वैसे तो मैं रोज जल्दी उठ जाता हूँ क्योंकि ऑफिस लेट पहुँचना मुझे कतई पसंद नहीं। मैं अपने परिवार से दूर अकेले रहता हूँ क्योंकि शादी अब तक हुई नहीं और गर्ल फ्रैंड की जरूरत कभी पड़ी नहीं। मैं व्यवस्थित रहता हूँ। अव्यवस्थित लोगों को देख मुझे चिढ़ होती है।एक बार बचपन में व्यवस्थापन टापिक पर पापा से जो लेक्चर सुना था, वो आज तक याद है और उस दिन के पश्चात आज तक मैं उसे बड़ी शिद्दत से  फॉलो कर रहा हूँ।

संगीत प्रेमी हूँ ।80- 90 दशक के रोमांटिक गीत धीमी आवाज में सुनना मन को भाता है।

  आजकल के कान फोडू संगीत मेरे समझ से परे है और उन्हें सुनना बर्दाश्त से बाहर  इसलिए मेरे कुछ दोस्त मुझे बूढ़ा तो कुछ आउटडेटेड बुलाते हैं, पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता और ना ही मैं उनकी बातों का बुरा मानता हूँ। मुझे रंग-बिरंगे फूल मनभावन लगते हैं इसलिए मैंने अपनी गैलरी में आर्टिफिशियल फूलों के पौधे सजा रखे हैं क्योंकि मिट्टी छूना मुझे कतई पसंद नहीं।

  ‎ आज मैं देर तक सोना चाहता था लेकिन सुबह से ही तेज म्यूजिक की आवाज और धड़ाम-धड़ाम का शोर सुन मेरी नींद खुल गई।मैं झुंझला कर उठा और गैलरी में जा खड़ा हुआ,जहां मेरे ठीक सामने वाले फ्लैट से म्यूजिक का शोर आ रहा था।शोर इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मुझे उस में शब्द समझ नहीं आते केवल शोर ही शोर सुनाई देते हैं ।मैं सोचने लगा इस फ्लैट में तो कोई नहीं रहता था,तभी एक खूबसूरत लड़की पर मेरी नजर पड़ी जो पाश्चात्य संगीत में झूमती हुई गैलरी में रखे पौधों में व्यस्त थी।उसे देख मेरी आँखें खुली की खुली रह गई।मृग जैसे उसके नयन, लम्बे रेशमी बाल जो हवा में उड़ते हुए उसके चेहरे पर आ रहे थे,मानो उसके गालों को चूमने के लिए आतुर हो,जिसे वह बार-बार अपनी बाहों से हटाने का असफल प्रयास कर रही थी।मैं अपलक उसे निहारने लगा तभी वह मुझे देख अपनी मिट्टी से सने गंदे हाथ हिलाती हुई बोली, “हाय” ,मैं झेप गया। फीकी सी मुस्कान के साथ उसके हाय का जवाब दे अन्दर आ गया।

 गुस्सा तो बहुत आ रहा था।आज छुट्टी के दिन मैं आराम से सोना चाहता था,पर उस लड़की के कान फोडू संगीत की वजह से ऐसा हो ना सका। मन हुआ जा कर उसे डांट लगा आवाज़ धीमी करने को कहूँ।ऐसा सोच मैं उठा ही था कि डोर बेल बजा।दरवाजा खोलते ही जगह -जगह से फटे जींस पर सफेद टी-शर्ट पहने,बिखरे बाल और हाथों में ट्रे लिए सामने वही लड़की खड़ी थी।

 “मैं अन्दर आ जाऊँ “

 कहती हुई मेरे बिना हाँ कहे अन्दर आ गई।ट्रे टेबल पर रखती हुई बोली-

 “माई सेल्फ खुशी । आप के सामने वाले फ्लैट में दो दिन पहले ही शिफ्ट हुई हूँ।योर गुड नेम”? 

