Hindi Novel Kacche Dhage | Grehlakshmi
Kacche Dhage hindi novel by sameer

देवयानी ने कार रोक दी और नीचे उतर आई और सीधी बस्ती के अन्दर चली आई तो रीमा देवी नल पर कपड़े धो रही थी।

“नमस्ते…मांजी।” देवयानी ने कहा।

“जीती रहो बेटी! तू इस समय?”

“आप बैठिए…लाइए मैं कपड़े धो दूं।”

रीमा देवी हंस पड़ीं‒”तू कपड़े धोएगी? कभी मां के घर रूमाल भी धोया है।”

कच्चे धागे नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

“अब तो यही घर मेरा है।”

“अच्छा-अच्छा…रहने दे…तू कहकर गई थी‒इम्तिहानों के बाद आएगी‒आज कैसे आ गई?”

“यूं ही…आपसे मिलने को मन चाहा था।”

“अच्छा, समझ गई…खाना तो नहीं खाया होगा।”

“भूख नहीं है‒अभी मांजी।”

“‘वह’ खोली में नहीं है।”

“फिर कहां हैं?”

“एक ही जगह है उसकी, जब मां की मार से बचना हो…किसी उलझन में हो…गुस्सा आ जाए…तो खोखे पर चढ़कर बैठ जाता है।”

“क्या खोखे पर बैठे हैं नजर नहीं आए?”

“तो लेट गया होगा…दोपहर से वहीं पड़ा हुआ है‒न कॉलेज गया था न नाश्ता किया‒न दोपहर का खाना।”

“मैं देखती हूं।”

“देख ले जाकर…ऐसा पागल लड़का शायद ही कोई और है।”

देवयानी लौट कर आई तो उसे विवेक के पांव नजर आए‒वह खोखे की छत के ऊपर लेटा हुआ था। देवयानी के होंठों पर मुस्कराहट फैल गई….उसने इधर-उधर देखकर एक छोटा-सा कंकर उठा कर ऊपर फेंका जो विवेक के पास आ गिरा। विवेक उछल पड़ा…गुस्से से झटके से बैठता हुआ बोला‒

“कौन है साला…अपन का हाथ-पांव तोड़ देंगा।”

देवयानी हंस पड़ी…विवेक उसे देखकर जल गया।

“क्या साली बन्दरिया की तरह ऊपर चढ़ेएली है।”

“तुम जो बंदर के समान चढ़े बैठे हो।”

“बात नहीं करने का अपन से‒चल साली-गैट लास्ट।”

“मां तुम्हें खाने को बुला रही हैं।”

अपन को नहीं खाने का।

“कब तक नहीं खाओगे?”

“जब तक ज्योतिष साला जिन्दा है।”

“मेरा तो कोई भाई ही नहीं, फिर तुम्हारा ज्योतिषी साला कैसे हो गया…नीचे तो आओ‒ज्योतिषी पर इतना गुस्सा क्यों?”

“वह साला एकदम फ्रॉड मालूम पड़ेला है।”

“ऐसा क्या हो गया…मैं भी तो सुनूं।”

“वह साला हमारा हाथ देखेला था…उस पर विश्वास करके अपन ने अंजू की शादी महेश से करा दी और खुद तेरे साथ शादी बनाया।”

“फिर…?”

“अरे‒साला अपन का भेजा फिर गएला था। न वो महेश मर के रहेंगा न तू…वह साला ज्योतिषी बोलेला है कि अपन की दूसरी शादी होकर टूट गएली है…अब अपन के हाथ में तीसरी शादी की लकीर ही नहीं है।”

“मगर तुम्हें तीसरी शादी करनी ही क्यों है?”

“अरे! अपन भी तो यही बोला था कि बात लड़कियों की नहीं शादी की है…अपन की दूसरी शादी अंजू से होकर टूट गएली और अब अपन को अगर तीसरी बार अंजू से शादी बनाने का है तो उसके लिए उपाय करना पड़ेंगा।”

“क्या उपाय?”

