है। तुम लेट होती हो तो मन घबराने लगता है।”
‘‘पापा, आप मेरी चिन्ता मत किया कीजिये। अपनी सेहत पर ध्यान दीजिये। कितने बूढ़े लगने लगे हैं आप।”
‘‘जवान बेटी का बाप बूढ़ा हो ही जाता है।”
‘‘ये सब पुरानी बातें हैं। आप अपना ख्याल रखिये। जरा रफ-टफ बनकर रहिये। बालों को डाई करिये। रोज शेविंग करिये। कभी-कभी फेशियल करवाइये। और कपड़े तो कितने पुराने जमाने के पहनते हैं आप। अब ये सब नहीं चलेगा। मेरी सहेलियों के पापाओं को देखो, लगते ही नहीं कि जवान बच्चों के बाप है। और आप पूरे दादाजी लगने लगे हैं। अगले रविवार को नये कपड़े और पार्लर चलेंगे।”
‘‘मैं क्या करूंगा पार्लर जाकर। ये तो महिलाओं के लिए है।”
‘‘अरे पापा, जेन्ट्स पार्लर चलेगे न। आप बहाना मत बनाइये। अभी से कह देती हूं। अगले रविवार हो जो मैं कंहू वैसा करना पड़ेगा। यदि नहीं करेंगे तो मैं समझूंगी कि आप अपनी बेटी से प्यार नहीं करते।”
‘‘ये क्या कह दिया बेटी तुमने। ” मेरी आॅंखों में आंसू आ गये।
‘‘नो इमोशनल, प्लीज पापा। आप चल रहे हैं मेरे साथ।‘‘ बेटी ने अधिकार पूर्वक कहा। मैं कुछ न कह सका। मैंने मेघा से संकुचाते हुए कहा-” बेटी, बुरा न मानों तो एक बात पूछू।
‘‘हाॅं पूछो पापा”
‘‘किसी से प्यार होगा। शादी करोगी। तो मुझे बताओगी। छोड़कर तो नहीं भाग जाओगी। ”मेरी आंखों में आंसू आ गये।
मेघा ने कहा-‘‘पापा, मैं आपका डर समझ सकती हूं, यदि ऐसा होगा तो सबसे पहले लड़के को आपसे मिलवाउंगी। आपकी इजाजत लूंगी। आपकी हां होगी, तभी बात आगे बढ़ेगी। वरना कैंसिल। और पापा मैं आपको छोड़कर कहीं जाने वाली नहीं हूं। ” बेटी ने मुझसे लिपटते हुए कहा। मेघा ने मेरी शंकाओं को तो निर्मूल नष्ट कर दिया था जो एक जवान बेटी के बाप को होती है। लेकिन उसके कोचिगं से विलम्ब से आने की बात मेरे गले नहीं उतर रही थी। ये भी ठीक था कि वह अपनी पढ़ाई में बहुत ज्यादा व्यस्त थी। रविवार को जेन्ट्स ब्यूटी पार्लर ले जाकर और जींस, टी-शर्ट पहनाकर जब उसने मुझे आइने के सामने खड़ा किया तो मैं खुद को न पहचान सका। मैं सफेद बाल, सफेद दाढ़ी वाला बुढ़ा अपनी उम्र से 20 वर्ष छोटा लगने लगा था।
मुझे ऐसा करना तो नहीं चाहिए था लेकिन मैंने ऐसा किया। एक दिन बेटी का मोबाइल चेक किया। उसके एस.एम.एस. पढ़े। कोई राज नाम का लड़का था जिससे मेघा की दोस्ती से कुछ ज्यादा सम्बन्ध थे। मुझे गुस्सा आया कि प्रेम में लोग इतने अन्धे क्यों हो जाते हैं कि शादी तोड़ देते हैं। बूढ़े, बाप को धोखा देते हैं। संदेह तो मुझे थोड़ा सा था पहले से ही था। जब कोचिगं से लेट होने की बात के उसनें कई उत्तर दिये थे। तो इतिहास फिर अपने आपको दोहरायेगा। पहले मां छोड़कर चली गई किसी के प्यार में और अब बेटी भी उसी नक्शे कदम पर है।
रविवार का दिन था। मेरी तबीयत कुछ खराब थी। मेघा घर का राशन लेने बाहर गई थी। मैं मेघा के विषय में सोचकर अन्दर ही अन्दर टूट रहा था। तभी दरवाजे की घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला। एक खूबसूरज नौजवान लड़का द्वार पर खड़ा था। उसनें मुझसे नमस्ते की अपना परिचय दिया। नाम सुना सा लगा। ” कहिये क्या काम है? मैंने पूछा।
