Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

बढ़ी हुई शेव, झाड़-झंखाड़ से सर के बाल और चेहरे पर मैल की पर्तें। यह था आनंद का आज का हुलिया। इस हुलिए को देखकर यों लगता था मानो वह स्वयं के व्यक्तित्व को पूरी तरह से भूल चुका था। इस समय वह एक सस्ते से होटल में था और जबसे यहां आया था, तबसे बाहर न निकला था।

अभिशाप नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

अशोक ने ठीक ही कहा था शायद। पागलखानों में अधिकांश संख्या उन लोगों की होती है जो किसी-न-किसी रूप में औरत की बेवफाई के शिकार होते हैं अथवा प्रेम में चोट खाते हैं। अपने कमरे की बालकनी में खड़ा आनंद इस समय यही सोच रहा था और यह भी सोच रहा था कि वह पागल तो नहीं है।

इस ओर एक मयखाना था-मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था-मोनी बार। आनंद ने बार के बोर्ड को पढ़कर घृणा से दांत पीस लिए। सोचने लगा-मनु एवं मोनी में अंतर ही कितना होता है। हो सकता है-बार के मालिक ने पहले अपने मयखाने का नाम मनु बार रखा हो और बाद में उसे बदलकर मोनी कर दिया हो।

कुछ भी था किन्तु यह बार उसे तभी से अपने पास आने का मौन निमंत्रण दे रहा था, जब से वह यहां आया था। बार से बाहर निकलते खिले-खिले चेहरे, होंठों पर मुस्कुराहट लिए झूमते लोग-आनंद को यों लग रहा था कि इस मयखाने के पास कुछ है। ऐसा कुछ, जो लोगों से उनके दुःख छीन लेता है। जो लोगों को मुस्कुराहटें भी देता है और खुशियां भी। फिर वही खुशियों से क्यों वंचित रहे-क्यों दबाए रहे अपनी मुस्कुराहटों को? जीने का और हंसी-खुशी जीने का अधिकार तो उसे भी है।

धीरे-धीरे वह विचार आनंद के मन-मस्तिष्क पर इतनी बुरी तरह से छा गए कि वह स्वयं को न रोक सका और होटल से निकलकर बार में पहुंच गया। अभी सांझ न हुई थी-अतः हॉल में उतनी भीड़ न थी।

आनंद ने बैठकर ऑर्डर दे दिया।

‘एक लॉर्ज पैग।’

‘ब्रांड?’

‘कोई भी।’

थोड़ी देर बाद वेटर ने उसके सामने व्हिस्की का पैग लाकर रख दिया।

आनंद ने धीरे-धीरे गिलास खाली किया।

मन को कुछ चैन मिला।

इसके पश्चात् दूसरा और फिर तीसरा पैग।

आनंद नशे में डूब गया। लगा-नशे की इस दुनिया में चैन था। वास्तव में खुशी थी। सब कुछ भूलता चला गया वह। किन्तु जब बिल चुकाकर बार से निकला तो कदम लड़खड़ा गए। अपने आपको संभालना कठिन हो गया। होटल का मुख्य द्वार अभी दूर था। किन्तु वहां तक पहुंचने से पहले ही टांगें जवाब दे गईं। एक साइड पोल का सहारा लेकर वह फुटपाथ पर बैठ गया।

किसी ने हुलिए से उसे भिखारी समझा और चंद सिक्के डाल दिए। आनंद ने सिक्कों को देखकर ठहाका लगाया। कितना विचित्र है यह संसार। बिना मांगे सब कुछ मिलता है और मांगने पर कुछ भी नहीं। हंसी रुकने पर उसने सिक्के डालने वाले व्यक्ति को देखा ओर पुकार कर बोला-

‘मैं भिखारी नहीं-नॉट बैगर।’

‘फिर कौन हो?’

‘दर्शन शास्त्र का प्रोफेसर-प्रोफेसर आनंद।’

दानदाता विश्वास न कर सका और व्यंग्य से बोला- ‘इसका मतलब है कि आप यहां बैठे जीवन के दर्शन का अध्ययन कर रहे हैं। वैसे-इन आते-जाते लोगों के विषय में आपका दर्शन क्या कहता है?’

