अपने अधिकारी के प्रति वह इतनी दीवानी हो चुकी थी कि हर बात में मिस्टर यादव ही आते थे। वही उसके सब बने जा रहे थे। उन्हीं के ख्यालों में खोई रहती थी मेरी पत्नी। ख्वाब भी उन्हीं के देखती होगी।
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गृहलक्ष्मी की कहानियां : दंगे वाली दुल्हन
मेरे दर्द से आपा का दर्द कुछ कम नहीं था, मगर मैं क्या करूं…? जिस दर्द को मैं भूलना चाहती थी, उसे कोई मुझे भूलने ही नहीं देता।
एक और पापा आए थे…
बात उन दिनों की है, जब मैं ढाई- तीन साल की थी। तब मैं अपनी मम्मी को तो मम्मी ही पुकारती थी, लेकिन पापा या किसी भी जेंट्स को पापा कह दिया करती थी। मैं मम्मी के साथ दुकान, मार्केट, लिफ्ट, प्लेग्राउंड आदि जहां भी जाती तो सभी मेल मेम्बर को पापा पुकारने लगती। मां बहुत इम्बेरेसिंग फील […]
गृहलक्ष्मी की कहानियां – पाषाण हृदय
गृहलक्ष्मी की कहानियां – मैंने पत्नी से कहा कि पुरुष पाषाण हृदय वाला हो सकता है पर नारी पाषाण हृदय नहीं हो सकती ‘‘नीलिमा दीदी की बात भूल गए क्या? पत्नी ने पूछा” अरे हां उन्हें तो भूल ही गया। पूरी घटना याद आ गई। उनकी बेटी ममता का विवाह था। पंडाल सजा हुआ था, […]
आइब्रो का मुंडन
बात है पुरानी लेकिन मन की गहराई में उतर कर आज भी मुझे गुदगुदाती है। मेरी उम्र होगी आठ या नौ साल, बचपन में नानी-मामा के यहां अपरिहार्य कारणों से रही। एक दिन मेरे मामाजी शेव करके ब्रश साफ करने बाथरूम गए, रेजर में ब्लेड लगा हुआ था। जब मामाजी शेव कर रहे थे, मैं उनको बहुत गौर से […]
मम्मी पापा की चटनी बना रही हैं
मैं छह सात साल का था। मेरे पापा को खाने के साथ अदरक धनिये की चटनी बहुत पसंद थी। एक दिन भी अगर मम्मी चटनी नहीं बना पाती तो पापा सारा घर सर पर उठा लेते थे और मम्मी को डांटते हुए कहते, ‘तुम्हारे पास इतना भी समय नहीं रहता कि तुम चटनी बना सको, […]
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई
यह किस्सा 3 साल पुराना है मैं अपने परिवार के साथ वैष्णोदेवी दर्शन करने के लिए गई थी। मैं वहां पहले नहीं गई थी और न कोई अनुभव था और न ही कोई विशेष जानकारी। मेरे पति ने सुझाव दिया कि यदि हम पैदल जाने की वजह टटटू पर जाएं, तो जल्दी दर्शन कर जल्दी […]
चोटी में डोरी फंसाकर खिड़की से बांध दी
बात तब की है जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ रही थी। मैं अपने ननिहाल में रहती थी। नानी जी एक दिन दोपहर में चारपाई पर लेटी और सो गई। मैंने उनके खुले बाल की चोटी बनाकर उसमें डोरी फंसाकर खिड़की से बांध दिया। और कमरा बंद करके बाहर चली गई। जब मैं बच्चों के […]
अच्छे दिन आएंगे
बचपन में अक्सर पिताजी भाई से कहा करते थे, ‘पढ़ोगे-लिखोगे तो अच्छे दिन आएंगे। उस समय मैं सोचती थी, अच्छे दिन का पढ़ाई से क्या मतलब है। तभी मेरे बड़े भैया ने पढ़-लिख कर अच्छी सी नौकरी कर ली। इसके बाद उनकी शादी के लिए बात चलने लगी तो मुझे लगा कि इसे ही कहते हैं अच्छे दिन। एक […]
घर की लक्ष्मी – गृहलक्ष्मी कहानियां
माया को उसके सास-ससुर बात-बात पर ताने मारते। उसका पति तो उसे अधिक दहेज न लाने के कारण रोज तानों के साथ-साथ थप्पड़-मुक्के भी मारने लगा। माया की सुबह गलियों से शुरू होती और शाम लात-घूसे लेकर आती। ये सब सहना तो माया की अब नियति बन गया था। रोज-रोज की दरिंदगी को सहते-सहते माया के आंसू सूख चुके थे…