‘‘सर, आपसे ही मिलने आया हूं।”
‘‘मुझसे, मैं तो तुम्हें नहीं जानता।”
‘‘सर, मैं मेघा के साथ कोचिंग में पढ़ता हूं।
ओह, अब मुझे ध्यान आया। ये वही राज है। मेघा के मोबाइल में इसी का नम्बर और एस. एम. एस. में प्यार भरी बातें।
‘‘अन्दर आओ।” मैंने कहा। वह अन्दर आ गया। ” बैठो ” मैंने कहा। वह सोफे पर बैठ गया।
‘‘मेघा तो घर पर नहीं है। ” मैंने कहा और सोचा यही है मुझसे मेरी बेटी को छीनने वाला। शादी की बात करने के लिए आया होगा मना करूंगा तो भगाकर शादी करने की धमकी देगा हो सकता है मेघा ने ही इसे भेजा हो।
‘‘सर, मुझे आपसे ही बात करनी है। ” उसने कहा।
‘‘मुझसे क्या बात करनी है? मैंने कहा।
‘‘सर, मेरी समस्या आप ही सुलझा सकते हैं। ” राज ने दयनीय भाव से कहा।
‘‘साफ-साफ कहो। क्या कहना चाहते हो।” मैंने आवेश में कहा।
‘‘सर, मैं मेघा से शादी करना चाहता हूं लेकिन मेघा की एक शर्त है और एक आप्शन भी कि मैं घरजमाई बन जाऊं। उसका कहना है कि वह अपने पापा को इस उम्र में अकेला नहीं छोड़ सकती।” मेरा सीना गर्व से फूल गया। मेरी बेटी मेघा इतना सोचती है मेरे बारे में। राज ने आगे कहा-‘‘सर, मैं मेघा से प्यार तो करता हूं लेकिन घर जमाई नहीं बन सकता। क्योंकि आई.ए.एस. में मेरा चयन हो गया है। मुझे 10 दिन के अन्दर ज्वाइन करना है।
एक बार फिर मेरा सीना गर्व से तन गया। एक आईएएस. अधिकारी मेरी बेटी से शादी करना चाहता है। ” सर, आप्शन ये है कि मेघा और मैं जिस कोचिंग में पढ़ रहे हैं उसमें अंग्रेजी पढ़ाने वाली 50 वर्षीय मैडम वर्षा जो देखने में स्मार्ट, दुबली पतली अच्छे विचारों की हैं। शरीर से स्वस्थ है लेकिन अकेली हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उनका विवाह नहीं हो पाया। मेघा को वे अपनी बेटी की तरह मानती हैं। इस समय वे बिलकुल अकेली हैं। मेघा और मैं उनके घर जाकर कोचिगं के बाद स्पेशल ट्यूशन लेते हैंं अंग्रेजी की। वे अपने लिए अच्छा सा जीवन साथी ढूंढ रही हैं और मेघा और मैंने उन्हें शादी के लिए मना लिया है। उन्हें आपके बारे में भी पूरी जानकारी दी है।
अगर आप हां कर दो तो……….मेघा ने आप्शन में यही रखा है कि आपका विवाह उनके साथ हो जाए तो वो मुझसे शादी तुरन्त कर लेगी।
राज चला गया और मैं भौचक्का सा रह गया। मेघा जैसे ही बाजार से आई। मैं उसपर भड़क गया। ” जब इतना अच्छा आई.ए.एस. आधिकारी शादी के लिए तैयार है तो फालतू की शर्ते क्यों रख रही हो।”
‘‘आप शादी करेंगे या नहीं” मेघा ने पूछा।
‘‘नहीं” मैंने दो टूक उत्तर दिया।
‘‘तो मैं भी नहीं करूंगी। मैं इस उम्र में आपको अकेला नहीं छोड़ सकती।”
मेरी बेटी मेरे बारे में इतना सोच रही है और मैं उसके कोचिंग से लेट आने के बारे में जाने क्या-क्या सोचता रहता था। ये तो पहले बाप-बेटे में बहस होती थी कि हमने लड़की पसंद कर ली है। अच्छे घर की है। शादी वहीं करनी पड़ेगी। जहां हम चाहेंंगे और लड़का कहता था नहीं, मुझे नहीं करनी शादी।
‘‘मेरी शादी की उम्र है ये। लोग सुनेगें तो हंसेंगे। ” मैंने मेघा को समझाते हुए कहा।
