रात के लगभग आठ बजे देवयानी खुद नीचे उतर आई‒बंगले में गहरा सन्नाटा था, केवल किचन में बर्तन खड़कने की आवाज आ रही थी…वह किचन में आई तो वही नौकर खाना बना रहा था…वह शिष्टता से बोला‒”खाना लाऊं, मेमसाहब।”
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“तुमने सबने खा लिया।”
“जी‒अभी नहीं।”
“तुम, मेरे और अंजू के लिए निकाल दो…मैं खुद ले जाऊंगी…जबरदस्ती खिलाना पड़ेगा…वह तो पानी भी नहीं पी रही।”
नौकर ने अंजला और देवयानी के लिए खाना ट्रे में लगा दिया।
“अरे हां।” अचानक देवयानी ने कहा‒”कहीं आसपास कोई मेडिकल स्टोर है….अंजू के लिए डिस्प्रिन मंगवानी है।”
“जी…मैं लेकर आता हूं।”
नौकर निकल कर चला गया…देवयानी ने अपने गिरेहवान में हाथ डालकर नींद की चंद गोलियां निकालीं और प्रेशर कूकर में डाल दीं जिसमें भाजी पक रही थी। कुछ देर बाद नौकर डिस्प्रिन का पत्ता लेकर आ गया।
देवयानी ने पत्ता लेकर कहा‒”चौकीदार से बोल देना….कोई पूछने के लिए भी आए तो फाटक ही से लौटा दे।
“जी मेमसाहब।”
देवयानी ऊपर चली आई…अंजला ने दिन में भी ढंग से खाना नहीं खाया था…इसलिए देवयानी के साथ उसने पेट भर कर खाना खाया…खाने से पहले दोनों ने हल्के-हल्के पैग भी लिए।
अंजला ने पूछा‒”बर्तन लेने तो नहीं आएगा कोई?”
“नहीं‒तू जल्दी से तैयारी कर ले।”
“वे लोग ग्यारह बजे से पहले नहीं सोते।”
“आज जल्दी सो जाएंगे…खाना खाते ही।”
“तूने उनके खाने में कोई नशा तो नहीं मिला दिया?”
“सिर्फ नींद की गोलियां।”
“ओ गॉड! कहीं भांडा फूट गया तो?”
“अब तो जो होगा देखा जाएगा।”
अंजला जल्दी से बाथरूम में आ गई…तैयार होने में उसे लगभग आधा घंटा लग गया। ठीक साढ़े नौ बजे देवयानी ने पिछली खिड़की खोलकर नीचे झांका। किसी क्वार्टर में रोशनी नहीं नजर आ रही थी।
अंजला ने पूछा‒”और चौकीदार? वह तो नहीं सो गया?”
“वह जागता भी रहा तो फाटक पर ही रहेगा।”
लगभग दस बजे वे दोनों दरवाजा बंद करके खिड़की के पास आ गईं…देवयानी ने पूछा‒
“उतर जाएगी? अभी तू स्टूडेंट ही है…कॉलेज के खेल भूली नहीं होगी।”
फिर दोनों को नीचे पहुंचने में देर नहीं लगी। पिछली कम्पाउण्ड वाल पर देवयानी ने पहले खुद झुक कर अंजला को पीठ पर चढ़ाया….फिर अंजला ने देवयानी को खींच लिया। अंजला का दिल बहुत जोर से धड़क रहा था, मगर देवयानी को जरा भी परेशानी नहीं थी…काफी दूर चलकर दोनों सड़क पर पहुंची, वहां उन्हें टैक्सी मिल गई। देवयानी ने अपने बंगले से काफी पहले टैक्सी छोड़ दी और पैदल चलकर दोनों बंगले तक पहुंच गई….फाटक खुलवा कर दोनों अंदर भी पहुंच गई।
विवेक बेचैनी से बरामदे में टहल रहा था…वह दोनों को देखकर ठिठक कर रुक गया। अंजला का दिल जोर से धड़का-फिर वह तेजी से आगे बढ़ी….विवेक भी उतर आया….अंजला उसके कंधे से लग गई।
“अपन को विश्वास नहीं हो रहेला।” विवेक ने उसके बाल चूम कर कहा।
“तुम्हारे विश्वास को जिन्दा रखने के लिए ही तो मैं इस तरह आई हूं।”
“यार! अपन को क्या मालूम था कि वह साला महेश इतनी जल्दी सटक लेगा।”
“विवेक…प्लीज! अब तो उसके लिए इस तरह मत बोलो।”
“आई एम सॉरी!”
