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काम की चमड़ी-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Work Skin Story
Kaam ki Chamdi

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Work Skin Story: अपनी मां के मना करने के बावजूद भी अंबा ट्रांसपोर्ट कंपनी में जा कर कंडक्टर बन गई। उसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी। घर का सारा उत्तरदायित्व उसके बड़े भाई और भावज पर था। शायद मां के इनकार का कुछ असर हो भी जाता, यदि अंबा की भाभी पर अधिक मंहगाई होने के कारण और भाई का अंबा की नौकरी करने के हक में होने के कारण ही ऐसा संभव हुआ। लेकिन इससे यह अनुमान बिलकुल नहीं लगा लेना चाहिए कि अंबा के भाई-भाभी के दिल में उसके लिए कोई स्नेह भाव नहीं था। नहीं, वे उसके उतने ही शुभचिंतक थे, जितने अन्य भाई-भाभी हो सकते हैं। वे चाहते थे कि अंबा की शादी किसी संपन्न परिवार में हो। परन्तु वे चाहते थे कि लड़के वालों का अच्छा-खासा व्यापार हो या चांदनी चौक जैसे बाजार में कपड़े या मुनियारी की या जूतों की भी अच्छी चलती दुकान हो या लड़का किसी सरकारी नौकरी में सौ-सवा सौ तनख्वाह पाने वाला क्लर्क ही हो? परन्तु दुख इस बात का था कि अंबा के मुंह पर चेचक के दाग थे। उसके भाई-भाभी, जहां कहीं भी उसके रिश्ते की बात चलाते, उस परिवार को अंबा के मुंह पर दाग होने की सूचना पहले ही मिल जाती थी।

अंबा को ऐसा महसूस होता कि पड़ोसियों की बेटी सरूपा, जो सचमुच ही सुंदर थी, उन परिवारों के यहां जा कर उसके चेहरे की चुगली कर के आती थी। पिछले अठारह-बीस बरस से, जब से उन दोनों ने होश संभाला था, (इस बात से यह अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि उन दिनों अंबा की आय कम से कम तेईस बरस की होगी।) उसकी सगाई की बातें चलते भी पांच बरस से ऊपर हो गए थे। जबकि सरूपा उसे न केवल चिढाती थी बल्कि कई बार जलाती भी थी। ऐसे में सरूपा या किसी अन्य चुगलखोर को क्या दोष देना. जब इस कलयुग में या तो लडके स्वयं लडकी देखने की मांग करते थे या किसी बुआ, बहन या भाभी को लडकी देखने भेज देते थे। अंबा को इस प्रकार से किसी लड़के को अभी तक दिखाया नहीं गया था परन्तु अनेक औरतें अंबा को इस प्रकार आ कर, देख कर जा चुकी थी। पता नहीं, उन औरतों के मनों में अपनी जात के लिए हमदर्दी एकदम से कैसे खत्म हो गई थी, किसी ने भी अभी तक अंबा को पसंद नहीं किया था। अचरज की बात तो यह थी कि समय-समय पर अंबा को देखने आई इन औरतों में से एक के दांत ऊंचे थे और वह केवल ब्याही ही नहीं हुई थी बल्कि उसके चार बच्चे भी थे। अन्य एक के चेहरे पर अंबा से अधिक दाग थे। “अरी मरजाणी! तुझे भी मैं पसंद नहीं आई।” अंबा सोचती। अंबा से अधिक दागों वाली औरत स्वयं कोई अनब्याहता टीचर, टाईपिस्ट या कंडक्टर नहीं थी, वह भी किसी घर की रानी थी, जिसका उदाहरण उसके हाथों, कानों और नाक में पहना कम से कम दस तोला सोना इस बात की गवाही दे रहा था। शायद उसके भी दो-चार बच्चे हो, लेकिन वह किसी को भी साथ नहीं लाई थी और पता नहीं उसे किस बात का हौसला था कि दस तोले सोने के अलावा, उसका शरीर कहीं से भी ढीला नहीं था।

यदि कोई बच्चा अभी तक नहीं है, अंबा ने सोचा, और अगले चार-पांच सालों में भी बच्चा ना हुआ तो यह भी मेरी तरह कहीं दिल्ली ट्रांसपोर्ट में कंडक्टर की आसामी तलाश करेगी। यह सोच कर अंबा के होंठों पर मुस्कान आ गई।