“अब तेरे को क्या बोलूं।”

“बोलो न…शायद मैं हल बता दूं।”

विवेक ने जब उसे ‘उपाय’ बताया तो देवयानी ने जोरदार ठहाका लगाकर कहा‒

“फ्रॉड-एकदम फ्रॉड-वह ज्योतिषी एकदम फ्रॉड है…वह समझता है कि तुम ऐसा नहीं कर सकते इसीलिए तुम्हें उसने ऐसा ‘खतरनाक’ उपाय बता दिया।”

विवेक कूद कर नीचे उतर आया और बोला‒

“क्या बोली? फ्रॉड है न वह ज्योतिषी…पर उसका आइडिया तो ठीक है न।”

“एकदम डायरेक्ट है न?”

“साला अपन धोखा खाएला?”

“सेन्ट परसेन्ट-ये लकीरें-वकीरें कुछ नहीं होतीं…आदमी अपनी ताकत से ही सब कुछ पाता है…यश अकल से…तुमने न ताकत का प्रयोग किया….न अकल से काम लिया।”

“साला अपन अपनी ताकत से अपनी प्रेमिका को खो दिया।”

“अब खुद सोचो‒अगर महेश का ऑपरेशन सफल हो गया तो क्या वह अंजला को तुम्हें सौंप देगा?”

“नहीं करेगा…उसका वाइफ हो गएला न।”

“रह गई मैं…तो मेरा क्या है…मैं तो एक ‘प्ले गर्ल’ हूं‒मुझे तुम्हारी बातों में आकर अंजू ने अपनी जगह दुल्हन बना दिया…मैं खुश हो गई, क्योंकि तुम्हें मैं पहले ही पसंद करती थी और अब शादी के बाद जब तुमने मेरे शरीर को हाथ भी नहीं लगाया तो मेरे लिए यह शादी का होना ना न होना एक बराबर है।”

“यानी तू अपन को छोड़ देगी।”

देवयानी फिर ठहाका लगाकर बोली‒”मैंने तुम्हें पकड़ कर ही कहां रखा है…अरे, मैं तो अपनी ‘लाइफ’ अपनी मम्मी की तरह जीना चाहती हूं…ईट ड्रिंक एंड बी मैरी…तुम मुझे हाथ नहीं लगाओगे तो तुम्हें मालूम है कि मेरे बहुत सारे दोस्त हैं।”

“पर अंजला…वह तो लगता है…महेश नहीं मरेंगा तो महेश को नहीं छोड़ेंगी।”

“बिल्कुल नहीं छोड़ेंगी…एकदम संस्कार वाली लड़की है। उसने महेश को अपना पति मान रखा है।”

“वह महेश के साथ सुहागरात भी मना ली होएंगी।”

“ऐसा तो नहीं हुआ होगा, क्योंकि महेश तुम्हारा दोस्त है…उसने कुछ तो ख्याल किया होगा अपनी बचपन की दोस्ती का।”

“फिर अपन को क्या करना है?”

“करना क्या है। ताकत का प्रयोग…अंजला को जबरदस्ती उठाकर कहीं ले जाओ।”

“इससे क्या होएंगा? पर उसे जिन्दगी-भर तो बंद करके रखने को नहीं सकता।”

“मेरे पास उसका भी आइडिया है…अगर एक बार अंजला की इज्जत लुट जाए तो वह अपने आपको महेश के योग्य नहीं समझेगी।”

“व्हाट!”

“अरे, हीरो के बच्चे-प्रेम करो तो मर्द भी बनो। दुनिया का उसूल है कि अगर सीधी उंगली से घी न निकले तो उंगली को टेढ़ा करना पड़ता है।”

“यानी…अपन…।”

“तुम उससे मुहब्बत करते हो और उसे पाना चाहते हो तो एक ही तरीका है‒एक बार उसकी इज्जत लूट लो…कुछ दिनों तक वह तुम्हें बुरा समझेगी‒महेश भी एक ऐसी औरत को वाइफ बना कर रखना पसंद नहीं करेगा जिसकी इज्जत लुट चुकी हो…फिर अंजला तुम्हें अपनाने पर मजबूर हो जाएगी।”

विवेक कमर पर हाथ रखकर सिर खुजा कर सोचने लगा।

देवयानी ने उसे ध्यान से देखते हुए कहा‒”क्या सोचने लगे?”