‘दर्शन कहता है-यह भाग-दौड़ व्यर्थ है। मनुष्य को रुकना चाहिए-ठहरना चाहिए। जो ठहरता है-संसार की वास्तविकता को वही देख पाता है। जो दौड़ता है वह सब कुछ पीछे छोड़ देता है। वह उन लोगों को भी पीछे छोड़ देता है, जो उसके साथ चलते हैं। जो उसके अपने होते हैं, जिन्हें वह प्राणों से भी अधिक चाहता है।’

‘हुं!’ शायद पागल है।’ दानदाता बड़बड़ाया और आगे बढ़ गया। आनंद का यह दर्शन उसकी समझ से बाहर था।

आनंद फिर ठहाका मारकर हंस पड़ा।

तभी किसी ने उसका नाम लेकर पुकारा- ‘अरे! प्रोफेसर साहब! आप।’

आनंद ने चेहरा घुमाया। देखा-एक सुंदर-सी युवती उसके सामने खड़ी थी। आनंद उसे पहचान न सका। युवती इस बार उसके सामने बैठ गई और बोली- ‘प्रोफेसर साहब! मैं भारती हूं। भारती वर्मा। आप मुझे पहचान क्यों नहीं रहे हैं? और-आपने यह क्या हालत बना रखी है?’

‘मर गया है प्रोफेसर आनंद।’ नशे की वजह से पलकें झपकाते हुए आनंद ने कहा- ‘अभी दो दिन पहले मरा है। मैं यहां उसकी लाश को घेरे बैठा हूं। आप जानती हैं न-इस शहर में कुत्ते बहुत हैं। मुझे भय है कि कहीं वे कुत्ते उसकी लाश को न खा जाएं। और यह जो खाने वाले होते हैं मैडम! बहुत कमीने होते हैं। कच्चा-पक्का सब खा जाते हैं-न अपने को छोड़ते हैं-न पराये को। बचपना इन राक्षसों से। कभी मिल जाएं तो दूर से प्रणाम कर लेना।’

‘यह…यह आपको क्या हो गया है प्रोफेसर साहब?’

आनंद ने पीड़ा से मुस्कुराते हुए कहा- ‘कुछ भी तो नहीं हुआ मैडम! यूं ही चल रहा था एक राह पर। साथ में एक साथी भी था। साथी ने ठोकर मार दी-गिर पड़ा। क्या आप मुझ पर एक कृपा करेंगी?’

‘कहिए प्रोफेसर!’

‘सामने मेरा होटल है-रूम नंबर बीस। क्या आप मुझे मेरे होटल तक छोड़ सकती हैं? मैं…मैं चल नहीं पा रहा हूं। सहारा कोई मिला नहीं इसलिए बैठ गया।’

‘चलिए प्रोफेसर!’ भारती ने कहा और प्रोफेसर को सहारा देकर खड़ा कर दिया।

प्रोफेसर उसका सहारा पाकर चल पड़ा। चलते-चलते वह बोला- ‘यह-यह संसार भी बड़ा विचित्र है मैडम!’

‘क्यों?’

‘खुशियां भी देता है तो पल भर की। बस-एक पल के लिए हंसाता है यह किसी को। और आंसू इतने देता है कि जीवन भर बहाने से भी खत्म नहीं होते। क्या यह संसार अपनी इस नीति को बदल नहीं सकता मैडम!’

‘प्रोफेसर साहब! मेरा नाम भारती है। मैं आपके कॉलेज में फिलॉसफी की स्टूडैंट थी। आप मुझे पढ़ाते थे। अभी एक वर्ष पहले की तो बात है। समझ में नहीं आता-आप मुझे भूल क्यों रहे हैं?’

‘भारती-भारती वर्मा। है न?’ आनंद बड़बड़ाया।

‘हां प्रोफेसर साहब! मैं भारती वर्मा ही हूं। किन्तु आपको यह क्या हो गया है?’

‘अपनों ने धोखा दे दिया भारती वर्मा! अपनों ने ठोकर मार दी।’ आनंद के स्वर में अथाह पीड़ा थी। बोला- ‘निकाल दिया मुझे अपने संसार से। जैसे मैं उनका कोई था ही नहीं। जैसे-जैसे मेरा उनसे कोई रिश्ता ही न था।’

‘आपकी तो शादी हो चुकी है न प्रोफेसर साहब?’

