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कथा-कहानी

मैंने पूछा, ‘भाई ये चक्कर क्या है, क्या चमत्कार है? अचानक से ये काठ का उल्लू सोने की चिड़िया कैसे बन गया?’ 

‘पार्टटाइम बिज़निस शुरू किया है प्रिय!’ भोगी जी ने बताया।

‘पार्ट टाइम? ये पार्टटाइम तो फुलटाइम से ज़्यादा मजे दे रहा है। भाई! कौन सा बिज़निस है?’ 

‘लोन लेने का।’ भोगी भाई ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

‘लोन लेने का?’ मैं चौंक पड़ा। ‘अच्छा मतलब लोन एजेंट बन गये हो!’ मुझे लगा मैं समझ गया हूं। 

‘नहीं प्रिय! लोन एजेंट नहीं, लोन लेने का। मैं लोन लेता हूं, अलग-अलग जगहों से।’ भोगी ने स्पष्ट किया। 

‘ये कौन सा व्यापार है भाई, पहली बार सुन रहा हूं? इसका आईडिया कहां से मिला?’

‘अरे बड़ा शानदार व्यापार है प्रिय! मैं तो कहता हूं, भारत में लोन लेने से बेहतर कोई उद्योग नहीं है। इसका आईडिया मुझे पुत्तन से मिला।’ 

‘कौन, वो पुताई वाला पुत्तन?’

‘हां प्रिय! एक बार पुत्तन ने हज़ार रुपये उधार लिये। बोला तीन दिन में देता हूं। उधार देने वाला तीन दिन को तीन महीने मान कर चलता है और उधार लेने वाला तीन दिन को तीन जनम। ये बात मुझे पुत्तन से उधार वापस मांगते व$क्त समझ आई। पुत्तन टहलाता रहा। फिर एक दिन पुत्तन ने फोन लगा कर मुझे गन्दी-गन्दी गालियां दीं। तब एक बात और समझ आई।’

‘क्या?’ मैंने पूछा।

‘उधार देने वाले से बड़ा संत कोई नहीं है। उधार देने वाला धैर्यवान, दयावान, उदार, क्षमाशील होता है। वह लाभालाभ की चिंता करता हुआ, सुख-दुख और जयाजय में समान रह कर, उधार वसूली के इस युद्ध में उतरता है। अपने उधारी के रुपये के सिवाय वह प्रत्येक वस्तु के प्रति निर्मोही होता है। छोटा-मोटा स्थितप्रज्ञ प्रकार का। जब पुत्तन मुझे गालियां दे रहा था तब मैं खुद को समझा रहा था कि शांत भोगी, शांत रह, अपने को उधारी निकालनी है। महात्मा बुद्ध की तरह मैंने पुत्तन से कहा कि हे पुत्तन! मैं तुम्हारे द्वारा दी जा रही गालियों को लेने से अस्वीकार करता हूं।’

‘फिर?’

‘फिर मैंने नई सड़क पर प्राप्त पुत्तन के लात-घूसों, रहपटों को भी लेने से इनकार कर दिया।’

‘फिर, उधारी मिली वापस?’

‘फिर एक दिन मैं अपनी सेना के साथ युद्ध करने पुत्तन के घर जा पहुंचा। पुत्तन घर से बाहर निकला और…

‘और…’

‘और अपनी ही गली में दिगम्बर हो कर बोला कि लो नहीं है मेरे पास पैसे! जो उखाड़ पाओ वो उखाल्लो! हमने पुत्तन को एक तौलिया खरीद कर पहनाई। और पूरी विनम्रता से कहा, ‘कोई बात नहीं पुत्तन भाई। अभी आप तनाव में दिखते हैं, हम कल फिर आ जाएंगे। और स्वयं की संतुष्टि के लिए उसकी तौलिया से एक धागा उखाड़ लाये।’

‘फिर, उधारी मिली वापस?’