“यार अपन से यह होएंगा नहीं…अपन उससे ‘लव’ करेला है…उसके साथ जबरदस्ती कैसे करेंगा।”

“तो फिर भूल जाओ उसे।”

“नहीं…मैं उसको भूलने को भी नहीं सकता।”

“तो फिर…हिम्मत बांधो…एक बार तुम उसके साथ सुहागरात मना ही चुके हो…आदमी का इतना शरीफ होना भी अच्छा नहीं है…फिर तुम्हें किसी दूसरे की भलाई के लिए बुरा थोड़े बनना है‒तुम्हें तो अपनी भलाई करनी है…तुमने अपनी भूल से अपना प्यार खो दिया है अब अपनी शक्ति से प्राप्त करना है।”

“ठीक है‒मगर उसको उठाकर किधर ले जाएंगा?”

“कहीं भी ले जाओ…न ले जा सकते हो तो उसके बैडरूम में जा घुसो…एक बार पहले भी तुम उसके बैडरूम में पहुंच गए थे।”

“तब अपना इरादा उसे ‘रेप’ करने का थोड़े ही था?”

“अच्छा अगर अपन से उसके बंगले में कुछ ना हो सका तो?”

“तो मेरे यहां उठा लाना।”

“पर तुम्हारी मम्मी।”

“वह तो चौबीस घंटों में दो घंटे बंगले में होती है…वह भी नशे में…वैसे भी आज वह दिल्ली जाने वाली थीं। अगर तुमने यह काम आज करना हो तो आसानी से हो जाएगा‒मैं तुम्हें ‘आइडिया’ बताती हूं। चलो मेरे साथ और घबराओ मत।”

“ठीक है।”

दोनों कार में बैठ गए और कार चल पड़ी।

अंजला अपने नीचे वाले बैडरूम में अकेली थी…वह बहुत ‘बोर’ और उकताई हुई-सी लगती थी…वह रात जो उसने विवेक के साथ गुजारी थी, लगातार उसकी आंखों में घूम रही थी…और यह सोच-सोचकर उसका दिल बैठने लगता था कि अगर महेश का ऑपरेशन सफल हो गया तो विवेक या महेश…उसे उन दोनों में से एक के हक में फैसला करना पड़ेगा‒मगर अब यह सोचकर ही डर रही थी कि अगर उसने विवेक का पक्ष लिया तो वह विधवा हुए बगैर कैसे विवेक से शादी कर लेगी?

इस समय वह बंगले में अकेली थी‒जगमोहन फैक्टरी से नहीं लौटा था‒महेश पता नहीं कहीं गया हुआ था। अचानक टेलीफोन की घंटी ने उसे चौंका दिया। उसने रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया और बोली‒”हैलो।”

दूसरी ओर से घबराई हुई आवाज आई‒”कौन…अंजू बेटी।”

“मैं ही हूं…आप…।”

“जल्दी आओ…मालिक को हार्ट अटैक हो गया है…वह हस्पताल में हैं।” और बोलने वाले ने अपना परिचय दिए बिना टेलीफोन बंद कर दिया।

अंजला सिर से पांव तक कांप गई‒वह हस्पताल में हैं…यह भी पता नहीं कौन-से हस्पताल में? उसने जल्दी-जल्दी जूते पहने और बाहर दौड़ी। बाहर मंगली काका और नारायण मिल गए…नारायण ने पूछा‒

“क्या हुआ बहू रानी?”

“डैडी को हार्ट अटैक हो गया है।”

“हे भगवान!”