‘नाम मत लो भारती!’ आनंद तड़पकर चिल्लाया- ‘नाम मत लो उस शादी का। वह शादी न थी-एक खूबसूरत नाटक था। मुझसे कहा गया था कि मैं दूल्हे का रोल अदा करूं। नाटक खत्म हुआ-तो दूल्हा भी खत्म कर दिया गया। धक्के मारकर उतार दिया गया मुझे रंगमंच से। अपमानित किया गया मुझे। बहुत संभव था कि मेरी जान भी ले ली जाती। इस किस्म के नाटकों में ऐसा हो जाना कोई बड़ी बात नहीं होती। किन्तु इसलिए नहीं-क्योंकि मेरे उस कातिल के हृदय में थोड़ी हया और थोड़ी दया भी थी।’

भारती मौन थी और मन-ही-मन आनंद की पीड़ाओं का अनुमान लगा रही थी। होटल आ चुका था। भारती ने गेट खोलकर प्रोफेसर को बिस्तर पर लिटा दिया और स्वयं कुर्सी पर बैठकर उससे बोली- ‘प्रोफेसर साहब! आपका तो घर था। फिर आप यहां?’

‘तकदीर ले आई।’

‘आपकी पत्नी?’

‘संबंध तोड़ लिया उसने। ठीक उसी तरह जैसे एक बच्चा कच्चे धागे को तोड़ डालता है।’

‘यह सब कैसे हुआ?’

‘दौलत की चमक ने अंधा बना दिया उसे। खो गई वह दौलत की दुनिया में। उसने दौलत के लिए मेरे हृदय को ठोकर मार दी और चली गई अपने पहले प्यार के पास। वह प्यार-जिसे वह निखिल वर्मा कहती है।’

भारती चौंक पड़ी। बोली- ‘निखिल वर्मा!’

‘हां!’ आनंद ने उठकर घृणा से कहा- ‘यही नाम है उस शैतान का। आज से एक वर्ष पहले वह भिखारियों की भांति घूमता था। न जाने कहां से उसे करोड़ों की दौलत मिल गई और वह दौलत पाकर राक्षस बन गया। हरामजादा खा गया मेरी खुशियों को। डस गया काला नाग बनकर। मेरी मनु को मुझसे छीन लिया उसने।’

भारती की आंखों के सामने उसके भाई निखिल का चेहरा घूमने लगा। वह मौन रही। आनंद कहता रहा- ‘मेरा वश चलता तो मैं उस कमीने का खून कर देता। मिटा देता उसे संसार से। आग लगा देता उसकी दौलत को। किन्तु-किन्तु मैं यह भी जानता हूं कि गुनहगार सिर्फ वही नहीं। गुनाह तो मनु का भी है।’

भारती बोली- ‘प्रोफेसर साहब! जो बीत चुका है-उसे भूल जाइए और अपने ढंग से जीने की कोशिश कीजिए। दर्शन शास्त्र का एक प्रोफेसर यूं किसी के प्यार में चोट खाकर पागलों जैसा जीवन जिए-यह अच्छा नहीं लगता। और फिर-आप तो स्वयं भी जानते होंगे कि जीवन में कभी-कभी ऐसा भी होता है। इंसान चोट खाता है-आघात सहता है किन्तु फिर भी जिंदा रहता है। इसलिए क्योंकि चोट खाने और आघात सहने का नाम ही जीवन है।’ इतना कहकर भारती ने अलमारी से आनंद का शेविंग बॉक्स निकाला और उसे मेज पर रखकर वह आनंद से बोली- ‘चलिए! उठकर शेव कीजिए।’

‘शेव-उससे क्या होगा?’

‘होगा यह कि जब आप नहा-धोकर दर्पण के सामने खड़े होंगे तो अपने आपको पहचान लेंगे। अभी आप स्वयं को भूल रहे हैं। उठिए-उठिए न प्रोफेसर!’ कहते हुए भारती ने प्रोफेसर को सहारा दिया।

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आनंद को उठना पड़ा।

और कुछ समय पश्चात् जब वह शेव एवं स्नान के बाद, दूसरे वस्त्र पहनकर भारती के सामने आया तो वह नशे में चूर फुटपाथ पर पागलों की भांति बैठा आनंद नहीं-बल्कि वास्तव में प्रोफेसर आनंद लग रहा था।

भारती उसे देखती रही।

आनंद का नशा अब उतर चुका था। भारती को यों अपनी ओर देखते पाकर वह उससे बोला- ‘आप मुझे यों क्या देख रही हैं?’

