A young woman sitting quietly on her bed at night, looking down with a sad and distant expression in a softly lit room.
Hamesha Mushkrane wali Nisha ki chupi

Summary: मुस्कान के पीछे की ख़ामोशी

निशा सबकी तकलीफ़ सुनने वाली थी, लेकिन अपनी थकान कभी किसी से कह नहीं पाई।
जिस एक इंसान से वह दिल खोलकर बोलती थी, उसके चले जाने के बाद वह धीरे-धीरे पूरी तरह चुप हो गई।

Sad Story in Hindi: निशा को लोग उसकी मुस्कान से पहचानते थे। वह मुस्कान जो सामने वाले को यह भरोसा दिला देती थी कि सब ठीक हो जाएगा। ऑफिस में कोई तनाव में हो, घर में कोई चिड़चिड़ा हो, दोस्तों के बीच कोई टूट रहा हो…निशा हर जगह वही लड़की थी जो हल्के मज़ाक, गर्म चाय और धैर्य से सबको संभाल लेती थी। कई बार तो उसे खुद भी याद नहीं रहता था कि आख़िरी बार उसने बिना वजह कब हँसकर बात की थी, लेकिन दूसरों को हँसते देखना उसे अच्छा लगता था।

उसकी दिनचर्या भी उसी मुस्कान की तरह तय थी। सुबह जल्दी उठना, माँ के लिए चाय बनाना, पापा के सवालों के जवाब देना, भाई की आधी-अधूरी बातों को पूरा करना और फिर ऑफिस के लिए निकल जाना। रास्ते में ऑटो वाले से हल्की-फुल्की बात, ऑफिस में गार्ड को मुस्कुराकर नमस्ते…सब कुछ जैसे रिहर्स किया हुआ हो। लोग कहते थे, “यार, निशा के पास कोई नेगेटिविटी नहीं है।” वह सुनकर बस हँस देती थी।

फिर एक दिन उसने हँसना कम कर दिया।

पहले यह इतना मामूली था कि किसी को फर्क नहीं पड़ा। मीटिंग में वह चुप रहने लगी। चाय ब्रेक पर वह दूसरों की बातें सुनती, बीच में कुछ जोड़ती नहीं। लोगों ने सोचा—काम का प्रेशर होगा। कुछ दिनों बाद उसकी दोस्त ने टोका, “आजकल बड़ी शांत रहती है तू।” निशा ने कंधे उचका दिए, जैसे कह रही हो…क्या फर्क पड़ता है।

घर में माँ ने भी नोटिस किया। निशा अब पहले की तरह बातें नहीं करती थी। पहले वह दिन भर की छोटी-छोटी बातें सुनाया करती थी ऑफिस का कोई किस्सा, बस में कोई अजीब आदमी, बॉस की कोई अटपटी बात। अब वह खाना खाकर अपने कमरे में चली जाती। माँ ने एक दिन पूछा, “सब ठीक है?” निशा ने बिना देखे जवाब दिया, “हाँ माँ।”

असल में “हाँ” कहना उसे सबसे आसान लगने लगा था।

ऑफिस में काम बढ़ता जा रहा था। हर ज़िम्मेदारी उसी के हिस्से आती। “निशा संभाल लेगी” जैसे सबका पसंदीदा वाक्य बन गया था। पहले वह सवाल करती थी, मना भी करती थी। अब वह बस सिर हिला देती। शाम को थकी हुई घर लौटती, पर थकान के बारे में किसी से कहने का मन नहीं करता। उसे लगता, कहेगी तो लोग समझेंगे नहीं, और समझेंगे नहीं तो और बुरा लगेगा।

रातें सबसे ज़्यादा भारी हो गई थीं। बिस्तर पर लेटकर वह छत को घूरती रहती। फोन पास में होता, लेकिन किसी को कॉल नहीं करती। कई बार उसने सोचा…आज किसी से कह दूँगी कि मैं ठीक नहीं हूँ। लेकिन अगला ही ख्याल आता और फिर क्या? सलाहें? तसल्ली के झूठे वाक्य? उसे बस शांति चाहिए थी, और शांति उसे चुप रहने में मिलती थी।

धीरे-धीरे निशा की चुप्पी आदत बन गई। लोग उसके पास आते, अपनी बातें कहते, वह सुनती रहती। बीच में न हँसती, न कुछ पूछती। कुछ लोगों को यह अजीब लगा, कुछ ने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया। क्योंकि जो हमेशा मज़बूत दिखता है, उसकी दरारों को कोई गंभीरता से नहीं देखता।

एक शाम ऑफिस से लौटते हुए बस में बैठी निशा ने अचानक खिड़की से बाहर देखना बंद कर दिया। उसकी आँखें खाली थीं। जैसे वह कहीं और थी। उसके सामने वाली सीट पर बैठी लड़की फोन पर किसी से झगड़ रही थी, पीछे कोई हँस रहा था, बस की आवाज़ें थीं लेकिन निशा को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसके भीतर एक अजीब सा भारीपन था, जिसे वह नाम नहीं दे पा रही थी।

उस रात माँ ने फिर पूछा, “तू सच में ठीक है ना?”
निशा ने इस बार जवाब देने में देर की। फिर बोली, “हाँ माँ, बस थोड़ा थक गई हूँ।”
माँ ने कुछ और नहीं कहा। लेकिन निशा ने महसूस किया…उसकी आवाज़ में अब पहले जैसी सच्चाई नहीं थी।