“मैं जा रही हूं‒कोई आए तो बता देना।”

“जी…बहूरानी।”

अंजला बाहर निकल कर दौड़कर गाड़ी में बैठी और गाड़ी फर्राटे भरती फाटक से बाहर निकल गई…फिर अचानक उसे ख्याल आया कि कौन-से हस्पताल में जाए…उसने गाड़ी साइड में लेकर फुल ब्रेक लगाए और इधर-उधर देखने लगी…गाड़ी में मोबाइल फोन भी नहीं था…वह दरवाजा खोल ही रही थी कि अचानक ‘स्टॉप’ पर विवेक नजर आ गया जो उसे देखते ही दूर से चिल्लाया‒”अंजू…!”

अंजला ठिठक कर रुक गई। विवेक जल्दी से सड़क पार करके आया और उसे ऊपर से नीचे तक देखकर बोला‒”क्या हुआ? घबराई हुई क्यों हो?”

“व…वो…ड…ड…डैडी।”

“क्या हुआ डैडी को? उनके पास जा रही हो?”

“हां…हस्पताल जा रही हूं‒उन्हें हार्ट अटैक हो गया है।” कहते-कहते अंजला की आवाज भर्रा गई।

“ओ गॉड! चलो, अपन भी तुम्हारे साथ चलेंगा।”

“मगर मुझे यह तो मालूम नहीं कि वह कौन-से हस्पताल में हैं…किसी नौकर ने फोन पर बताया था…जल्दी में हस्पताल का पूछना भूल गई।”

“अच्छा, तो पहले अपने बंगले चलो।”

“मैं वहां सामने से टेलीफोन किए लेती हूं।”

“इसकी जरूरत नहीं।”

“क्यों?”

“वह क्या है…अपन भी तुम्हारे पास आयला था।”

“मैं समझी नहीं।”

“अपन को देवयानी का फोन मिला था…वह बोली थी‒तुम्हारे बाप को अटैक होएला था।”

“उसने मुझे क्यों फोन नहीं किया?”

“तुम्हारे फोन की लाइन नहीं मिल रही थी‒वह तुम्हारी ओर आएली थी…अपन को मिल गई‒उसने अपन को बोला कि तुम्हारे को खबर कर दूं और खुद हस्पताल चली गई।”

“कौन-से हस्पताल?”

“भाभा।”

“हे भगवान!”

“चलो-अपन ड्राइव करेंगा…तुम अपने हवास में नहीं हो…कहीं एक्सीडेंट न कर दो।”

दोनों कार में बैठ गए। विवेक ने स्टेयरिंग संभाला और कार सड़क पर दौड़ने लगी…अंजला बहुत बेचैन थी।

“हे भगवान! क्या होगा?”

“काहे का?”

“डैडी का।”

“या तो मर जाएंगा या बच जाएंगा।”

“विवेक….!”

“अरे! दो में से एक ही बात तो होएंगा।”

“कभी-कभी अप्रिय बातें करने लगते हो।”

“अरे-अपन का बाप भी तो मरेला है।”

“तुम्हें अपने बाप के बारे में भी ऐसे नहीं कहना चाहिए।”

“अरे! तुम थोड़ी देर खामोश नहीं बैठने को सकती।” विवेक ने झुंझला कर कहा।

फिर जेब में हाथ डालकर वह बोला‒”अपन भूल गए, इसके बाद क्या करने का है…हां…याद आया” और उसने जेब से एक रूमाल निकालकर अंजला को थमाते हुए कहा‒

“लो यह रूमाल‒सूंघने का है इसे।”

“क्यों?” अंजला ने रूमाल लेते हुए पूछा।

“तुम सूंघ के तो देखो….।” उसने कुछ झुंझला कर कहा।

अंजला ने आश्चर्य से देखते हुए रूमाल सूंघ लिया और दूसरे ही क्षण उसका सिर सीट की ‘बैक’ से जा लगा…दोनों हाथ इधर-उधर गिर गए और आंखें बंद हो गईं…विवेक ने उसे हिलाकर पुकारा।