‘फिर हम थानेदार साहब के पास गये। थानेदार साहब को बताया कि पुत्तन के पास हमारे एक हज़ार रुपये फंसे हैं, अगर आप निकलवा दो तो पांच सौ आपके।’

‘तो! दिलवाये थानेदार साहब ने?’

‘थानेदार साहब कुछ देर सोचते रहे फिर बोले कि पुत्तन पर मेरे भी दो हज़ार फंसे हैं। भोगी! किसी तरह तू निकलवा दे, तो एक हज़ार तेरा।’

‘ओह! ये पुत्तन तो बड़ा धरती पकड़ निकलाए’ मैंने कहा। ‘फिर उधारी मिली वापस?’

‘अरे प्रिय आप अभी भी उधारी देख रहे हैं? उधारी नहीं, मेरे व्यक्तित्व में आ रहे बदलाव देखिये। जो व्यक्तित्व परिवर्तन तमाम वेद-वेदांग पढ़ कर, वर्षों की तपस्या के बाद होता है, वह एक व्यक्ति को उधार देने मात्र से हो जाता है। अब हमें पुत्तन से मोहब्बत होने लगी। उधार प्रेम की कैंची है, केवल अल्पकालिक ऋणों के लिये ही सत्य है। दीर्घावधि ऋण के लिये उधार प्रेम का तंतु है। पुत्तन ज्यादा शराब पीता तो हमें मदिरा पीने के दुष्परिणाम याद आते। जो देर रात तक घर न आता तो हमें नींद नहीं आती। जो वो लौटता तो तसल्ली होती कि चलो हमारे हजार रुपये सुरक्षित घर लौट आये। किसी कीमती सामान की तरह हम पुत्तन की हिफाज़त करने लगे।’

‘अरे यार वो उधारी का क्या हुआ, मिली कि नहीं।’ मैंने बीच मे टोका।

‘अरे वही तो बता रहा हूं प्रिय! तो एक दिन हम यूँ ही टहलते हुए नेताजी के पास पहुंच गये और नेताजी को अपना ‘पुत्तन पुराण’ सुनाया।

‘तो मतलब नेताजी ने उधारी के रुपये वापस दिलवा दिये।’ मैंने जल्दबाज़ी में निष्कर्ष सुना डाला।

प्रिय देखो, यहीं तो आप पक्के भारतीय हो। आपको चिंता है कि उधारी के पैसे मिले कि नहीं। जबकि प्रारम्भ में आप मेरे पार्टटाइम बिज़निस के बारे में जानना चाहते थे।’

भोगीभाई ने एकदम से मुझे हिला डाला। इस चर्चा के दौरान मैं सच में भूल गया था कि मूल बात भोगी के व्यापार की हो रही थी। अब मैंने चुप रहना ही उचित समझा। 

भोगी भाई चालू रहे, ‘नेता जी ने मेरी समस्या तो पूरी गम्भीरता से सुनी पर उसके बाद वो ठहाका लगा कर हंस दिये। बोले कि कहां तुम इन चक्करों में फंसे हो। हमने कहा आप हंस रहे हैं और हम यहां मरे जा रहे हैं। अब हमें हज़ार रुपये इसलिये चाहिये क्योंकि उनको निकलवाने में ही हमारे हज़ार और $खर्च हो चुके हैं। नेताजी बोले, ‘भोगी! मैं तुझमें बहुत सम्भावनायें देखता हूं। बेटा भविष्यदृष्टा बनो। भविष्य उधार लेने वालों का है। संविधान से लेकर रुपये-पैसे और टेक्नोलॉजी तक, उधार के द्वारा ही तो हम अपने राष्ट्र का भविष्य बना रहे हैं। तो उधार लेने की इस राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में तू क्यों पीछे छूट रहा है। क्या तू डर गया है? क्या तू मिडिल क्लास हो गया है? बस प्रिय, यह सुनते ही हमारा खून खौल गया। हमने नेताजी से कह दिया कि हमें कुछ भी कह लो, पर मिडिल क्लास मत बोलना! नेताजी बोले, ‘उधार लेने से डरना, उधार देने में जल्दबाज़ी करना, दूसरों के उधार का बोझ उठाना, अपने उधार वसूल न कर पाना, ये मिडिल क्लास के लक्षण नहीं हैं, तो और क्या है? ऊंचाई पर पहुंचने के लिये इस मिडिल क्लास सोच से बाहर आना होगा भोगी! फिर नेताजी बोले कि कल अपना आईडी प्रूफ और दो पासपोर्ट साइज़ फोटो लाना।’