अब जब अंबा ने कंडक्टरी करने का मन बना ही लिया जो उस समय उसकी उम्र पच्चीस बरस से कम की नहीं थी। उसके भाई-भाभी उसके लिए लड़का तलाश करते-करते थक चुके थे। नौकरी करते हुए उसे अभी एक ही महीना हुआ, परन्तु उसे इस एक महीने में बहुत मजा आया था। हालांकि वह कश्मीरी गेट से ले कर लोधी गेट तक के ही टिकट काटती थी, मुसाफिरों को चढ़ाते और उतारते हुए, खड़े-खड़े उसकी टांगें घुटनों से थक जाती परन्तु उसे यह नौकरी पसंद आ गई थी। एक बात और थी, जब कोई पुरुष उसे टिकट काटते हैरानी से देखता तो अंबा को अपनी जीत का एहसास होता। यह ठीक है कि अधिकतर व्यक्ति पैंतीस-चालीस से ऊपर की आयु के होते थे। नौजवान लड़के जब उसकी ओर देखते तो उनकी आंखों में अंबा को शरारती चमक दिखाई देती, जैसे वे अंबा पर हंस रहे हो और उसके चेहरे पर पड़े दागों की ओर देख रहे हो। मगर अब ऐसे नौजवान लड़कों की अधिक परवाह न करती और टिकट काट, पैसे ले कर परे हो जाती। परन्तु अधेड़ पुरुषों के पास टिकट काटते जाते समय उसे काफी रस आता। उनके पास खड़े हो कर उसे अपने लकड़पन पर गर्व महसूस होता।

एक दिन तो एक ऐसे ही यात्री ने अपने साथी के साथ, जो पांच बच्चों वाली थुल-थुल करती उसकी बीवी ही थी, ने अंबा की उम्र का अनुमान मात्र सत्रह बरस का ही लगाया था। इतनी छोटी लड़कियों को नौकरी पर रख लेने की अनुमति कानून द्वारा नहीं होनी चाहिए, उसने कहा था। उसकी थुल-थुल करती बीवी ने जवाब में कहा, वह सत्रह की नहीं, कम से कम बीस की अवश्य होगी। अंबा का भी जी चाहा, यदि कानून की आज्ञा हो और उसका पति उसके साथ न उतरे तो अंबा उसे एक पल भी और बस में बैठने न देती। बाकी रही खड़े-खड़े थक जाने वाली बात, उसका अंबा के पास एक ही इलाज था, भले इस में जरा-सी शरारत भी शामिल थी परन्तु अंबा को लगता, इस उम्र में इतनी शरारत तो की जा सकती है। फिर उन व्यक्तियों के साथ, जो उसके मां-बाप की आयु के थे। वह शरारत केवल यह थी कि वह कई बार टिकट काटते समय, किसी पुरुष के साथ सट कर खड़े होकर, उस पर अपना थोड़ा-सा भार डाल देती थी। पुरुषों की इस कमजोरी को भांपते हुए, अंबा जान जाती कि उसके द्वारा ऐसा करने पर वह व्यक्ति बड़ा खुश हो रहा होता था। उसके अंगों को सहारा देने के लिए वह अपने पूरे शरीर को गद्दा बना कर बिछ जाने के लिए तैयार होता था।

“हाय बेचारा! यदि तू क्वांरा होने पर या इतनी उम्र बीत जाने पर तीन बच्चों का रंडवा बाप भी हो और अगर मेरा भाई तुझे मेरे साथ रिश्ता जोड़ने के लिए कहेगा, तब यकीनन मेरे चेहरे पर चेचक के दाग देख कर तुम साफ इनकार कर दोगे।” अंबा कई बार सोचती। उसे याद था कि ऐसे ही एक पैंतीस बरस से अधिक उम्र वाले आदमी, जिसके तीन बच्चे थे और उसकी पहली पत्नी की मृत्यु हुए अभी छः महीने से अधिक नहीं हुए थे। उसने किसी बहाने से अंबा को देखा और कहा, अंबा के चेहरे पर चेचक के दागों की मुझे कोई इतनी परवाह नहीं, बस अंबा दो इंच और लंबी होती तो…। उस दिन से अंबा को अपने मंझोले कद का एहसास अधिक चुभने लगा था।

