गृहलक्ष्मी की कहानियां

गृहलक्ष्मी की कहानियां: आज आटो लेकर जल्दी—जल्दी घर से निकला क्योंकि आज नीट का एंट्रेस एग्जाम था। बहुत से प्रतियोगी अलग-अलग जगहों से रायपुर आये होंगे तो सवारी मिलने की संभावना बहुत ज्यादा थी। स्टेशन पहुंचा तो प्रतियोगियों की भीड़ दिखी। कई सवारियों को उनके मंजिल तक पहुंचने के बाद मै स्टैंड पर सुस्ता रहा था कि एक 16–17 साल का लड़का भागता हुआ आया–”भइया नीट सेंटर चलोगे? जरा जल्दी सेंटर पर 1:30 का रिपोर्टिंग टाइम है। मेरे पास सिर्फ 40 मिनट ही बचे है। भइया जल्दी करो और प्लीज़ चलो। “उसके बोलने में बहुत ज्यादा घबराहट थी जो शायद एक साल ख़राब हो जाने के डर से था।
मैंने झट से अपना आटो स्टार्ट किया और उसे बैठने के लिए बोला।”लेकिन भइया मेरे पास पैसे नहीं है, किसी ने मेरी जेब काट ली। पिता जी की तबीयत ठीक नहीं थी। इसलिए मुझे अकेले आना पड़ा। उनको अस्पताल ले जाने की वजह से देर हो गई। मै यही रहता हूं स्टेशन के साथ वाली कॉलोनी में। मै एक बार परीक्षा दे लूं ,फिर आप मुझे अपना नंबर दे देना मै पैसे भिजवा दूंगा।” मैंने उसकी तरफ देख कर उसको आखों ही आंखो में आश्वस्त किया।


अगले 25 मिनट में हम सेंटर पर थे। जब वो जाने लगा तब हाथ जोड़ कर मुझे धन्यवाद किया। बार-बार मुझे धन्यवाद करता और कहता,’ मैं आपके पैसे जल्दी दे दूंगा परीक्षा के बाद पिताजी को कह कर। मैंने उससे कहा- “मुझे पैसे नहीं चाहिए। हो सके तो इस परीक्षा को पास कर लेना ताकि अपने साथ-साथ अपने माता- पिता का सपना भी पूरा कर सको। मेरा नंबर ले जाओ मगर पैसे लौटाने के लिए नहीं,बल्कि मुझे बताने के लिए कि तुम्हारा रिज़ल्ट क्या रहा।” मैंने उसको बेस्ट ऑफ लक बोला फिर वो मेरा नंबर लेकर चला गया।
इस बात को बीते लगभग 20 दिन हो गए थे, मैं इस बात को भूल चुका था। रोज की तरह आज भी मैं सवारियों की तलाश में निकलने वाला था|

तभी फोन बजा। जब मैंने उठाया तो उधर से खुशी से चहकती हुई आवाज आई।“भइया पहचाना मुझे!आपने मुझे पैसे ना होने के बाबजूद सेंटर तक पहुंचाया था। भइया आज आपकी वजह से मेरा सपना पूरा हो पाया है। मैंने परीक्षा पास कर ली। भइया मैं जल्दी ही आऊंगा आपसे मिलने।” मैंने अच्छा कह दिया। आज मुझे बहुत खुशी हो रही थी कि आज मेरी वजह से किसी का तो सपना पुरा हुआ। जो सपना कभी मैंने देखा था,मैं वो तो पूरा नहीं कर पाया। पिताजी की असामयिक मृत्यु और उसके बाद माता जी के विक्षिप्त अवस्था के कारण पूरे परिवार की जिममेदारियां मुझ पर आ गईं । 3 छोटे भाई बहनों का लालन—पालन मुझे मां और पिता दोनो बनकर करना पड़ा। नौकरी तो क्या मिलती बारहवीं पास लड़के को,तो इसलिए आटो चलानी पड़ी।दिन भर मैं आटो चलाता और रात को बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाता। इसी तरह जिन्दगी के 10 साल बीत गए। लेकिन अधूरे सपने की कसक आज भी दिल में कहीं ना कहीं रहती है। पर आज इस लड़के की खुशी ने मुझे बहुत सुकून पहुंचाया, लगा कि चलो किसी के सपनों की उड़ान तो बिना बाधा के पूरी होगी।
दिल से ऊपर वाले का धन्यवाद करता हुआ मैं चल पड़ा फिर से किसी और के सपने को पूरा करने में थोड़ा सा हिस्सा बनने।

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