देवयानी ने पूछा‒”पंडितजी आ गए?”
“बहुत देर से बैठे हुए हैं….फेरों के लिए हवनकुण्ड भी…पर अपन तक रिपोर्ट को भी होना मंगता।”
“अच्छा अंदर चलिए…बातों में समय नष्ट न हो।”
वे लोग अंदर आ गए…पहले ही से एक छोटा-सा लग्न-मंडप तैयार था…दोनों पटरों पर बैठ गए।
“कन्यादान कौन करेगा?” पंडित जी ने पूछा।
“अरे यार पंडित! तूने सैकड़ों शादियां कन्यादान के साथ कराई होंगी एक शादी में कन्यादान नहीं होएगा तो क्या शादी अधूरी रह जाएगी।”
“बच्चा, धर्म की रस्में कैसे अधूरी छोड़ी जा सकती हैं?”
“अरे यार! उधार का बाप किधर मिलेंगा तू ही कन्यादान कर दे…दक्षिणा की चिन्ता न करेलो।”
फिर पंडित ने पंडित की भूमिका भी निभाई और लड़की के बाप का ‘रोल’ भी।”
फेरों की रस्म सम्पन्न हो गई तो देवयानी ने अंजला का हाथ थाम कर कहा‒”चलो…तुम दोनों मेरे साथ आओ।‒
“पर किधर?” विवेक ने पूछा।
“तुम आओ तो सही।”
देवयानी दोनों को ऊपर ले आई और एक कमरे का दरवाजा खोला तो विवेक उछला…अंजला का दिल भी धड़क कर गले में आ गया, क्योंकि वह कमरा दुल्हन की सेज बना हुआ था।
“इसका क्या मतलब होएला?” विवेक ने आश्चर्य से पूछा।
“तुम क्या समझते हो…सुहागरात के बिना शादी सम्पूर्ण हो जाती है।”
“स…स…सुहागरात…!”
“तुमने मेरे साथ नहीं मनाई न इसलिए अनुभव नहीं। चलो, अंदर चलो।”
“देवयानी!” अंजला ने थूक निगल कर कहा।
“यही पूछेगी न कि मैंने पहले से तैयारी क्यों कर रखी है?”
“हां।”
“क्योंकि मुझे विवेक की प्रॉब्लम मालूम थी। विवेक अपने प्रेम पर मां की बलि नहीं चढ़ा सकता था…दूसरी ओर मुझे यह भी विश्वास था कि तू विवेक के बिना बाकी जीवन सुख से बिताने की कल्पना भी नहीं कर सकती।”
“देवयानी!”
“मैंने तेरे ऊपर खुद इसलिए जोर नहीं डाला था कि मैं देखना चाहती थी कि तुझे विवेक से कितना प्यार है और यह भी चाहती थी कि तुझ पर कुछ थोपा न जाए…बल्कि तू स्वयं अपनी खुशी से इस शादी की तैयारी के लिए मुझ पर जोर डाले और तू प्रेम की इस परीक्षा में खरी उतरी।”
“देवयानी…!”
अंजला देवयानी के सीने से लग गई। देवयानी ने धीरे से उसके कान में कहा‒”अगर तू इसी समय सुहागरात न मना लेगी तो दो-तीन महीने इन्तजार करना पड़ेगा…फिर तेरे गर्भ को विवेक अपना बच्चा कदापि नहीं मानता।”
अंजला के दिल पर एक घूंसा-सा लगा…फिर दोनों अलग हो गईं…देवयानी ने भीगी आंखों के साथ दोनों के हाथ मिला कर कहा‒”हैप्पी मैरिज!” फिर वह तेजी से मुड़ी और दरवाजा भेड़ दिया।
विवेक ने कहा‒”यार! यह छोकरी अपने सारे पाप धोएली…एक यही पुण्य करके। साली से अपन को भी लव होता तो अपन इसको भी पत्नी बनाकर रखने की सोच सकता था।”
फिर उसने अंजला की बांह पकड़ कर उसको अपनी ओर मोड़ कर कहा‒”ऐ साली! उधर क्या मुंह किएली खड़ी है…अपन के साथ ‘सुहागरात’ नहीं मनाने का है।”
अंजला अचानक विवेक के सीने से लग कर सिसक पड़ी।
“हांय…हांय…ऐसी खुशी के ‘टैम’ रोना काहे को?”
