वो गुलाबी साड़ी-गृहलक्ष्मी की कविता
Wo Gulabi Saree

Teej Hindi Poem: मुझे आज भी याद है वो पहली हरियाली तीज चौथ,
जब आप गुलाबी साड़ी मेरे लिए लाए थे।
कम थे पैसे जेब में पर,
मेरे लिए तो जैसे चांँद ही लाए थे।
मुझे आज भी याद है…
मेरा पूरा करने श्रंगार,
गजरे भी तुम संग लाए थे।
मुझे आज भी याद है..
लाये थे संग में मोती के कंगन,
जो मेरे मन  को भाये थे।
मुझे आज भी याद है…
लाये थे एक छोटे से डिब्बे में मलाई पूरियाँ,
जिससे हम जीवन में भरपूर मिठास भर पाए थे।
मुझे आज भी याद है…
मैंने भी था सोचा कुछ देना आपको,
पर दे नही पाई थी।
क्या दूं आपको और कैसे दूं,
इसी कशमकश  में पूरी उम्र बिताई थी।
आज “दो गुलाब” के रूप में अपने दिल का गुलदस्ता,
आपको भेंट करती हूँ।
कुछ दे न सकी आज भी आपको,
आज ये दिल ही भेंट करती हूंँ।
पहन कर वो गुलाबी साड़ी,
आज भी हर तीज,करवा चौथ मानती हूँ।
लगाकर गजरे आपके दिए,
गहनों से बढ़कर सुख पाती हूंँ।
हर बार लगता मुझको,
जैसे मैं आपके लिए ही तो  दुनिया में आई हों।
मैं आपकी जैसे सीते,
आप मेरे रघुराई हो।
आप संग बन गौरा मैं,
कैलाश पर भी रह लूंगी।
ये दुनिया के ठाठ बाट क्या,
हर सुख-दुख संग संग सह लूंगी।
प्रेम रहे बस अमर हमारा,
ये कभी भी कम ना हो।
आप बने हर जन्म हमारे,
राधा कृष्ण जैसा नाम संग में शशांक ऋतु हो।

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