“अंजू…ऐ अंजू।” लेकिन अंजला तो गहरी सांसें ही लेती रही। विवेक ने सन्तोष की सांस लेकर रूमाल उठा लिया। कार देवयानी के बंगले में दाखिल हो रही थी, क्योंकि देवयानी के संकेत पर ही फाटक खुला रखा गया था…उसने सोचा होगा कि विवेक अंजला का अपहरण करके लाएगा तो कोई भी मूर्खता उससे हो सकती है…और वही हुआ भी।

विवेक ने रूमाल उठाते हुए गहरी सांस लेकर हड़बड़ा कर कहा‒

“थैंक्स गॉड! यह काम आसानी से हो गएला।” कहते-कहते उसने स्वयं भी रूमाल सूंघ लिया और दूसरे ही क्षण हड़बड़ा कर ब्रेक लगाया…मगर उसके सिर बैक सीट पर लगते-लगते भी कार एक ओर बाड़ में घुस गई…इंजन बंद हुआ और कार धचके से रुक गई।

एक नौकर और चौकीदार चिल्लाते हुए दौड़ पड़े…बरामदे में से देवयानी चिल्लाई‒”क्या हो गया?”

“छोटी मालकिन।” एक नौकर ने चिल्लाकर कहा‒”जंवाई बाबू आए हैं कार में…अंजू बिटिया के साथ…उनकी कार बाड़ में घुसकर रुक गई है।”

देवयानी दौड़ कर आई, उसने झांक कर देखा…दोनों बेहोश थे…विवेक का हाथ रूमाल के साथ सीट पर रखा था…देवयानी स्थिति को समझ गई। एक नौकर ने परेशानी ने पूछा‒

“क्या हुआ इन दोनों को मालकिन?”

“कुछ नहीं हुआ…तुम लोग कार को पीछे धकेलो।”

देवयानी ने इंजन न्यूट्रल करके कार पीछे कराई फिर स्वयं स्टेयरिंग संभालकर कार को पोर्च तक ले आई और नौकरों द्वारा विवेक और अंजला को अंदर पहुंचवाया। अंजला के लिबास से वह समझ गई कि विवेक ने स्कीम अनुसार ही काम किया है।

नौकरों के चले जाने के बाद उसने अपने लिए एक पैग बनाया और विवेक के लिए पूरा गिलास भर दिया‒स्वयं घूंट लेने लगी…नौकरों को उसने सिनेमा देखने के लिए छुट्टी दे दी…चौकीदार को भिजवा कर उसने स्वयं गेट अंदर से बंद कर लिया। अब बंगले में केवल वह अकेली होश में थी…वह बड़े आराम से बार-बार विवेक को देखती रही…ऐसा लग रहा था कि विवेक होश में आने वाला नहीं है…काफी देर लग सकती है।

देवयानी ने उठकर विवेक के पास बैठ कर उसके होंठों पर होंठ रख दिए और हौले-हौले उसके होंठों को स्वादिष्ट ‘आम’ की तरह चूमते-चूमते चूसने लगी…थोड़ी देर बाद विवेक के शरीर में हरकत पैदा हुई और देवयानी झटके से अलग हो गई।

विवेक ने आंखें फाड़ कर इधर-उधर देखकर कहा‒

“म…म…मैं कहां हूं?”

“स्वर्ग में।” देवयानी ने हंसकर कहा।

विवेक उछल पड़ा‒”हांय! अपन इधर आ गएला है।” फिर जल्दी से खड़ा होकर बोला‒”अंजू किधर है?”

“वह रही।” देवयानी ने दूसरे सोफे की ओर संकेत किया।

“थैंक्स गॉड!” विवेक बोला‒”अपन तो समझेला था दोनों गए।”

“क्या हुआ था?”

“अरे…सब कुछ तेरे बताए के मुताबिक होएला था…साला आखिर में, अंजाने में अपन ने वही रूमाल सूंघ लिया।”

देवयानी हल्का-सा ठहाका लगाकर बोली‒”तुम्हें इतनी जल्दी बच्चे से एडल्ट नहीं हो जाना चाहिए था।”

“काहे को?”

