विविधता को एकता के सूत्र में पिरोते भारतीय संस्कृति के पर्व-त्योहार अपने आप में ही महत्त्वपूर्ण हैं। आकिान मास में मनाया जाने वाला पर्व नवरात्र ही वह पर्व-त्योहार है, जो संपूर्ण भारत को एक सूत्र में जोड़ता है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा-पूजा, उत्तर भारत में दशहरा, महाराष्ट्र में नवरात्र महालक्ष्मी पूजा, गुजरात में मां अम्बे की उपासना इसी त्योहार के भिन्न भिन्न रूप हैं।
पर्व-त्योहारों को मनाने की गुजराती समाज की अपनी विशेषताएं हैं और गुजराती समाज में लगभग सभी पर्व-त्योहार उसी हर्षोल्लास एवं उमंग के साथ मनाया जाता है, जैसे कि भारत के अन्य भागों में, लेकिन गुजरात में मास शुक्ल पक्ष से आरंभ होने के कारण अधिकांश पर्व-त्योहारों के मास के नाम भिन्न हो जाते हैं। आकिान शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला नवरात्र गुजरात का एक विशेष पर्व है। और इस पर्व के साथ जुड़ा है गुजरात का विका प्रसिद्ध लोकनृत्य गरबा, जो गुजरात के नवरात्र उत्सव को उत्साह व उमंग में तब्दील कर देता है।
गरबा नृत्य जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी से गुजरात में होता आ रहा है, इस पारंपरिक नृत्य को रास, रासदा, गरबा, गरबी आदि नामों से भी जाना जाता है। जब यह नृत्य हाथों में लकड़ियों के छोटे-छोटे डंडों को लेकर किया जाता है, तब इसे ‘डांडियाÓ कहा जाता है, जबकि गरबा हाथों से लयबद्ध तालियां बजाकर किया जाता है।
गरबा लोकनृत्य की शुरुआत कैसे हुई, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। लेकिन इतना तो तय है कि यह लोककला वास्तव में मां अंबे की महिमा में गाये जाने वाले गीतों एवं नृत्यों का ही एक रूप है। असुरों के अत्याचार से धरती को बचाने के लिए मां अंबे द्वारा महिषासुर के मर्दन के उपलक्ष्य में गरबा नृत्य द्वारा नौ दिनों तक मां की स्तुति कर मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। गरबा-नृत्य में कलात्मक रूप में बने छिद्रों वाले घट की स्थापना की जाती है। उस घट में मां अंबे के प्रतीक स्वरूप एक ज्योति जलाई जाती है। इस घट को ‘गरबी’ कहा जाता है। घट के चारों ओर पुरुष और महिलाएं समूह में इकठ्ठा होकर तालियां बनाते हैं इन गीतों में मां अंबे द्वारा किए गए राक्षसों के वध की कथा स्तुति एवं ऐतिहासिक घटनाओं आदि का वर्णन होता है।
स्वच्छ निर्मल आकाश, चन्द्रमा का धवल प्रकाश और ज्योतिर्मय घट के चारों ओर खुले मैदान में लयबद्ध होकर जब स्त्री-पुरुष नृत्य करते हुए अपने पैरों पर थिरकते हैं, तो सारा माहौल नृत्यमय हो जाता है और एक अवर्णनीय दृश्य उपस्थित रहता है। गुजरात में नवरात्र के अवसर पर नौ दिनों तक ‘एकटाणा’ (एक समय भोजन करना) किया जाता है। उसके बाद संध्या ढ़लने के बाद मां अंबे की आरती करके गरबा नृत्य प्रारंभ होता है, जो रात्रि-भोजन तक चलता है।
गरबा नृत्य मात्र नवरात्र में ही नहीं, बल्कि शारदीय पूर्णिमा, जन्मदिन, विवाह तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर भी बड़े उत्साह से किया जाता है। शारदीय पूर्णिमा पर होने वाले गरबा के गीतों में कृष्ण और गोपियों के बड़े ही भावपूर्ण गीत गाये जाते हैं। उस समय खेला जाने वाला गरबा ‘रास’ कहलाता है।
गरबा के साथ डांडिया रास भी गुजरात में खूब खेला जाता है। डांडिया गुजरात के मेहर समाज में बहुत लोकप्रिय है। इस समाज के लोग अपनी परंपरागत वेशभूषा में बड़े उत्साह से नृत्य करते हैं। तीव्र गति से चलते उनके कदम और समूह के दूसरे पुरुषों से टकराते लयबद्ध डंडे, सैनिकों की याद दिला जाती है। ऐसा लगता है कि मानों युद्धक्षेत्र में सैनिकों की तलवारें टकरा रही हों।
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