एक दिन ऐसे ही तीस बरस के मुसाफिर पर अपना थोड़ा-सा भार डाल कर अंबा टिकट काट रही थी कि उस मुसाफिर ने उस में रुचि दिखाते हए अपनी बांह को अंबा की पीठ पीछे लगा दिया. जैसे उसे और सहारा दे रहा हो। उस मुसाफिर द्वारा ऐसा करने पर अंबा जैसे सपने से जाग उठी। उसने सावधानी से खडे होते हए उस मसाफिर की ओर देखा. तब उसकी हैरानी की हद ना रही कि तीन साल पहले यही मुसाफिर उसके साथ रिश्ते से इनकार कर चुका था। अंबा का जी चाहा, उसके मुंह पर एक तमाचा जड़ते हुए उससे पूछे, “बेगैरत आदमी, अब क्या मेरे चेहरे के दाग साफ हो गए हैं या मैं दो इंच और लंबी हो गई हूं?” इसी समय उसे स्त्री सभा की सैक्रेटरी सुल्खणा की बात याद आ गई कि, ‘अब की स्त्री, समाज के जुल्मों तले पिस कर, वेश्या नहीं बनेगी। वह इस जुल्म का, नौकरी द्वारा, अपनी आर्थिक स्वाधीनता स्थापित कर के, समाज से टक्कर लेगी। इस समय अंबा को अपनी आर्थिक स्वाधीनता का एक सुहावना और जीत भरा अनुभव हुआ। वह इस तीस बरस के व्यक्ति को माफ कर, दूसरे स्थान पर जा खडी हुई।

इसमें शक नहीं कि जिस दिन से अंबा नौकरी पर लगी थी, उसे अपने स्वास्थ्य में अंतर महसूस होने लगा था। उसे भूख दिल खोल कर लगती थी। हालांकि राशन वाले दिनों में भी वह खाना पहले जितना ही खाती थी, परन्तु उसमें से भी उसी अधिक खुराक मिलती प्रतीत होती थी। पहले सप्ताह, जैसे उसकी टांगे खड़े-खड़े ही टूटने लगी थी, इस बात ने उसका हौसला करीब-करीब तोड़ दिया था और उसे इस बात का डर लगने लगा था कि कहीं वह बीमार न पड़ जाए और इस कारण, उसके पास से यह नौकरी छिन न जाए। परन्तु दूसरे सप्ताह, उसे टांगों में कम दर्द महसूस हुआ। उसे लगने लगा, जैसे वह पहले से अधिक मजबूत हो रही हो। कोई माने या न माने, शीशे में अपना चेहरा देखते हुए, उसे अपने दाग कुछ मद्धम प्रतीत होने लगे थे। इस मौके, वह अपनी अंगुलियों के पोरों को अपने गालों पर छुआ कर देखती, जहां दाग अधिक गहरे थे। उसे मानो शीशे पर एतबार ना आता। उसके पोर शायद उससे सच कहते या झूठ-मूठ का प्रभाव देते कि उसके दाग कम हो रहे थे। मगर अंबा स्वयं से कहती, “अब मुझे इन दागों के गहरे या कम होने की कोई परवाह नहीं. मझे अब कौन-सी विवाह की परीक्षा में बैठना है?” हालांकि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अंबा के मन में विवाह की भावना नहीं रही थी और ऐसी भावना का मर जाना भी कोई अच्छी बात नहीं थी। लेकिन इतना अवश्य था कि अंबा को अब वर प्राप्त न होने का अफसोस कम होता जा रहा था।

कल उसे महीना खत्म होने पर तनख्वाह मिली थी, पूरे सौ रुपए। यह सौ रुपया लेकर अंबा उत्साहित-सी घर पहुंची। इतना उत्साह उसमें उस समय भी न होता, जब वह विवाहित होने पर अपने पहले प्रसव के लिए मायके आई होती। तनख्वाह का यह सौ रुपया उसने अपने पास नहीं रखा। वह इतनी स्वार्थी और निर्मोही नहीं थी। और ना ही उसने यह तनख्वाह अपनी मां को दी, क्योंकि मां के हाथ में घर की जिम्मेवारी नहीं थी। यह सौ रुपया उसने अपनी भाभी को दिया। नैतिकता की बात भी यह थी कि यदि उसे ये रुपए संभाल कर भी रखने होते तो वह भाभी के अलावा किस के पास रख सकती थी? अंबा का भाई, घर का कर्ता-धर्ता भी तो अपनी तनख्वाह ला कर भाभी को ही देता था। भाभी ही इस घर की वास्तविक भंडारन थी।