“बाद में बताऊंगी…यह गिलास उठाओ।”

“विस्की…नहीं, यह नहीं पियेंगे।”

“नहीं पियोगे तो ‘यह सब’ कैसे करोगे।”

“यार! अपन से नहीं होएंगा।”

“तो फिर भूल जाओ जिन्दगी-भर के लिए अंजला को।”

“नहीं…यह होने को नहीं सकता।”

“तो फिर उठाओ गिलास।”

विवेक ने गिलास उठाया और एक ही सांस में चढ़ा गया…फिर बुरा-बुरा-सा मुंह बनाकर उसने गिलास रख दिया और बोला‒

“यह साली इतनी कड़वी क्यों होती है?”

“सालियां तो बहुत मीठी होती हैं…लेकिन यह साली कड़वाहट के साथ जो उन्माद, जो नशा लाती है उसमें बहुत मजा होता है।”

“हट साली…तेरे को बदनामी सूझेली है।”

“वह तो अभी तुम्हें भी करनी है।”

विवेक का नशा धीरे-धीरे बढ़ने लगा था‒उसने अंजला की ओर देखकर होंठों पर जबान फेर कर कहा‒”यार! वह ज्योतिषी के बहकावे में आकर…अपन साला अपनी प्रेमिका को अपन के दोस्त को सौंप दिया था।”

“कोई बात नहीं…तजुर्बा हो गया…आगे ऐसा पागलपन नहीं करोगे।”

“एकदम नैवर।”

देवयानी ने फिर गिलास भर कर दे दिया‒”लो, हिम्मत और बढ़ जाएगी।”

विवेक ने गिलास लेकर आधा खाली कर दिया और लड़खड़ाती आवाज में बोला‒”अब तो यह साली लोहे की भी बन जाएंगी तो अपन इसको नहीं छोड़ेगा।”

देवयानी ने हंसी भरी नजरों से उसे देखा, फिर अंजला की ओर देखकर घूंट भरकर बोली‒”अब तुम अंजला को उठाकर नीचे वाले बैडरूम में ले जाओ जहां पहली बार मैंने तुम दोनों को मिलाकर एक कर दिया था।”

“काहे कू?”

“तो क्या यह सब यहां करोगे?”

“यार! तेरे को इतनी बेदर्दी से उसका नाम नहीं लेने का है।”

“क्यों?”

“अपने को तकलीफ होएंगा…साली अपन की प्रेमिका है और अपन उसके साथ ‘जबरदस्ती’ करेंगा…वह भी उस साला ज्योतिषी के बहकावे में आकर।”

“लगता है तुम अंजला के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकोगे।”

“नहीं होएंगा यार…अपन से नहीं होएंगा…साली यह भी नहीं बोलने का है…अपन इसे भूल जाए।”

“तो फिर एक काम करो…तुम उसी कमरे में चले जाओ…मैं अंजला को उस दिन की तरह इतनी मदहोश करके लाती हूं कि तुम्हें जबरदस्ती करनी ही न पड़े…वह खुद ही नशे में अपने आपको तुम्हें सौंप दे।”

“फिर?”

“फिर क्या-जब नशा उतरेगा तो उसे अपनी गलती का एहसास होगा और वह अपने आपको महेश के योग्य नहीं समझेगी…और महेश को आप ही छोड़ देगी।”

“अरे! तेरे भेजे में यह आइडिया पहले काहे को नहीं आया‒खाली-पीली इतना लफड़ा करने की क्या जरूरत थी?”

