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गृहलक्ष्मी की कहानियां

द्वार पर थपथपाहट।
“कौन?” यमराज की नींद उचटी ।
“हम हैं स्वामी, आपके दूत ।”
“अर्धरात्रि में? क्या बात है?”
“बात कुछ विशेष नहीं प्रभु । मृत्युलोक से एक उद्दंड प्राणी जबरन घुस आया है ।”
“तुम क्यों लाये उसे?”
“लाये नहीं, वह स्वेच्छा से चला आया ।”
“क्या? उसका यह दुस्साहस? बगैर हमारी आज्ञा के चला आया?”
“आप इसी से पूछ लीजिए । इसने हमारी नाक में दम कर रखा है। हम दस सेवक इसे संभालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यह संभाल में नहीं आ रहा ।”

“ले आओ ।”

“मनुष्य, तुम हमारी आज्ञा के बिना परलोक में कैसे घुस आये? जानते हो, इससे हमारा अनुशासन और विधान भंग हुआ है… इस अपराध के लिए हम तुम्हें भयंकर से भयंकर नरक दे सकते हैं ।”

“महाप्रभु…वह नरक निश्चित ही उस नरक से भयंकर नहीं होगा जो मैंने भोगा है ।”

“क्या मतलब? मृत्युलोक में नरक की स्थापना? यह हमारे संविधान का महानतम अपमान है… क्या मृत्युलोक के प्राणी शाश्वत व्यवस्था के प्रति विद्रोही हो गये…? तत्काल चित्रगुप्त को हमारी सेवा में उपस्थित करो…”

“जो आज्ञा प्रभु!” एक दूत सिर झुकाकर चला गया ।

“यह बात नहीं, महान्याय पालक! मेरा नरक-भोग आपकी व्यवस्था से सर्वथा भिन्न है ।”

“वह कैसे?”

“स्वामिन् मैंने अपनी पत्नी के दुर्व्यवहार से तंग आकर आत्महत्या कर ली और सीधा आपके न्यायालय में चला आया ।”

“हम समझे नहीं वत्स…आत्महत्या हमारी व्यवस्था के प्रति विद्रोह है…फिर एक विद्रोही न्याय की कामना कैसे कर सकता है?”

“हे महादंडाधिकारी, मेरी पत्नी सोते-जागते,खाते-पीते हमेशा मुझे कोंचती रहती है । उसके व्यवहार से तंग आकर मैं एक वेश्या के पास जाने लगा । जहां मुझे सच्चा सुख और सच्ची शांति मिली…मेरी सुख-शांति का समाचार पाकर मेरी पत्नी प्रतिशोधी हो उठी…मुझे चौदह वर्ष के अशांत वैवाहिक जीवन के बाद आत्महत्या को विवश होना पड़ा ।”

तभी चित्रगुप्त आ गये ।

“आपने मुझे याद किया, प्रभु?” चित्रगुप्त ने आंखें मलते हुए पूछा ।

“हां चित्रगुप्त, मृत्युलोक का यह प्राणी बगैर हमारी आज्ञा के यहां चला आया है… इसका खाता देखकर बताओ कि आखिर यह अव्यवस्था क्यों पैदा हुई?”

“जो आज्ञा, महामहिम ।”

चित्रगुप्त ने खाता पलटना शुरू कर दिया । फिर एक स्थान पर निशान लगाते हुए बोले, “स्वामिन् इस मानव की आयु अपने विधान के अनुसार अभी छब्बीस वर्ष शेष है । यह सत्य है महाराज कि इसकी पत्नी ने इसे असमय आपकी सेवा में आने के लिए बाध्य कर दिया । यह प्राणी आजकल मृत्युलोक की एक वेश्या को प्राण-पण से प्रेम करता है।”

“चित्रगुप्त, तुम जानते हो कि हम अपने विधान का कितना सम्मान करते हैं… इस प्राणी को अभी, इसी समय, वापस मृत्युलोक भेज दो और उस वेश्या को इसकी पत्नी बना दो ।”

“जो आज्ञा न्यायपालक…”

यमराज ने मनुष्य से पूछा, “अब तो तुम अपनी आयु के शेष वर्ष पूरे करना चाहोगे?” कृतज्ञ प्राणी उनके चरणों में लोट गया ।

“आयु दुगुनी देंगे तो, प्रभो, मुझ अकिंचन पर विशेष कृपा होगी ।”

“विधान परिवर्तित नहीं हो सकता, वत्स ।”

…द्वार पर थपथपाहट ।

“कौन?” यमराज की खीज-भरी आवाज उभरी ।

“हम हैं, स्वामी, आपके दूत ।”

“इस समय! बात क्या है?”

“अपराध क्षमा हो प्रभु, वह प्राणी, जिसे आपने एक माह पूर्व मृत्युलोक वापस भेजा था, पुनः स्वेच्छा से आ गया है ।”

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एक दिन पति का (व्यंग्य)- गृहलक्ष्मी की कहानियां?

“उसकी आयु तो अभी पच्चीस साल ग्यारह महीने शेष है, फिर क्यों आया?”

“पता नहीं महाप्रभु…”

“ठीक है, ले आओ कक्ष में ।”

वह प्राणी प्रवेश करते ही बिलखकर यमराज के चरणों में गिर पड़ा ।

“अब तुम्हें कौन-सी व्यथा है, मानव? हमने तुम्हारी इच्छित पत्नी तुम्हें सौंप दी थी ।”

“भगवन, जब से वह वेश्या मेरी पत्नी बनी है, उसका व्यवहार एकदम बदल गया है…वह मेरी पूर्व पत्नी से भी अधिक उग्र और उद्दंड हो उठी है । प्रतिपल मेरी पूर्व पत्नी का नाम ले-लेकर मुझे कोंचती रहती है…जीना दूभर हो उठा तो मैंने तंग आकर पुनः आत्महत्या कर ली ।”

“कुछ भी हो, हमारी व्यवस्था और विधान नहीं बदल सकता । तुम्हें अब उन दोनों पत्नियों के साथ पच्चीस साल ग्यारह महीने गुजारने होंगे!”

वह प्राणी बिजली की भांति तड़का और यमराज के चरणों में उसकी सूक्ष्म देह ने भी प्राण त्याग दिए।

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