‘हैं!! अब ये फोटो, आईडी कहां से घुस आई बीच में।’

‘मैने भी नेताजी से यही कहा। परन्तु नेताजी ने मुझे जो समझाया उससे मुझे लगा कि हम वाकई मिडिल क्लास हैं। अगर मिडिल क्लास आदमी के सामने भगवान भी प्रगट हो जायें तो वो उनसे एक-आध बीमा और लाख-पचास हज़ार की एफडी ही मांग पाएगा।’

‘क्यों? ऐसा क्या समझाया नेताजी ने?’ मेरा कौतुहल चरम पर था।

‘नेताजी ने युवा कृषक योजना में मेरा दो लाख का लोन करवा दिया। एक-एक लाख हमने बांट लिये।’

‘कृषक योजना? तुम तो बथुआ-पालक में अंतर भी नहीं बता सकते और कृषक बन गये? और ये लोन लौटाया कैसे?’

‘नेताजी के पास कृषक बनाने के सारे रास्ते थे। हमारे जैसे अनेक कृषक उन्होंने पाल रखे थे। लोन मिलने के बाद अपने मिडिल क्लास संस्कारों से पीड़ित होकर हम रोज़ उनके पास पहुंच जाते कि लोन कब लौटायें? हमारी आत्मा पर बहुत बोझ है। नेताजी मुस्कुरा कर कह देते, ‘अभी जल्दी क्या है? धैर्य रखो। और अगले बजट में हमारा लोन माफ हो गया। फिर हमने पार्टनरशिप में युवा क्रांतिकारी उद्यमी योजना से दस लाख का ऋण उठाया।’

‘दस लाख का ऋण? अब ये कैसे लौटाओगे?’ मैं लगभग चीख पड़ा।

लौटाओगे? लौटा दिया! पूरा ऋण वापस हो गया बीमे से।’ भोगी ने संयत होकर बताया।

‘बीमा? क्या किसी को मार भी डाला अपने व्यापार में?’

‘नहीं प्रिय! उद्यमी योजना में अपनी न लगी फैक्ट्री में एन लगी आग को लगा कर बीमा लिया, और ऋण चुका दिया। अब हम और नेता जी युवा आयात-निर्यात योजना में एक करोड़ का ऋण उठा रहे हैं। नेता जी कहते हैं कि बड़े ऋण लो। छोटे ऋण परिवार का दायित्व होते हैं और बड़े ऋण राष्ट्र का।’

‘एक करोड़ का ऋण!! जो चुकाना पड़ा तो कैसे चुकाओगे?’ मुझे अब कुछ नहीं सूझ रहा था।

‘चुकाने का तो ये है कि मैनेजर की भी उसमें तीस पैसे की पत्ती डाली है, इसलिये ज्यादा टेंशन नहीं है।’

‘जो फिर भी नौबत आई तो?’

‘तो नेताजी ने पासपोर्ट बनवा दिया है। कह रहे हैं कि बड़े ऋण के बाद वर्ल्ड टूर की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। मॉरीशस होते हुए ऑस्ट्रेलिया चलेंगे।’

‘और जो विदेश न जा पाये तो? यदि पकड़े गये?’

‘पकड़े गये तो पुत्तन जि़ंदाबाद। हम भी दिगम्बर हो जायेंगे और कह देंगे, जो उखाड़ पाओ वो उखाल्लो।’

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