“अब आ गया…तुम जाओ तो सही।”

विवेक लड़खड़ाता हुआ उस बैडरूम की ओर चला गया। जिसमें उसने पहली बार अंजला के साथ सुहागरात मनाई थी-लगभग पन्द्रह मिनट बाद अंजला के शरीर में हलचल-सी हुई साथ ही उसके होंठों से कराह निकली-हाथ माथे की ओर गया और वह अपना माथा मलने लगी।

देवयानी ने गिलास हाथ में पकड़ कर उसके पास आकर पुकारा‒

“अंजू-ए अंजू।”

अंजला ने आंखें खोलकर देवयानी को देखा…फिर एक झटके से उठकर बैठ गई। इधर-उधर देखकर आश्चर्य से बोली‒”यह तो मेरा बंगला है।”

“हां-क्यों?”

“अरे…विवेक तो मुझे हस्पताल ले जा रहा था।”

“कौन-से हस्पताल?”

“भाभा हस्पताल।”

“मगर क्यों…तू विवेक के साथ क्यों जा रही थी? महेश को क्या हुआ?”

“मेरे बंगले में टेलीफोन आया था कि डैडी को हार्ट अटैक हो गया है।”

“तो विवेक तुझे कहां मिल गया था?”

“जल्दी में नौकर यह बताना भूल गया कि डैडी कौन-से हस्पताल में हैं…फिर रास्ते में मुझे ख्याल आया और मैं कार रोक कर कहीं फोन करने की सोच रही थी कि घर से फिर पता करूं कि सामने ही विवेक मिल गया…उससे मालूम हुआ कि डैडी को भाभा हस्पताल ले जाया गया है।”

“फिर?”

“मैं उसके साथ बैठ गई।”

देवयानी ने उसके लिए पैग बनाते हुए कहा‒”मगर तू बेहोश कैसे हो गई?”

“यही तो समझ में नहीं आता, क्या चक्कर था? विवेक ने मुझे एक रूमाल सूंघने को दिया, मैं सूंघ कर बेहोश हो गई थी।”

“और विवेक तुझे यहां ले आया।”

“मगर क्यों?”

“मुझे क्या मालूम?”

“अब मुझे शक-सा लगता है कि शायद उसी ने मुझे गलत टेलीफोन किया होगा।”

“तू यहां से फोन करके अपने बंगले से मालूम तो कर।”

अंजला ने उठकर फोन द्वारा डैडी के खास नौकर प्रभुदयाल से सम्पर्क किया‒”काका! डैडी कहां हैं?”

“अंजला बेटी! मालिक तो आज ही सुबह किसी काम के लिए मद्रास गए हैं।”

“वह ठीक तो हैं?”

“जी हां…भले-चंगे हैं।”

“अच्छा आ जाएं या उनका कोई फोन आए तो मुझे देवयानी के बंगले पर फोन कर देना।”

अंजला के चेहरे से सन्तोष झलकने लगा‒उसने देवयानी को बताया तो उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा‒”फिर किसी ने बहकाया है तुझे टेलीफोन करके…क्या वह विवेक नहीं हो सकता?”

“विवेक में किसी प्रकार का षड्यंत्र रचने की योग्यता नहीं है…मगर वह गया कहां?”

“पता नहीं…कार फाटक पर छोड़ कर चौकीदार को बताया था कि अंजला बेहोश पड़ी है, देवयानी को…खबर कर दो…और खुद चला गया…।”

“अगर उसके दिल में कोई गलत बात होती तो मुझे…छोड़ कर क्यों जाता।”

“उसने तुझे बताया था कि तेरे डैडी भाभा हस्पताल में हैं…मतलब है झूठ बोला था।” देवयानी ने पैग बढ़ाकर कहा‒”ले चीयर्स कर।”

“चीयर्स काहे का देवयानी…मैं इन दिनों एक बड़े अजीब दोराहे पर खड़ी हूं।”

“कैसा दोराहा?”

“डॉक्टर हैमरसन ने महेश के बचने की नब्बे परसेंट आस दिलाई है।”

“ओहो!”

