सुनसान सड़क पर तीस वर्षीय मीनाक्षी हल्की बारिश में भीगते हुए चली जा रही थी। भीगने से उसके सारे कपड़े तर हो चुके थे और उसके बदन से चिपके जा रहे थे। उसने अपना दुपट्टा थोड़ा और फैला कर डाल लिया और सि मटी सहमी सी आगे बढ़ती रही।
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मिलियन डालर स्माइल – गृहलक्ष्मी कहानियां
हैपी बर्थडे टू यू मां, मे गॉड ब्लेस यू…’
पार्श्व में बजते संगीत के मध्य आभा अपनी अस्सी वर्षीय वयोवृद्धा मां को सहारा देते हुए लंदन के फाइव स्टार होटल में लाल गुलाबों, जलती हुई सुगंधित मोमबत्तियों और मां-पापा के बड़े-बड़े पोस्टरों से सजे डाइनिंग हाल में ले जा रही थीं।
फोन की घंटी लगातार बज रही थी – गृहलक्ष्मी कहानियां
फोन की घंटी लगातार बज रही थी। आज एकता ने सोच लिया था कि फोन नहीं उठाना है। सारा दिन फोन के ताने सुन-सुनकर उसके कान पक गए। जब मैं काम करती हूं तो कोई नहीं देखता मुझे।
उधार वाले खिस्को – गृहलक्ष्मी कहानियां
आज भोगीलाल जी मिले तो उनके रंग-ढंग निराले थे। हाथ में गोल्डन घड़ी। गले में गोल्डन चेन। आंखों पर गोल्डन चश्मा। गोल्डन मोबाइल। गोल्डन चेन से बंधा गोल्डन पट्टे वाला गोल्डन रिट्रीवर। छोटे-मोटे बप्पी लाहड़ी नज़र आ रहे थे अपने भोगी भाई। मैं चौंक गया। सामान्य सी नौकरी करने वाला व्यक्ति अचानक इस भेष में? और आज वो मुझसे मिले बिना ही निकले जा रहे थे। मुझे आवाज़ देकर बुलाना पड़ा।
सर दर्द है मिस्टर पॉजिटिव – गृहलक्ष्मी कहानियां
भाई साहब मैं तो अपने पड़ोस में रहने वाले मिस्टर पॉजिटिव से बड़ा परेशान हूं। पता नहीं वह अभी तक आप से मिले हैं या नहीं, अगर नहीं मिले हैं, तो मैं दुआ करता हूं कि आपकी उनसे मुलाकात न ही हो तो अच्छा है।
किराए का घर
रानीगंज गांव का बलदेव एक छोटा-सा किसान है। उसके पास लगभग दो एकड़ की खेती है। अनाज की पूर्ति उसे अपने खेतों से हो जाती है और रोजमर्रा की जरूरतों को रोजी-मजदूरी कर पूरी करता है।
एक तरफ उसका घर – गृहलक्ष्मी कहानियां
कान में इयरफोन लगाना, दुनिया को सुनने से इनकार कर देना है। तमाम अनपेक्षित, अवांछित आवाज़ों से खुद को काट लेना है।
लत – टीवी के तेज़ होते वॉल्यूम
टीवी के तेज़ होते वॉल्यूम के साथ बहू माला के डांटने का स्वर गूंजा तो बाबूजी की नींद भी उचट गई। अब फिर से नींद नहीं आने वाली, सोचकर उन्होंने तकिए के नीचे से अमृता प्रीतम की ‘सात सौ बीस कदम’ निकाली और सहारा लेकर बैठ गए। नजरें स्वत: ही समीप लेटी पत्नी वसुंधरा की ओर घूम गई।
प्रारंभ का अंत – गृहलक्ष्मी कहानियां
वीरेंद्र शान्त खड़ा था, अचला कह रही थी – – मैंने तुम्हे कभी प्यार नहीं किया था, तुम्हारी तरफ देख क्या लिया ,तुम-से बात क्या कर ली- – तुमने उसे प्यार समझ लिया? और मुझे बदनाम कर बैठे।
मृत्यु गीत
“मम्मी ,काकी अभी तक नहीं आईं?”अकुलाकर द्वार की ओर
देखते हुये मुदिता ने कहा.
वह कबसे सजी संवरी सहेलियों के साथ बैठी थी.पड़ोस की औरतें साड़ियों