 मैंने रूखे स्वर में कहा-“राजकिशोर “

 वह थोड़ा व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ बोली-

 ” नाम थोड़ा लम्बा है , इफ यू डोंट माइंड मैं आप को राज जी बुलाऊँ।मैं चिढ़ते हुए बोला-” मेरे दोस्त मुझे किशोर बुलाते हैं “। 

  ‎”वाव……. नाईस बट राज साउंड गुड सो मैं आप को राज जी ही बुलाऊँगी”। 

  उसने मेरे मर्जी के खिलाफ मेरा नामकरण कर दिया और मैं कुछ ना कर सका।

  ‎”चलिए ब्रेकफास्ट करते हैं।मैं आप के लिए भी आलू पोहा बना लाई हूँ। वीकएंड पर अकेले ब्रेकफास्ट करने में मज़ा नहीं आता”। 

  उसे इस प्रकार व्यवहार करता देख मुझे ऐसा लगने लगा कि उसकी बाहें पकड़ उसे बाहर निकाल दूँ ,लेकिन घर आए मेहमान को निकालना मेरे तहज़ीब के खिलाफ है फिर चाहे वह मेहमान बिन बुलाए ही क्यों ना आया हो।

  ‎  मेरे लिए वैसे भी ये नाश्ता ले कर आई है,तो क्यों ना नाश्ते पर ध्यान केंद्रित किया जाए।मैं गरमा-गरम आलू पोहा का आनन्द लेना चाहता था, किन्तु मेरा ध्यान भटकने लगा।मैं बार-बार उससे नजरें चुरा उसके खूबसुरत चेहरे को देखने लगा।उसकी बेकार की बक-बक ना चाहते हुए भी सुनने लगा।

  ‎   35 सालों में ऐसा पहली बार हो रहा था, मेरा दिल जो मेरे इशारे पर चलता था आज अचानक मुझसे विद्रोह करने लगा। मैं अपने दिल को काबू में नहीं रख पा रहा था,तभी उसने कहा-

  ” राज जी पोहे के बाद चाय मिलेगी क्या?” 

  मैं हड़बड़ा गया। कुछ कह नहीं पाया,तो उसने दोहराया नाश्ते के बाद अब एक-एक प्याली चाय हो जाए। किचन आपका है ।चाय आप बना लीजिए, इसी बहाने आप के हाथों की भी परख हो जाएगी।दिमाग चाय के लिए मना कर देना चाहता था,लेकिन कुछ देर पहले से ही मेरा दिल मेरी सुनना बंद कर चुका था,फिर दिल के आगे दिमाग की क्या औकात? दिल से हार कर मैंने कहा-

  ” हाँ हाँ,क्यों नहीं ! मैं चाय बहुत अच्छी बनाता हूँ । तुम पी कर तो देखो”। 

  ऐसा कह मैं किचन में आ चाय बनाने लगा। वह भी मेरे पीछे किचन में आ गई। फिल्टर से गिलास में पानी लेती हुई बोली-

  “वाव…. राज जी आपने तो किचन भी व्यवस्थित रखा है। मैंने गर्व से कहा-

 “अव्यवस्था और बिखराव मुझे पसंद नहीं”। 

मेरे ऐसा कहते ही वह संजीदा होती हुई बोली-

  ” कभी बिखर कर देखिए आपको जीना आ जाएगा”।

  उसका जवाब सुन मैं आश्चर्यचकित रह गया।चाय पी जब वो जाने लगी मैं अपना दिल मजबूत करते हुए बोला-

  ” आज के बाद तुम मेरे घर दोबारा नहीं आना लोग गलत सोचेंगे?

  वह मुस्कुराती हुई बोली-

  “यह भी आप सोचेंगे तो लोग क्या सोचेंगे”

  ‎      उसके जाने के बाद मेरी नज़रो में उसका चेहरा घूमता रहा।मेरा दिल मुझे धिक्कारने लगा-

  “मुझे उससे ऐसा नहीं कहना चाहिए था।” मैं सारा दिन उसके ख्यालों में खोया रहा।हर थोड़ी देर बाद मैं गैलरी में इस उम्मीद से जा खड़ा होता कि शायद वह दिख जाए पर वह नहीं दिखी।पूरा दिन उसे देखे बगैर ही गुजर गया और रात जागते हुए कटी।

  दूसरे दिन जब मैं ऑफिस जाने लगा, उसे आते देख मैंने अपनी कार धीमी कर ली। हवा में उड़ रहे अपने दुपट्टे को संभालती, हाथों में फाईल और कांधे पर बैग लटकाए वह आ रही थी। जैसे ही वह करीब आई,मैं कार रोकते हुए बोला-

