गृहलक्ष्मी की कहानियां

गृहलक्ष्मी की कहानियां: आज सुबह—सुबह जैसे ही सूरज की सुनहरी किरणों ने धरा पर अपने डेरे का विस्तार किया, विनय जी की आंखें खुली। हर रोज की तरह आज उन्हें अपनी धर्मपत्नी नम्रता से चाय के लिए किसी भी प्रकार की कोई विनती या आग्रह करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। उनकी धर्मपत्नी फौरन बड़ी विनम्रता पूर्वक व आदरभाव के संग,उनके समक्ष गर्मा गर्म अदरक—इलायची वाली चाय लेकर उपस्थित हो गई और फिर सिर पर पल्लू रखती हुए विनय जी के चरण कमलो को स्पर्श करने लगी।
यह दिव्य दृश्य देखकर बेचारे विनय जी थोड़ी देर के लिए अचरज में पड़ गए और असहज होते हुए घबरा गए कि आखिर अचानक उनकी धर्मपत्नी को यह क्या हुआ? सब कुशल तो है! कहीं यह जागते हुए खुली आंखों का स्वप्न तो नहीं…? परन्तु यह सच था…!

वह सोचने लगे कि आज सूरज का उदय किस ओर से हुआ है? हर रोज़ तो प्रातः करीब तीन से चार बार चाय की गुहार विनय जी को अपनी पत्नी की दरबार पर लगानी पड़ती हैं, तब कहीं जाकर उन्हें चाय नसीब होती थी। वह भी तब जब उनकी श्रीमती जी चाहती हैं। तभी उन्हें सहसा स्मरण हो आया कि आज तो उनका अपना दिन है जिसका उन्हें बेसब्री से पूरे साल भर इंतज़ार रहता हैं।

आज के दिन तो वह अपने घर के बेताज बादशाह होते हैं भले ही एक दिन के लिए ही सही लेकिन आज के दिन उनके हर हुक्म की तामील हर हाल में उनकी श्रीमती जी के द्वारा की जाती है क्योंकि आज उनकी धर्मपत्नी जी का करवा चौथ का व्रत है, जो पति की लंबी उम्र व पति सुख की कामना से श्रीमती जी के द्वारा पूरी श्रद्धा, विश्वास और आस्था के संग किया जाता है। आज के दिन श्रीमती जी की बातों में शहद सी मिठास होती है जो दिन के ३६४ दिन विनय जी के कान सुनने को तरस जाते हैं। साथ ही साथ श्रीमती जी के लबों पर एक इंच की लंबी सी मुस्कान भी सारा दिन देखने को मिलता है, जो बाकी दिनों में नदारद रहता है।

अक्सर श्रीमती जी के आगे विनय जी की दयनीय स्थिति को देख कर यह कहावत चरितार्थ होते हुए जान पड़ता है कि जीवन में किसी भी व्यक्ति के नाम का असर उसकी जिंदगी में अवश्य होता है बेचारे विनय जी हर वक्त विनीत व विनय की मुद्रा में ही अपनी श्रीमती जी के सामने नजर आते हैं, परंतु उसके विपरीत उनकी श्रीमती नम्रता जी को देख कर यह कहावत केवल भ्रम मात्र ही प्रतीत होता है क्योंकि नम्रता जी के व्यक्तित्व में नम्रता की कोई झलक नजर ही नहीं आती है। विनय जी की दशा को देखकर यहां पर एक और बात स्पष्ट कर देना उचित होगा कि पति चाहे घर के बाहर खुद को शेर समझे या फिर घोड़ा, घर के भीतर तो वह बेचारा, बेबस, लाचार, चूहा और गधा ही होता है।