“अंबा बीबी! तुम अपने ये रुपए अलग रखो। अपने भाई को देना ताकि वह इसे डाकखाने में जमा करवा दे। हम तुम्हारे पैसे इस्तेमाल नहीं करेंगे।” भाभी ने कहा।

“मेरा बैंक तो भाभी जी आप ही है।” अंबा ने जवाब दिया।

इस बात पर भाभी ने अंबा को गले लगा लिया और उसके दागों वाले माथे को हल्का-सा चूम लिया।

अंबा को भी भाभी बहुत अच्छी लगी और उसने भी भाभी को प्यार से अपने साथ कस लिया। सच है कमाते-खाते को दुनिया प्यार करती है और प्यारी भी लगती है।

मगर बात तो करने वाली आज की है, जब अंबा एक मुसाफिर को अपने साथ घर लाई थी। वह मुसाफिर पड़ोस के किसी घर में जाने के लिए जोर दे रहा था। अंबा उससे कह रही थी, “घबराओ नहीं। मैं खुद तुम्हें वहां छोड़ आती हूं। तुम मुंह-हाथ धो लो।”

आज अंबा अपने इस दिन के आखिरी फेरे में कश्मीरी गेट की ओर आ रही थी। उसके बाद उसे घर ही लौटना था। यह व्यक्ति उसे बस में मिला। अंबा प्रतिदिन की तरह ही जवान लड़कों और स्त्रियों से बच कर खड़ी हो कर किसी अधेड़ व्यक्ति का सहारा ले कर टिकट काट रही थी। उस समय उसने एक मुसाफिर से पूछा, “कहां जाना है?” इस मुसाफिर का चेहरा उतरा हुआ था और उसकी आंखें भरी हुई थी। लेकिन अपने काम में व्यस्त अंबा का ध्यान उसकी ओर कहां था? केवल मुसाफिर की भर्राई आवाज ने अंबा का ध्यान अपनी ओर खींचा।

“सरूपा!” अंबा ने हैरान हो कर कहा।

“तुम, अंबा!” उसने अपनी भर्राई आवाज को थोड़ा स्पष्ट करते हुए कहा, “तुमने नौकरी कर ली?”

यह प्रत्यक्ष था और अंबा को प्रत्यक्ष को प्रमाण देने की क्या आवश्यकता थी? सरूपा ने जब कश्मीरी गेट तक की यात्रा के लिए आवश्यक किराया अंबा की ओर बढ़ाया तो औपचारिक तौर पर अंबा ने उसे लेने से इनकार कर दिया, फिर अपनी नौकरी की मजबूरी समझ कर पैसे ले लिए।

अंबा के मन में सरूपा के लिए स्नेह था। अंबा उसे टिकट दे कर उसके पास ही बैठ गई। तब सरूपा ने बताया कि वह आज अकेली अपने मायके कश्मीरी गेट की ओर क्यों जा रही थी। उसकी आंखें भरी हुई थी। सरूपा ने बताया, उसका पति, जो बडे दफ्तर में छोटा अफसर था, अपने घर में दूसरी औरत ले आया था, जो सरूपा से अधिक सुंदर भी नही थी। परन्तु आज लड़ाई-झगड़े के बाद उसने सरूपा को बांह से पकड़ कर, घर से निकाल दिया था।

अंबा को पूर्ण रूप से अपने जीवन की सफलता का एहसास उस समय हुआ, जब वह सरूपा को उसके मायके छोड़ कर वापस घर आई। उस समय अंबा की भाभी ने बताया, वह तीन बच्चों का बाप, रंडवा व्यक्ति, जो कुछ वर्ष पहले अंबा से रिश्ता करने से इन्कार कर चुका था और जिसके बारे में केवल अंबा को ही मालूम था कि एक दिन वह बस में अंबा से प्राप्त हुई नयी शक्ति का सबूत दे चुका था, उसने अंबा के साथ रिश्ता करने के लिए संदेश भिजवाया था।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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