  ” कहां जा रही हो खुशी आओ मैं तुम्हें ड्राप कर देता हूँ। 

  ‎”नहीं मैं चली जाऊँगी ” उस के ऐसा कहने पर भी मैं कार का दरवाजा खोल वहीं रूक गया, फिर वह कुछ कहे बगैर कार में बैठती हुई बोली-

  ” आप मुझे टैक्सी स्टैंड पर ड्राप कर दीजिए।मैं वहां से अपने ऑफिस चली जाऊँगी”।

  उसके बगल में बैठते ही मेरा दिल फिर बेकाबू होने लगा,मैंने कहा-

  ” कल के लिए आई एम सॉरी ” 

 ” ‎इट्स ओके. राज जी” वह मुस्कुराते हुए बोली। 

 दिल चाहता था ये वक्त यहीं थम जाए और वह ऐसे ही मेरे बगल में बैठी रहे।

 ” खुशी तुम मुझे राज कह सकती हो “जी” लगाने की जरूरत नही।” 

 मैं अपनापन जताते हुए बोला। वह खिल-खिलाकर हंस पड़ी और कहने लगी “आप मुझसे इतने बड़े है, मैं आप को केवल राज कैसे बुला सकती हूँ”।

 उसका इस प्रकार हंसते हुए कहना-

 ” आप इतने बड़े है” 

 मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। ऐसा लगा जैसे वह मुझे बूढ़ा कह रही हो।मैं थोड़ा झुंझलाते हुए बोला-

 “मैं तुम से ज्यादा बड़ा नहीं केवल 8- 10 साल ही बड़ा हूँ। 8-10, इस बार वह ठहाके लगाती हुई आश्चर्य से बोली।अब मेरा पारा चढ़ गया। मैं उखड़ते हुए बोला-

 ” इसमें हंसने की क्या बात है?”

  “सॉरी…. सॉरी…. राज जी लगता है आप बुरा मान गए”- वह अपनी हंसी रोकती हुई बोली। 

  मैं भी अपने आप को सामान्य करता हुआ बोला-

  ” नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं”। 

  अचानक उसने कहा – “राज स्टॉप द कार” 

  मैं समझ ही नहीं पाया -” क्या हुआ?”

   “मेरा स्टापेज आ गया”। 

   मैं इस प्रकार खोया था कि मुझे पता ही नहीं चला कब टैक्सी स्टैंड आ गया। ऑफिस के लिए मुझे लेट हो रहा था उसके बावजूद मैं चाहता था उसका साथ यूं ही बना  रहे,इसलिए मैंने कहा-

   ” चलो मैं तुम्हें ऑफिस छोड़ देता हूँ “।

   वह नहीं मान रही थी लेकिन मैं दिल के हाथों मजबूर हो पहली बार किसी की खुशामद करने लगा,और उसे ऑफिस ड्राप कर के ही दम लिया।

 ‎   अब तो यह रोज का सिलसिला हो गया था।मैं ऑफिस के लिए तभी निकलता जब वो निकलती।मैं अपना दिल एक ऐसी लड़की पर हार चुका था,जो मुझसे बिल्कुल अलग थी।जिससे ना तो मेरे विचार मिलते थे और ना ही व्यवहार। हाले दिल बयां करने के मैं मौके ढूढ़ने लगा। रोज इजहारे मोहब्बत की प्रैक्टिस करता, पर जैसे ही वह सामने आती एग्जाम हॉल में आए क्वेश्चन पेपर को देख जो हालत एक स्टुड़ेन्ट का होता वैसी ही स्थिति मेरी हो जाती और मैं कुछ ना कह पाता।

  एक रात अचानक 10 बजे डोर बेल बजा, दरवाजा खोलते ही सामने वही खड़ी थी। उसे देख मेरा दिल फिर तेजी से धड़कने लगा । मैंने उसे अन्दर आने को कहा पर वह नहीं आई,शायद उसे मेरी उस दिन की बात याद थी। वह बाहर से ही बोली, ” कल मैंने घर पर पूजा रखी है ,आप जरूर आईएगा।इतना कह वह चली गई।मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि कल मैं उसे अपने दिल की बात कह कर ही रहूंगा। दूसरे दिन मुझे ऑफिस जाना था लेकिन मैं नहीं गया ।ऐसा भी पहली बार हुआ जब मैं अकारण ऑफिस नहीं गया।