खैर जो भी हो भले ३६४ दिन विनय जी अपनी श्रीमती जी के दास हों किन्तु करवा चौथ के दिन तो वह बादशाह होते हैं। जैसे ही उन्हें इस बात का एहसास हुआ विनय जी बड़ी शान के साथ चाय की चुस्कियां लेते हुए थोड़ा तन के बोले-
” बहुत दिनों से मूंग दाल का हलवा नहीं खाया है नाश्ते में हलवा मिल जाता तो मजा ही आ जाता।”
यह सुनते ही श्रीमती जी मुस्कुराती हुई बोली -“हां क्यों नहीं, आज मूंग दाल का हलवा ही बना लेती हूं…”
विनय जी को अपनी धर्मपत्नी का इस प्रकार मुस्कुराते हुए बिना भौंहें ताने, बगैर किसी बहस के सहर्ष तैयार हो जाना अत्यंत सुखद अनुभूति प्रदान कर रहा था, फिर क्या था विनय जी अपनी आवभगत और सेवा सत्कार कराने के लिए दफ्तर से एक दिन की छुट्टी ही ले ली। पूरे वर्ष में मात्र एक दिन ही ऐसा अद्भुत संयोग बनता है जब श्रीमती जी बिना गुर्राए, बगैर हड़काए विनम्रता पूर्वक चेहरे पर मुस्कुराहट लिए विनय जी की इच्छाओं का ध्यान रखती है और उनके हर आज्ञा का पालन करती है।

करवा चौथ के दिन हर पति का महत्व बढ़ जाता है। साल में चाहे एक दिन ही क्यों ना हो, पर इस दिन हर पति को यह स्वर्णिम पल अवश्य प्राप्त होता है, जिसे वे अपनी पत्नी पर राज करते हुए हुक्म चलाने की मौन स्वीकृति समझ बैठते है। क्योंकि अक्सर उस दिन क्रोध की ज्वालामुखी पत्नी समुद्र की शांत लहरों में तब्दील हो जाती है। पति महोदय इस बात से अनभिज्ञ होते है कि समुद्र की इन शांत गंभीर लहरों की गहराई में कई उथल-पुथल मची हुई है।

विनय जी की समझ भी अपनी श्रीमती जी के प्रति कुछ ऐसी ही थी। जैसे ही विनय जी को करवाचौथ एवं अपने स्वयं के महत्व का ज्ञान हुआ उनके दिव्य चक्षु खुल गये और उन्होंने मन ही मन यह तय कर लिया कि अब वे इस सुनहरे अवसर को अपने हाथ से जाने नहीं देंगे, इसका भरपूर फायदा उठाएंगे। कुल मिला कर विनय जी ने यह ठान लिया कि अब वे किसी भी हाल में इस मौके को भुनाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ेंगे। उसके बाद क्या था, विनय जी को हर एक घंटे के उपरांत चाय की तलब लगती, हर थोड़ी देर के अंतराल में विनय जी अपनी फरमाइशों के पिटारे से एक छोटी सी फरमाइश अपनी श्रीमती जी के समक्ष पेश कर देते और श्रीमती जी बिना झुंझलाए, बिना आंखें टेढ़ी किए विनय जी के लिए चाय बनाने और उनकी फरमाइशों को पूर्ण करने में लग जाती। करवा चौथ के पूरे दिन विनय जी अपनी आंखों में चश्मा चढ़ाए हुक्म चलाते रहे और श्रीमती जी सारा दिन शांत भाव से विनय जी की नौकरी बजाती रही।

करवा चौथ के दूसरे दिन रसोईघर का कार्यभार विनय जी को संभालना था जैसे ही विनय जी ने रसोई में कदम रखा उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। सिंक से झांकते बर्तन जैसे कह रहे हो आप की फरमाइशों की वजह से हम यहां पर फंसे हुए है, अब आप ही हमें बाहर निकालिए, फैला हुआ किचन,स्लैब और चिकनाई युक्त गैस स्टोव विनय जी को चिढ़ाने लगे, तभी श्रीमती जी ने आवाज लगाई- ” किचन की सफाई करने के बाद मेरे लिए भी एक कप चाय बना लीजिए। “
बेचारे विनय जी किचन की सफाई करते हुए सोचने लगे कि एक दिन की बादशाही उस पर बीबी से पंगा लेना भारी पड़ गया।

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