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आॅफिस

उस दिन मेरी दोस्त कुमुद का फोन आया। शाम के वक्त उसके फोन से मुझे हैरानी हुई। वह मेरी सहकर्मी थी और आॅफिस के दौरान ही उससे सभी बातचीत हो जाया करती थी। शाम को फोन उसने इसलिए किया था कि अपनी बाई के हाथ का बेस्वाद खाना खा के वो बोर हो चुकी थी और खुद उसे खाना बनाना आता नहीं था, मैने उसे दो सब्जियों की विधि बताई और तद्नुरुप उसने बनाई।

    अगले दिन आॅफिस में वो चहकती हुई मिली। अलग और बेहतर स्वाद उसे काफी तृप्त कर गया था। मुझे हेरानी हुई कि मेरी हमउम्र, अच्छा खासा कमाने वाली मेरी कुंआरी सखी पाक कला में इतनी कमजोर थी की दो सब्जी, दाल भी खुद पका के नहीं खा सकती थी। शायद बचपन में उसने सीखा ही नहीं था।

    नौकरों से मदद लेना अच्छी बात है। व्यस्त दिनचर्या में वे हमारी काफी मदद कर देते हैं परन्तु उन पर पूर्णतया निर्भर होना सेहत और स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं। आजकल कैरियर बनाने के चक्कर में लडकियां बड़ी उम्र तक शादी नहीं करती।

    देखा जाता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं या अन्य पढाई के चलते बच्चे पढाई में ही व्यस्त रहते है। अभिभावक भी उन पर पढाई का बोझ देखते हुए कोई गृहकार्य नहीं लादते। पहले जहां घर की लडकियां थोडी बड़ी हुई नहीं, कि पूरे घर का चूल्हा-चैका, सिलाई-कढ़ाई व बुनाई सम्भालती थी अब वे भी लडकों की भांति पढना चाहती है।

    कम्पीटिशन के युग में लडका-लडकी बराबर पढें़, उन्नति करें, समान पदों पर समान योग्यता होने पर नौकरी करें, यह समय की मांग अवश्य है परन्तु माताओं को थोडा-थोडा बीच-बीच में उन्हे घर का काम भी सिखाना चाहिए। काम सहजता से बिना ज्यादा जोर दिए करवाने चाहिए ताकि बच्चें सीखें और गुणे भी।

    लाडली को ही नहीं लाडले को भी घर साफ करना, खाना बनाना, बर्तन मांजना, अपने कपडे धोना, नाश्ता बनाना, फस्र्ट एड और खरीददारी के कुछ गुर भी सिखाने चाहिए।

    आज की भागती-दौडती जीवन शैली में भले आप कितना भी अच्छा कमा लेते हो, रोज-रोज बाहर का खाना आप नहीं खा सकते। बाहर का खाना जेब पर भारी पडता ही है, स्वास्थ्य अलग चैपट होता है तिस पर नाना प्रकार की बिमारियों का डर रहता है।

    वे महिलाएॅं जिन्हे खाना पकाना नहीं आता अक्सर बाईयों पर निर्भर हो जाती है। बाई के नखरे उन्हे उठाने पडतें है और मुंहमांगी कीमत भी देनी पडती है। ससुराल में भी पाक कला न जानने वाली स्त्री को हृेय दृष्टि से देखा जाता है।

अत्यधिक पढ़ लिख के आपकी लाडली जब पराए शहर में बडे पैकेज की नौकरी करने जाती है तो सबसे बडी समस्या खाने की आती है, ऐसे में यदि वो खुद थोडा बहुत पका लेती है तो स्थिति दुश्कर नहीं बनती।

कई घरों में कुछ महिलाएॅं तो अपनी पाक कला के बल पर ही सर्वप्रिया बन बैठती है। अपने हाथों से बनाए व्यंजनों से न केवल वे घर परिवार के सदस्यों का दिल जीतती है बल्कि जान पहचान वालों को उनके जन्मदिन शादी की सालगिरह आदि शुभ अवसरों पर अपने हाथ के केक, पेस्ट्री वगैरह गिफ्ट करके उनके दिन को और स्पेशल बना देती है।

पाक कला में सम्पूर्णता महिला का आर्थिक सम्बल भी बन सकती है। कई घरों के चूल्हे टिफिन सेन्टर या ढाबों से चलते है और कई महिला उधमियों ने शुरुआत टोमेटो साॅस या केक से की थी। घर के छोटे-छोटे कार्य आने से बच्चों में आत्मविश्वास निर्मित होता है उन्हे कभी दूसरों पर निर्भर नहीं होना पडता। पोषण का समुचित स्तर भी उन्हे उपलब्ध होता है।
कुछ छोटे-छोटे टिप्स आप भी अपना सकते है जैसे:-

(1) छुट्टी वाले दिन बच्चों को अपनी चाय बनाने को कहिए। ब्रेड बटर सैन्डविच स्वंय के सामने उनसे बनवाइए। आसान कार्य करने से उनका समय भी खराब नहीं होगा और मनोबल भी बढ़ेगा।

(2) नूडल्स या भेलपुरी बनाने में आप उनकी मदद कर सकती हैं और पौष्टिकता के बारे में उन्हे बताना ना भूलिए।

(3) त्योहारों उत्सवों के मौके पर अपना कमरा उन्हे खुद साफ करने दें, सजाने दें। जिम्मेदारी के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता को भी बढा़वा मिलेगा।

(4) किताबें जमाना, जूते पाॅलिश करना, अपनी अलमारी खुद साफ करना जैसे कार्य बच्चों को बचपन से सिखाने चाहिए।

(5) कोई नई रेसिपी बच्चों के साथ मिल कर ट्राई करें। फन के साथ-साथ पाक कला में उनका झुकाव बढ़ेगा।

(6) घर की सजावट बदलते वक्त बच्चों से भी आइडिया माॅंगे उन्हे अच्छा लगेगा और हो सकता है आपको भी कोई बेहतरीन विचार मिल जाए।

(7) बच्चों को धीरे-धीरे किराने का सामान खरीदने भेजिए। उन्हे मेन्यूफेक्चरिंग डेट व एक्सपायरी डेट देखना सिखाए। एम.आर.पी. का ज्ञान दीजिए।

(8) बच्चों को स्टेप बाय स्टेप आटा गूंथना, रोटी बेलना, चावल बनाना, दाल बनाना और एक आधी सब्जी बनाना सिखाइए और उनसे बनवाइए। यदि डिश अच्छी बनती है तो तारीफ करना ना भूलें।

आवश्यकता सिर्फ अभिभावकों की दूरदर्शिता और सामंजस्य की है कि कैसे धीरे-धीरे वे अपने बच्चों को गृहकार्य में पढा़ई के साथ-साथ दक्ष करतें है क्योंकि यह भी उतना ही आवश्यक है।