‘सोच रही हूं-यह दर्द भी किस बला का नाम है। इंसान को पूरा-का-पूरा बदल सकता है। स्वयं को दर्पण में देखा आपने?’

‘देखा तो है।’

‘शक्ल पहचानी-सी लगी?’

‘शक्ल तो वही है-किन्तु सोचने का ढंग बदल गया है।’

‘शुक्रिया प्रोफेसर! आपने कुछ तो बदला। अब मैं चलूं?’

‘बैठिए न-मैं आपके लिए चाय मंगवाता हूं।’

‘किन्तु एक शर्त पर।’

‘वह क्या?’

‘आज के पश्चात् आप शराब न पीएंगे।’

‘शराब इंसान की पीड़ाओं को कम करती है।’

‘पीड़ाएं कम नहीं करती-बल्कि बढ़ाती है। शराब यदि दर्द का उपचार होती तो आज इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति शराबी होता क्योंकि दर्द हर किसी के हृदय में है और हर कोई उसका उपचार चाहता है।’

‘आप?’ आनंद ने भारती को चौंककर देखा। मानो पूछ रहा हो कि क्या उसके हृदय में भी कोई दर्द है।’

भारती ने उत्तर दिया- ‘मैं भी उस दर्द से अछूती नहीं। किन्तु मैंने कभी शराब नहीं पी-बल्कि उस दर्द से समझौता किया है। तकदीर मानकर गले लगाया है उसे। कहते हैं-समझौता करने से दर्द भी मन का मीत बन जाता है।’

‘आपने विवाह तो कर लिया होगा?’

‘कॉलेज छोड़ने के दो माह पश्चात् ही विवाह हो गया था।’

‘बहुत सुखमय होगा आपका दाम्पत्य जीवन।’

‘अब तो सिर्फ जीवन रहा है-दाम्पत्य समाप्त हो चुका है।’

‘क्या मतलब?’

‘हम लोगों के संबंध लगभग समाप्त हो चुके हैं। आशा है-आने वाली पहली तारीख को तलाक हो जाएगा। पहली तारीख हमारे मुकदमे की अंतिम तारीख होगी।’

‘लेकिन-यह सब…।’

‘मनुष्य जब किसी के प्रेम से अधिक दौलत को महत्व देता है तो ऐसा ही होता है सर! इस मोड़ पर आकर गहरे-से-गहरे संबंध भी टूट जाते हैं।’

‘खैर!’ आनंद ने बातों का विषय बदला- ‘आप बैठिए-मैं चाय के लिए बोलता हूं।’ इतना कहकर उसने फोन का रिसीवर उठाया।

‘किन्तु मेरी शर्त।’

‘ओह-याद आया। आपने मुझे शराब पीने को मना किया था।’

‘जी हां।’

‘चलिए-वचन देता हूं।’

‘आप शराब न पिएंगे।’

‘हां-लेकिन।’

‘लेकिन क्या?’

‘जीना कुछ मुश्किल हो जाएगा।’

‘मैं आपकी पीड़ाओं को समझती हूं।’ भारती ने कहा। फिर कुछ सोचकर वह बोली- ‘अच्छा चलिए! आप अकेलापन महसूस न करें-अतः मैं आपसे मिलती रहूंगी। मेरा स्कूल इधर ही तो है।’

‘अच्छा! टीचर हैं आप।’

‘अकेला जीवन और व्यस्त न हो तो जीना कठिन हो जाता है सर! अतः एक पब्लिक स्कूल में टीचर हो गई। पूरा दिन यूं ही बीत जाता है। कुछ बच्चों के साथ-कुछ स्टाफ के साथ। पता ही नहीं चलता कि जीवन में कोई पीड़ा भी है।’

‘अच्छा किया-बहुत अच्छा किया आपने।’ आनंद ने कहा और इसके उपरांत वह रूम सर्विस के नंबर मिलाने लगा।

भारती बैठ गई।

अभिशाप-भाग-20 दिनांक 10 Mar. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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