 सुबह से ही मैं उसके घर जाना चाहता था परंतु कॉलोनी की महिलाओं और बच्चों को उसके घर पर आता जाता देख मैं हिम्मत ना जुटा सका।बहुत कम समय में उसने केवल मेरा ही नहीं, कॉलोनी में सभी का दिल जीत लिया था।पूरा कॉलोनी उसी के रंग में रंगा दिखने लगा। 

 जब शाम को मैं उसके घर पहुँचा, दरवाज़ा खुला मिला । मुझे देखते ही वह बोली-

 “आईए राज मैं आपका ही इंतज़ार कर रही थी,आप लेट हो गये”। 

 आज उसे एक और नये रूप में देख, मैं देखते ही रह गया। लाल रंग की साड़ी पर गोल्डन बॉर्डर उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रही थी। माथे पर कुमकुम, हाथों में चूड़ियां देख मैं मदहोश हो लड़खड़ाने लगा तभी वह मेरे हाथों में प्रसाद रखते हुए बोली-    ” प्रसाद लीजिए” 

 मैं प्रसाद एक ओर रखते हुए बोला-

 ” खुशी तुम रहने वाली कहाँ की हो”।

  मेरे सवाल पर उसने सवाल किया-“क्यों?”

   ‎मैंने कहा-” बस यूं ही, तुम्हारा घर कहाँ है?तुम्हारे माता पिता कहाँ रहते हैं ?” 

   मेरे इस सवाल पर उसकी आँखें डबडबा गईं और वह मेरी ओर पीठ कर खिड़की से बाहर देखने लगी।उसका इस प्रकार शांत हो जाना मुझे अजीब सा लगा ।मैं थोड़ी देर मौन रहा फिर उसके करीब जा उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए बोला-

   ” क्या मैंने तुमसे कोई गलत सवाल पूछ लिया”?

   आज मैंने पहली बार उसके हाथों को थामा था लेकिन वह कोई विरोध किये बगैर बोली-

   ” नहीं,आप ने कोई गलत सवाल नहीं किया,मगर मेरे पास आप के सवाल का कोई जवाब नहीं,क्योंकि मुझे पता ही नहीं मेरे माता पिता कहाँ है?जब से होश संभाला है मैंने अपने आपको अनाथालय में ही पाया है। ” 

   ऐसा कहती हुई वह मेरी बाहों में बिखर रोने लगी।मैं उसे अपने सीने से लगा उसके स्पर्श को महसूस करने लगा तभी आवाज आई ‘खुशी’। वह  मेरी बाहों से निकल तेजी से आवाज की ओर चली गई।सामने सुडौल नवयुवक रेशमी पैजामा कुर्ता और माथे पर तिलक लगाए खड़ा था।उसे देख उसकी बाहों में वह अपनी बाहें डालती हुई बोली-

    “विक्की ये…” 

    उस युवक ने उसके होठों पर ऊँगली रख बीच में रोकते हुए और उसके कांधे पर अपनी बाहें डालते हुए बोला-

    ” ये राज जी हैं ।  एम आई  राइट “?

    वह खिलखिला कर हंसती हुई बोली-” यस यू आर राइट ” ऐसा कहते हुए दोनों मेरे समीप आ खड़े हुए और फिर वह मुस्कुराती हुई बोली – 

     ” राज ये हैं मेरे पति विक्की। हम ने कल ही कोर्ट मैरिज ‎की है।ये भी  मेरी तरह अनाथ आश्रम में ही पले- बढ़े हैं ।दोनों को खुश देख मेरी आँखें भी खुशी से छलक गईं ,उन्हे प्रणय सूत्र में बंधा देख कर नहीं बल्कि स्वयं के स्वतंत्र रह जाने की खुशी में। मैं पूजा की प्रसाद ले घर लौट आया और पुनः अपने कमरों को व्यवस्थित करने में व्यस्त हो गया।

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