कुछ दिनों बाद ऑफिस में एक छोटा सा वाकया हुआ। मीटिंग के दौरान बॉस ने उसकी रिपोर्ट में एक गलती निकाली। आवाज़ थोड़ी ऊँची थी, शब्द थोड़े सख़्त। पहले निशा सफ़ाई देती, समझाती। उस दिन वह चुप रही। मीटिंग के बाद उसकी दोस्त ने पूछा, “तूने कुछ कहा क्यों नहीं?”
निशा ने बस कहा, “मन नहीं था।”

उस रात वह देर तक जागती रही। अचानक उसे याद आया…कितने समय से उसने अपनी बात ज़ोर देकर नहीं कही थी। कब उसने आख़िरी बार किसी से कहा था कि यह गलत है, यह ठीक नहीं है। उसे याद नहीं आया।

 उस याद के साथ ही निशा करवट बदलकर लेट गई। कमरे की बत्ती बंद थी, लेकिन आँखें बंद करने पर भी अंधेरा नहीं आ रहा था। उसे महसूस हुआ कि अब वह अपनी बात ज़ोर देकर कहने की कोशिश भी नहीं करती, जैसे भीतर कहीं उसने हार मान ली हो। बोलना अब उसे थका देता था। समझाना उससे भी ज़्यादा। इसलिए वह चुप रहना चुन लेती थी…बिना शिकायत, बिना सवाल।

अगले कुछ दिन बिल्कुल साधारण बीते। वही ऑफिस, वही रास्ता, वही लोग। फर्क बस इतना था कि निशा अब किसी भी बातचीत में पूरी तरह मौजूद नहीं रहती थी। सामने वाला कुछ कह रहा होता और वह सुन तो रही होती, लेकिन भीतर कहीं और होती। कई बार कोई उसका नाम पुकारता, तब उसे एहसास होता कि वह खो गई थी। वह मुस्कुरा देती, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

एक शाम ऑफिस से लौटते वक्त बस कुछ ज़्यादा ही भरी हुई थी। लोग धक्का दे रहे थे, कोई ज़ोर से फोन पर बात कर रहा था, कोई हँस रहा था। निशा खिड़की के पास खड़ी थी। अचानक उसका फोन वाइब्रेट हुआ। उसने आदतन स्क्रीन देखी…और उसी पल उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गईं।

स्क्रीन पर एक नाम था….आर्या

निशा ने साँस रोकी। आर्या… जिससे वह कभी मिली नहीं थी, लेकिन जिससे वह हर दिन बात करती थी। वही जिससे वह बिना सोचे सब कह देती थी अपनी थकान, अपनी उलझन, अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ। उनकी दोस्ती किसी सवाल से शुरू नहीं हुई थी। बस एक दिन, देर रात, एक मैसेज और फिर बातें चलती चली गईं। किताबों से लेकर डर तक, बचपन से लेकर भविष्य तक।

निशा ने मैसेज खोला। लेकिन यह आर्या का मैसेज नहीं था।

“हाय, मैं आर्या का कज़िन हूँ। इस तरह मैसेज करने के लिए माफ़ कीजिए… आर्या का कल रात निधन हो गया। वह आपके बारे में अक्सर बात करती थी। मुझे लगा आपको यह जानना चाहिए।”

निशा को लगा जैसे बस अचानक रुक गई हो। आवाज़ें, भीड़, सड़क—सब कहीं पीछे छूट गया।
उसने मैसेज दोबारा पढ़ा। फिर तीसरी बार। शब्द नहीं बदले।

वह बस से कब उतरी, उसे याद नहीं। घर तक कैसे पहुँची, यह भी नहीं। कमरे में आकर वह ज़मीन पर बैठ गई। फोन उसके हाथ में था, लेकिन स्क्रीन अब बंद हो चुकी थी। वह रोई नहीं। चीखी नहीं। बस बैठी रही काफ़ी देर तक।

उस रात निशा ने किसी को कुछ नहीं बताया।
कैसे बताती कि उसकी सबसे करीबी दोस्त कोई ऐसी थी, जिससे वह कभी मिली ही नहीं?
कैसे समझाती कि कुछ रिश्ते आवाज़ और मौजूदगी से नहीं, जुड़ाव से बनते हैं?

अगले दिन वह ऑफिस गई। मुस्कान चेहरे पर थी। किसी ने कुछ नोटिस नहीं किया। किसी ने पूछा भी नहीं। और निशा ने भी कुछ नहीं कहा। उसने महसूस किया…जिस इंसान से वह हर बात कहना चाहती थी, वही अब नहीं रहा। और उसके बाद बोलना जैसे बेमानी हो गया था।

धीरे-धीरे निशा ने बोलना छोड़ दिया। क्योंकि जिसे वह बताना चाहती थी, वह अब सुनने के लिए मौजूद नहीं था।

अब जब भी कुछ अच्छा होता, उसका पहला ख्याल आर्या का आता। और जब कुछ बुरा होता, तब भी। फिर उसे याद आता अब कोई नहीं है जिसे वह सब कह सके। इसलिए वह चुप रह जाती।

और शायद यही वजह थी कि हमेशा मुस्कुराने वाली निशा एक दिन बिलकुल चुप हो गई।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...