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तीज- गृहलक्ष्मी की कहानी
Teej-Grehlakshmi ki Kahani

परसो तीज है, आज मेरे भाई और छोटी बहन चानू सिंधारा लाने वाले हैं, तो मैं सुबह से ही व्यस्त थी घर सजाने व खाना बनाने में। बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही थी कि बेल बज उठी, ‘नमस्ते भइया, आजा चानू| मैंने उनका स्वागत किया। मेरी नजरें जूट के थैले पर अटकी थी जो भइया लाए थे। भइया लगातार मेरे ससुर से उनकी बीमारी तथा सास से उनके घुटनों के दर्द के बारे में बातें करते जा रहे थे। चाय-नाश्ते के बाद मांजी बोली, ‘अरे नीरज, बहन को सिंधारा तो दे दे, जिस उद्देश्य से आए हो। भइया ने सारा सामान थाली में सजा दिया और मैं उत्सुकतावश सारा सामान कमरे में उठाकर ले गई। खाने के बाद मैं मिठाई का डिब्बा खोलने ही जा रही थी कि मांजी ने मना कर दिया, ‘कस्टर्ड है न।
उन दोनों के जाने के बाद मैं कमरे में आ गई, ‘देखूं तो क्या-क्या है।मेरे साथ ही मांजी भी आ गई। आशू वहां पहले से ही थे। मैंने जैसे ही साड़ी उठाई, मांजी ने रोक दिया, ‘बहू इसे ऐसे ही रहने दो, तुम कोई और अच्छी सी साड़ी पहन लेना। अपना आदेश सुना गठिया से पीड़ित शरीर घसीट, बाहर चली गईं। ‘शैली को भी तो सिंधारा भिजवाना है, उसकी पहली तीज है- यह सब ऐसे का, ऐसे ही उसे चला जाएगा।
और मैं अवाक्, सन्न सी आंखों में आंसू लिए, खड़ी की खड़ी रह गई। तमतमाई हुई आंखें उठाई तो आशू खड़े थे- यूं ही कुछ निरर्थक सा काम करते हुए। मैंने सारा सामान एक ओर पटका और धम्म से बिस्तर पर लेट गई।
‘ये कोई तरीका है, क्या मेरे सिंधारे का इंतजार कर रही थीं। बेटी उनकी है तो बनाए ना उसके लिए, और इन श्रवण कुमार जी को देखो, एक शब्द भी मुंह से नहीं निकला- जैसे जबान ही न हो। मेरी भावनाओं का तो जरा भी ख्याल नहीं है। क्या मना नहीं कर सकते थे।
मेरी आंख कब लग गई, मुझे मालूम ही नहीं पड़ा। सामने आशू खड़े थे चाय का प्याला लिए। उन्होंने बिना एक शब्द बोले प्याला मेरी ओर बढ़ा दिया, मैंने भी बिना एक शब्द बोले ले लिया। मेरे द्वारा फेंका हुआ सारा सामान एक ओर सजा कर रखा हुआ था।
मैं अपने पति से झगड़ा करूं या मांजी-बाऊजी से लडूं ये तो हम अपने शिक्षित, परम्परावादी समाज में सोच भी नहीं सकते। अगले दिन मैंने स्वयं ही सारा सामान सजा एक अटैची में रख आशू के हाथ शैली के घर भिजवा दिया। मांजी और बाऊजी के कुछ प्रशंसा और कुछ शॄमदगी के मिले-जुले भावों को मैंने पहचाना।
बाऊजी की पेंशन से ही घर का खर्चा चल रहा है। उनकी सारी पूंजी तो मकान बनवाने व शैली की शादी में ही खर्च हो गई। हमसे कुछ नहीं मांगा। ये एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे। बॉस से कुछ कहासुनी हो गई तो नौकरी छोड़ दी। आशू इनके इकलौते बेटे हैं, आखिर ये सब कुछ मेरा ही तो है, मांजी ने जो कुछ किया सब ठीक किया। आशू लौट आए और सारा हाल सुना रहे थे।
शैली की खुशी का तो ठिकाना ही न रहा। रात में आशू ने मुझे जिस तरह से मनाया, लाड़ किया, उसके समक्ष स्वर्ग का खजाना भी कुछ नहीं। मेरा आक्रोश पूरी तरह से समाप्त हो चुका था।
अगले दिन तीज थी। मम्मी के बुलाने पर हम दोनों शाम को उनके घर गए। मुझे पुरानी साड़ी में देख मम्मी की आंखों में उभरा शब्द मुझे साफ दिखाई दे रहा था। वही प्रश्न मेरी आंखों में भी भाभी को पुरानी साड़ी में देख उभरा। भाभी ने इस बार हमेशा की तरह हमारा गर्मजोशी से स्वागत नहीं किया। भाई साहब के व्यवहार से भी लगा कि वो मात्र औपचारिकता निभा रहे हैं। मैं दुविधा में थी कि आखिर हुआ क्या है।
मेरी दुविधा दूर की चानू ने। एकांत पाकर कहने लगी, ‘दीदी, मम्मी ने जो सिंधारा आपको भेजा था, वो भाभी के घर से आया था।

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