फिर उसने घूंट भर कर कहा‒”महेश बोल रहा था कि अगर मैं चाहूं तो वह मुझे तलाक दे सकता है…मगर उसके तलाक देने से तो मैं विधवा नहीं हो जाऊंगी…मेरे हाथ की रेखाएं कहती हैं कि मेरा पहला पति मर जाएगा। हो सकता है वह बच जाए और दस-पन्द्रह बरस बाद मरे।”

“यह भी संभव है…ऐसी स्थिति में तू क्या करेेगी?”

“महेश ने ‘ऑफर’ किया है कि मैं विवेक को स्वीकार कर लूं और उसके साथ एडजस्ट करने के फैसले पर गौर करूं…लेकिन मेरी कुछ समझ में नहीं आता।”

“तू विवेक से प्यार करती है न।”

“बिल्कुल…आज तक मैंने उसकी छवि अपने दिल में बसा रखी है, किसी दूसरे मर्द को क्या, खुद महेश को भी वह स्थान नहीं दे पाई जबकि महेश भी मुझसे प्यार करता है।”

“क्या महेश!”

“हां देवयानी, वह मुझे कॉलेज ही से प्यार करता था‒विवेक उसका दोस्त है इसलिए उसने कभी मुझ पर यह प्रकट नहीं होने दिया।”

“फिर क्या फैसला करेगी तू?”

“कह तो रही हूं…अभी कुछ समझ में नहीं आया…इसलिए महेश के ऑपरेशन के बाद ही…अगर वह बच गया तो कोई फैसला करूंगी।”

“यानी…तू विवेक को भूल जाएगी।”

“कैसे भूल जाऊंगी।”

“शादी तो नहीं कर सकती न।”

“यही तो प्रॉब्लम है।”

“तो फिर भगवान से ‘मन्नत’ मान कि महेश मर जाए।”

अंजला ने झुरझुरी-सी लेकर कहा‒”नहीं देवयानी, मैं इतनी कठोर हृदय नहीं हूं…मुझसे ऐसा नहीं हो सकता…आखिर वह भी इन्सान है…इस समय उसके मस्तिष्क को यह आतंक घेरे हुए है कि शायद वह मर जाए…कोई भी अपनी खुशी से मरना नहीं चाहता।”

“चल जल्दी पैग समाप्त कर…दूसरा पैग लेना है।”

अंजला ने पैग खाली कर दिया और गिलास रखकर बोली‒”व…व…केक।” फिर उसकी जबान लड़खड़ा गई‒”हांय, यह क्या हो रहा है मुझे?”

“मदहोशी।”

अंजला ने हाथ उठाकर अंगड़ाई ली और बोली‒”बदन टूटने लगा है।”

“खाना लगवाऊं?”

“नहीं…इस समय खाना नहीं चाहिए।”

“फिर क्या चाहिए?”

“मालूम नहीं।”

“मैं बताती हूं…।” देवयानी ने उसे खड़ा किया और जोर से चिपटा कर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए…अंजला भी उससे बुरी तरह लिपट गई और बुरी तरह हांफने लगी। देवयानी ने कहा‒

“चल…तुझे जो कुछ चाहिए वह कमरे में है।”

“कमरा…क…क…किधर?”

देवयानी उसे बैडरूम में लाई जिसमें विवेक मदहोश पड़ा हुआ था…देवयानी ने उसकी ओर संकेत करके अंजला से कहा‒

“तुझे यह चाहिए।”

“अरे…यह तो…अपना विवेक है।”

“हां…विवेक….तेरा…चंद घंटों का हसबैंड।”

“ये…यह…यहां…कैसे…आ गया?”

“भगवान ने भेज दिया…तुझे जो चाहिए था मिल गया।”

देवयानी, अंजला को विवेक के पास बिठाकर चली गई।

अंजला ने विवेक को हिला-डुलाकर कई बार पुकारा, लेकिन विवेक पर तो गहरी मदहोशी छाई हुई थी…अंजला उसकी ओर देखती रही…फिर अनायास उसने विवेक के होंठों पर होंठ रख दिए…फिर गहरी मदहोशी के कारण स्वयं भी एक ओर लुढ़ककर खर्राटे लेने लगी।

Leave a comment