‘‘लोगों ने आपकी कब फिक्र की? जो आपको लोगों की चिन्ता है। फिर आजकल किसे फुर्सत है दूसरे के बारे में सोचने की? लोग चार दिन बात करेंगे और भूल जायेगें। फिर मैडम वर्षा समझदार स्वस्थ, अच्छे विचारों की महिला हैं। उन्हें समझने, मनाने में 4 माह लग गये। आप चाहते हैं कि मैं शादी करूं तो आपको ये शादी करनी पड़ेगी। ‘‘बेटी ने अपनी बात स्पष्ट रखी।
‘‘एक बात बता बेटी। मैं तेरा बाप हूं या तू मेरी मां है। ‘‘मैंने लाड़ से पूछा । ” इस समय तो मैं आपकी मां हूं पापा और बेटी अपने पापा की मां भी होती है। ” बेटी की बात सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गये।
‘‘लेकिन बेटी…
‘‘एक बार मिल तो लो वर्षा जी से”
और मेरी जिद्दी बेटी मेरे लाख मना करने के बाद भी राज के साथ मुझे वर्षा जी के घर ले गयी। हम दोनों को अकेला छोड़कर मेघा और राज बाहर चले गये। हम दोनों काफी देर चुप बैठे रहे। एकदूसरे के तिरछी नजर से देखते रहे। अन्त में मैंने कहा-‘‘अगर आप तैयार है तो मैं भी तैयार हूं। लेकिन इस उम्र मे आप घर के काम कैसे कर पाएंगी।
‘‘जैसे अभी अपने लिए करती हूं। दोनों वक्त खाना और चाय, नाश्ता तो बना ही सकती हूं। शेष काम मिलकर करलेगें। ” वर्षा मैडम ने कहा।
‘‘मुझे मंजूर है ये रिश्ता”
‘‘मुझे भी”
फिर बहुत तेजी से ये हुआ कि मेरी और वर्षा जी की शादी आर्य समाज में मेरी बेटी मेघा, राज और मेरे विभाग के कुछ लोगों ने सम्पन्न करवा दी। अब हमारी बेटी की बारी थी। मैंने और वर्षा ने, हम पति-पत्नी ने राज और मेघा की शादी धूमधाम से सम्पन्न करवाई।
मेरी बेटी मेघा ने पहले अपने पिता का घर बसाया। अपने लिए मां लाई या अपने अपने उम्रदराज पिता को बेटा समझकर घर में बहू लाईं। दोनों ही बातें सही थी अपनी जगह।
राज कलेक्टर बना और कुछ समय बाद मेघा पुलिस अधीक्षक बन गई। पुलिस अधीक्षक बनते ही मेरी बेटी का पहला कारनामा समाचार पत्रों में छपा। नकली नोटों के कारोबार में साधना राय नाम की औरत को गिरफ्तार कर लिया। उसके पति विजय राय का कहना था कि नकली नोटों के कारोबार से मेरा कोई लेना-देना नहीं। सारी अवैध गैरकानूनी काम और सम्पति, बैंक में जमा रकम साधना राय के नाम से थी। अखबार में फोटो देखकर मैं समझ गया कि ये मेघा की मां मेरी….
‘‘मैंने मेघा को फोन लगाकर कहा-”जानती हो कौन है साधना राय?
‘‘हां, जानती हूं। पहले परिवार की दुश्मन, समाज की दुश्मन और अब कानून की दुश्मन। जिसके लिए उसने अपनी बेटी, अपना पति छोड़ा आज उसी ने अपने सारे गैरकानूनी धंधे उसपर थोप दिये और भाग गया विदेश।” मेघा ने कड़कती सी आवाज में कहा।
‘‘क्या उसने भी तुम्हें पहचान लिया।
‘‘हां, माफी मांग रही थी मुझसे और आपसे भी। लेकिन वो आपका अतीत था एक काला अतीत। आप अपनी नई जिन्दगी जियें। फालतू और बेकार लोगों में अपना समय खराब मत करें। अब वर्षाजी आपकी पत्नी है और मेरी मां। प्लीज इस विषय में दोबारा बात मत करना पापा।
बेटी ने इस भाव और अधिकार से डांटा कि मुझे लगा मेरी बेटी नहीं, मां डांट रही हो और मां की बात अच्छे बच्चे नहीं टालते।
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