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मां तो बस मां ही होती है – गृहलक्ष्मी कहानियां

निहाल के आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसकी दो साल की बेटी नेहा उसकी गोद में बैठी टुकुर टुकुर उसकी और देख रही थी। पास ही कुसुम निर्जीव सी फर्श पर जड़ पड़ी थी, न कुछ बोल रही थी और न ही उठ रही थी। थोड़ी देर पहले तक सब ठीक था।

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नाबालिग अपराधी – गृहलक्ष्मी कहानियां

मनोज अमीर माँ बाप का इकलोता बेटा था। घर में किसी चीज़ की कमी न थी उसकी हर जिद्द पूरी की जाती थी। उसके पिताजी की कई फैक्टरियां थी। उनकी इच्छा थी कि मनोज बडा होकर उनका कारोबार सम्भाले, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बचपन से ही मनोज का मन पढाई में नहीं लगता था । सारा दिन पार्क में खेलना,मौज मस्ती करना ही उसे अच्छा लगता था ।

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मेरी पहचान – गृहलक्ष्मी कहानियां

काश, मैं भी इन लोगों की तरह ज्यादा पढ़ लिख लेती तो मैं भी कुछ होती। मेरी भी कोई अपनी पहचान होती। ऐसा मज़ाक न बनता मेरा। पर आगे पढ़ती भी तो कैसे। दसवीं के बाद से ही पिताजी को मेरी शादी की चिंता होने लगी थी। मैं आगे पढ़नी चाहती थी। पर गांव में कोई स्कूल भी तो नहीं था दसवीं के बाद पढ़ने के लिए।

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डर सबको लगता है – गृहलक्ष्मी कहानियां

सुबह की खिलती धूप चारों तरफ फैली हुई थी। गायत्री खिड़की के पास खामोश बैठी शून्य में कुछ निहार रही थी। तभी उसकी निगाहें सड़क पार गिफ्ट हाउस में आते-जाते ग्राहकों पर पड़ी। गायत्री जब भी डिप्रेशन में होती तो सामने वाली शाॅप की तरफ देखती और सोचती कि इसमें आने-जाने वाले लोग किसी-न-किसी के लिए कोई उपहार खरीद रहे हैं और तब उसे लगता है कि दुनिया में आज भी प्यार भरा हुआ है।

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