“मैं…मैं तो कभी सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि कभी हम दोनों एक होंगे।”
“आज अगर तेरे से चूक हो गएली होती तो मामला बिगड़ गएला था…यार तू खुद सोच…अपन की मां को तो तू देखला है…अपन को कितना सोटी मार-मार कर पाला-पोसा…अपन खुद अपन लाइफ छोड़ने को सकता है पर अपन का मां…! नहीं…नहीं…अपन की मां की छाया अपन के सिर पर सदा बनी रहे।”
फिर उसने अंजला की ठोढ़ी पकड़कर उठाकर कहा‒
“जानती है साली…जब तू अपने की मां के सामने उसका बहू बनकर जाएंगी तो मां को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं आएंगा।”
“विवेक….मुझे जल्दी वापस जाना है।”
“ओहो! अपन भूल गए था कि यह तो अपन की ‘सुहागरात का ट्रेलर’ है।”
फिर उसने अंजला को फूलों से सजे बिस्तर पर लिटाया…और उसे लिपटा कर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए…अंजला भी उससे लिपट गई।
टैक्सी फाटक पर रुकी तो चौकीदार ऊंघते-ऊंघते चौंक पड़ा…उसने इस तरह आंखें चौड़ी की जैसे बंद हुई जा रही है।
अचानक कार का हॉर्न बोल उठा तो चौकीदार उठकर कार के पास आकर बोला‒
“साहब सुबह आइएगा पुरसे को…बहू रानी की तबियत ठीक नहीं।”
“क्या बकता है?” कार में से जगमोहन की गुस्से भरी आवाज सुनाई दी‒”किसके पुरसे की बात कर रहा है?”
“हांय!” चौकीदार उछल पड़ा‒”बड़े मालिक आप…!”
“तू पहरा देते-देते सोने भी लगा है।”
“ज…ज…ज…छोटे मालिक का…।”
अचानक महेश की आवाज आई‒”क्या बात है बहादुर…तुम्हारी तबियत तो ठीक है?”
चौकीदार ऐसे उछल पड़ा जैसे पैरों के पास बम फट गया हो…वह आश्चर्य और खुशी से बोला‒
“छोटे मालिक…आप जिन्दा हैं?”
इससे पहले कि जगमोहन या महेश कुछ बोलते…चौकीदार ने झपटकर फाटक खोल दिया और चिल्लाता हुआ अन्दर दौड़ा।
“रामदीन, नारायण, कलुवा…अरे छोटे मालिक जिन्दा हैं…अरे…आओ…देखो बड़े और छोटे मालिक दोनों आए हैं।”
पीछे-पीछे टैक्सी अंदर आई जो पोर्च में रुक गई…चौकीदार खुशी से चिल्लाए जा रहा था।
जगमोहन और महेश पिछली सीट से उतरे और मंगली काका अगली सीट से…मंगली ने चौकीदार के कंधे पर हाथ रखकर कहा‒
“क्या हो गया है तुम्हें बहादुर…कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो?”
“अरे काका…यहां तो कल से शोक छाया हुआ है…तुम देख नहीं रहे कैसा सन्नाटा है अभी से…सब नौकर क्वार्टरों में सो गए हैं।”
“और यह देवयानी की कार क्यों खड़ी है?” महेश ने पूछा।
“मेमसाहब बहू रानी के पास हैं शाम से ही।”
“क्यों?”
“बहू रानी ने रो-रोकर बुरा हाल कर लिया है‒दिन भर कमरे में बंद रहीं…खाना तक नहीं खाया था जो लोग शोक जताने आए थे उन्हें लौटना पड़ता था।”
“अरे…कैसा पुरसा? किसका पुरसा?”
“वो…वो…कल मंगली काका ने टेलीफोन करके बताया था, भगवान न करे, छोटे मालिक को कुछ हो गया है।”
“क्या बक रहे हो बहादुर?” मंगली काका ने कहा‒”क्या मैंने बताया था…वह भी ऐसी अशुभ और उल्टी बात?”
