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अनावश्यक खर्चे,

अचानक अधिक काम से आप थकने लगी हंै, चेहरे पर हल्की झुर्रियाॅ आ चुकी हंै, बाल सफेद हो चले हैं और आप अब बच्चों को खुद को दीदी कहने को नहीं कहतीं, आंटी शब्द सहर्ष स्वीकार्य हो गया है । महिलाएं खासकर जो हाउस वाईफ है अचानक खाली सी हो गई हैं । बच्चे अपने अपने कैरियर में व्यस्त हैं पति अपने काम में, ऐसे में “कल” की चिन्ता सताने लगी है।
आपको अपने भूत से ग्लानि होने लगी है। ऐसे सपने जो अधूरे रह गए, ऐसी ख्वाहिंशे जो आप पूरी नहीं कर पाई, वो सुलगाने लगी हैं।  यदि ये सब लक्षण आप महसूस कर रही हैं तो आप “मिड लाईफ क्राइसिस” से गुजर रही है।

क्या है मिड लाईफ क्राइसिस-
चालीस से पैंसठ वर्ष की आयु के बीच व्यक्ति जब यह समझता है कि बुढापा आने वाला है और उसमें शक्ति क्षीण हो चली है तो एक अवसाद सा उसे घेर लेता है । इसे ही “मिड लाईफ क्राईसिस” कहते है।

कारण-
चालीस से पैंसठ की उम्र में हममें से कई लोग जीवन साथी खो बैठते है । माता-पिता का साथ नहीं रहता, यौवन व सुन्दरता नहीं रहती ।  मोटापे व शारीरिक बीमारियों के हम शिकार हो जाते है,  कुछ को  बच्चे छोड के चले जाते हैं, ऐसे में ये विचार आने स्वाभाविक हैं।

लक्षण –
आप सेहत से जुडे विषयों पर अचानक संवेदनशील हो उठे हैं। अचानक अपने लुक्स को चेंज करने की इच्छा जन्म लेती है ।
अपने से छोटों के साथ वक्त बिताना, उनके जैसे लगना अच्छा लगता है ।
अपने से उम्र में कम विपरीत लिंगंी के प्रति आकर्षण रहता है । जवान दिखने, छोटा दिखने, पतले होने की तीव्र इच्छा होती है।

किसने पता लगाया-
इलियट जैक्यूज ने 1965 में एक अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित अपने पेपर “डेथ एवं मिड लाईफ क्राइसिस” में सर्वप्रथम इस शब्द का उपयोग किया था । उन्होंने माना कि इस उम्र में लोग अपनी मृत्यु को लेकर और जीवन में क्या खोया क्या पाया को सोचकर भयभीत रहते हैं।

कैसे उबरें-
“मिड लाईफ क्राइसिस” जीवन का अन्त नहीं है। थोडी समझदारी से आप इसे जीवन का बेहतरीन समय बना सकती है।
यह समय है स्वयं को टाइम देने का, जो काम, जो शौक आप व्यस्तता के कारण पूरे नहीं कर पाऐ या जिम्मेदारियों के चलते सम्भव नहीं हो पाये उन्हे आप अब कर सकते है।

विकल्प याद रखें-
आप उम्र के मध्य में है अंत में नहीं। आपके सामने अभी भी खुला आसमान है और पहले की अपेक्षा आप के पास ज्यादा विकल्प हंै।

वहमी मत बनिए-
हर छोटी स्वास्थ्य समस्या को गम्भीर रोग मत समझिए। अपनी बीमारी के लक्षणो को तवज्जो तब तक मत दीजिए जब तक कोई गम्भीर समस्या ना हो।

विवाहेत्तर सम्बन्ध मत बनाइए-
आपका पार्टनर अब चाहे कितना भी बोरिंग क्यों न हो गया हो, बुरा क्यों ना लगता हो स्वंय को देखियें आप में भी शारीरिक बदलाव आ रहे है।
अपने से छोटो से गैरवाजिब रिश्ते कायम मत कीजिए, यह समस्या बढ़ाएंगे।

काम को बोझा मत बनाइये-
काम कीजिऐं पर ज्यादा टेन्शन मत लीजिए। कार्य स्थल पर तनाव कई परेशानियों को जन्म देता है।

बच्चों से गैरवाजिब अपेक्षाएॅ मत पालिए-
जो काम आप जीवन में नहीं कर पाए, उसको करने को बच्चों पर दबाव मत बनाइये ।  वे विद्रोही हो सकते है या अवसाद में जा सकते हैं।

अनावश्यक खर्चे मत कीजिए-
अधेड़ उम्र के अवसाद को ढकने या छुपाने के लिए महंगी चीजें मत खरीदते रहिये। सौन्दर्य प्रसाधनों के पीछे मत भागिए। आपका गड़बड़ाता  बजट आपकी परेशानी बढ़ा देगा।

मोबाइल स्विच आॅफ रखें-
शाम को नहीं तो वीकेन्ड्स पर तो कम से कम मोबाइल बन्द रखे। अपनो के साथ आप वक्त बेहतर बिता पाएंगे।

अपनो के साथ समय व्यतीत करें-
घर परिवार, बच्चे, पार्टनर के साथ वक्त बिताए, अच्छा लगेगा।

नियमित व्यायाम करें-
नियमित व्यायाम और सेहतमंद भोजन से स्वयं को फिट रखें । दोस्त बनाइये ताकि खाली वक्त में आपका मन निराशा में न अटके । अपने मनोभावों को नियंत्रित करना सीखे ।
सेल्फ एस्टीम  उंची रखे । अपने बारे में हमेशा पाजिटिव सोचें । जीवन साथी से सम्बन्ध अच्छे रखंे । रचनात्मक बनिये । हाबीज़ बनाइए और परस्यू कीजिए । योगा, मेडीटेशन सीखिए ।

“मिड लाईफ” जीवन का अंत नहीं है, प्रारम्भ है। कहते भी है ना कि “लाईफ बिगिन्स एट फौर्टी”। अपने लिए आपके पास अब ज्यादा वक्त है। उम्र बढ़ने को सहर्ष स्वीकारें और अनुभव का धन जो आपने बटोरा है उससे आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करें। दुनिया में “ऐजिंग ग्रेसफुली” से अच्छा कोई काम्प्लीमेन्ट नहीं हो सकता।