“काका! टेलीफोन खुद बहु रानी ने रिसीव किया था…वह पहले तो सकते में रह गई थीं…फिर उनका बुरा हाल हो गया।”
“किसी की बेहूदा हरकत थी यह?” जगमोहन ने गुस्से से कहा।
“काका अंजला कहां है?” महेश ने पूछा।
“अंदर ही होंगी।”
महेश दरवाजे की घंटी बजाने लगा‒जगमोहन ने मंगली से कहा‒”सामान उतरवा कर सब नौकरों को बुला लाओ।”
“जी मालिक।”
फिर जगमोहन भी महेश के पास आ गए…घंटी काफी देर तक अंदर गूंजती रही…मगर कोई जवाब नहीं।
“यह क्या हो रहा है?” जगमोहन ने गुस्से से कहा।
“शायद वो दोनों ऊपर हों…बेखबर सो रही हों।”
महेश पिछली ओर आया…उसने पिछले बरामदे का दरवाजा बाहर से बंद देखा…वह दरवाजा खोलकर अंदर आ गया…उसने हॉल में आकर बाहर का दरवाजा खोला और जगमोहन भी अंदर आ गया।
“कहां है बहू…और उसकी दोस्त?”
“शायद ऊपर के कमरे में होंगी।”
“जाओ…बुलाकर लाओ।”

महेश ऊपर आया…वह बैडरूम जिसमें महेश और अंजला रहते थे…अंदर से बंद था। महेश ने दरवाजे पर दस्तक देकर पुकारा‒
“अंजला…ऐ अंजला।”
जवाब न मिलने पर उसने देवयानी का नाम लेकर पुकारा…फिर भी कोई उत्तर नहीं…उसने जोर-जोर से दरवाजा पीटा…मगर सब व्यर्थ…वह बड़बड़ाया‒
“लगता है दोनों बहुत गहरी नींद सो रही हैं…कल से परेशान हैं….हो सकता है देवयानी ने गहरी नींद की गोली दे दी हो।”
फिर वापस नीचे आकर उसने डैडी से बताया‒”दोनों बहुत गहरी नींद सो रही हैं।”
तभी मंगली के साथ सारे नौकर दौड़ते हुए वहां पहुंच गए।
“छोटे मालिक!”
“छोटे मालिक! आपको हमारी उमर भी लग जाए…।” सबकी आंखों में खुशी के आंसू झिलमिला रहे थे।
जगमोहन ने पूछा‒”कब आया था यह बेहूदा टेलीफोन?”
“बड़े मालिक!” नारायण ने आंखें पोंछकर रुंधे गले से कहा‒”कल ही आया था, सुबह सुबह।”
किसने रिसीव किया था?
“बहू रानी ने…कल से उनका बुरा हाल था, कुछ खा पी भी नहीं रही थीं…फिर शाम को फोन आ गया कि…भगवान न करे आपको हवाई जहाज में शव लाने की जगह नहीं मिल रही।”
“ओ गॉड!”
“वह फोन मैंने खुद रिसीव किया था मालिक…तब देवयानी मेमसाहब आई हुई थीं…वह भी बड़ी परेशान थीं…बहू रानी पास-पड़ोसी पुरसे के लिए आ रहे थे‒उन्होंने किसी को मिलने नहीं दिया। फिर उन्होंने बड़ी मुश्किल से बहू रानी को खाना खिलाया और यह भी कहा कि वह उनके पास ही रहेंगी जब तक कि आप लौट नहीं आते।”
“हे भगवान! कितना कुछ हो गया।”
“बड़े मालिक! हम लोगों के लिए तो दुनिया ही वीरान हो गई थी…बहू रानी का हाल हमसे देखा नहीं जा रहा था…वह जागी नहीं?”
“उन लोगों को सोने दो।” महेश ने कहा‒”शायद देवयानी ने नींद की गोली दे दी होगी।”
“मगर छोटे मालिक…आपका ऑपरेशन?”
“जगमोहन ने कहा‒”ऑपरेशन के लिए अमरीका बुलाया है।”

“हे भगवान! छोटे मालिक को हमारी उमर भी मिल जाए।”
“जाओ महेश।” जगमोहन ने कहा‒”कई दिन से थके हुए हो‒नीचे ही सो जाओ…हम पता लगाने की कोशिश करेंगे कि यह बेहूदा ड्रामा किसने और क्यों रचा है?”
महेश उठकर निचली सहदारी को ओर बढ़ गया। नारायण ने धीरे से पूछा‒”बड़े मालिक! सब ठीक तो है ना।”
“डाक्टर ने आस तो बड़ी दिलाई है…मगर अब तो सब कुछ भगवान के हाथों में ही है।” कहते-कहते जगमोहन की आवाज भर्रा गई।
