उस रोज एक जरूरी काम से जा रहा था। तभी मेरी कार के ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। ‘भूतनाथ, गाड़ी क्यूं रोकी?’ मैंने झल्लाकर पूछा तो उसने इशारे से बताया कि लड़की लिफ्ट मांग रही है।

‘तूने कैसे जाना कि वो लिफ्ट मांग रही है?’ मैंने फिर सवाल किया तो उसने अपने बांये अंगूठे से एक्शन दिखाते हुए बताया कि इस इशारे का मतलब होता है कि उसे लिफ्ट की जरूरत है।
अंगूठे का जिक्र आया तो कॉलेज के जमाने का जख्म हरा हो गया। जिस हसीना से मुहब्बत की पींगे बढ़ाई थी, वही एक दिन हमें अंगूठा दिखा गई। आज तक वह अंगूठा दर्द से सालता है।
एक नामी-गिरामी कंपनी ने तो कोल्ड ड्रिंक की अपनी बोतल पर बाकायदा अंगूठा ही छाप रखा है। जब भी उस कोल्ड ड्रिंक को हलक से नीचे उतारता हूं तो लगता है जैसे कसैले करेले का जूस पी रहा हूं।
अब नामुराद अंगूठे से पीछा कैसे छूटे? हर जगह कमबख्त किसी-न-किसी रूप में सामने आकर दिल में दबे जख्म को कुरेद ही जाता है।
वैसे अंगूठा होता बड़ा मायावी है। बचपन में नन्हे-मुन्ने अक्सर अपना अंगूठा चूसते हुए ही बड़े होते हैं। मांएं भी उन्हें सुलाने के लिए इस ब्रह्मïास्त्र का उपयोग करने से गुरेज नहीं करतीं। बच्चे के मुंह में अंगूठा दिया और थोड़ी देर में वह नींद में खो जाता है।
अंगूठा छाप तो पूरे देश में विख्यात हैं ही, जो लोग पढ़े-लिखे नहीं होते अक्सर उन्हें ‘अंगूठा छाप’ की पदवी से नवाजने का रिवाज है।
कुछ लोग जबरदस्ती इस बिरादरी में घुसपैठ कर लेते हैं ताकि जिम्मेदारी से बचे रहें। ‘अरे भई, हमें क्या पता? हम तो अंगूठा छाप हैं!’ ऐसे व्यक्ति सगर्व अपनी योग्यता यूं बयान करते हैं जैसे पीएचडी की डिग्री के बारे में बता रहे हैं। जिस तरह पूरी दुनिया में अमेरिका का ठह्रश्वपा छाया है वैसे ही अंगूठे महाशय का रुतबा हाथों के मामले में है। बिना अंगूठे की मदद से क्या आप लिख सकते हैं? सारी अंगुलियां एक तरफ और यह महाशय एक तरफ।
मेरे ड्राइंगरूम में भगवान राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए तस्वीर में विराजित हैं। उन्होंने भी अंगूठे की मदद ले रखी है। जिन प्रभु से सभी मदद मांगें वे अंगूठे पर मेहर करें तो सहज ही अंगूठे का महत्व समझा जा सकता है।
बेचारा एकलव्य! गुरुदेव के कॉन्सेप्ट कितने क्लीयर थे उस जमाने में भी। सीधे-सीधे गुरुदक्षिणा में उसे ही मांग लिया ताकि उसका सीखा-समझा सब बेकार हो जाए। प्रबंधन वर्ग तो अक्सर इसका सदुपयोग करता देखा गया है। मजदूर जब अपनी मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं तो पहले वह उन्हें वार्ता की लॉलीपाप दिखा कर काम पर लौटा लाता है। फिर जब टेबल टॉक होती है तो चिरपरिचित अंदाज में मांगों पर अंगूठा दिखा देता है। अलग से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती। मजदूर समझ जाते हैं कि अंगूठा दिखाकर मैनेजमेंट ने मांगें मानने से इंकार कर दिया है।
एक दिन पत्नीजी साड़ी दिलाने की फरमाइश कर बैठीं। हमने मजबूरी बताकर असमर्थता जताई तो वे बिफर गई।
‘क्योंजी, पिछली बार सोने के ईयरिंग दिलाने को कहा तो झट से अंगूठा दिखा दिया। अब साड़ी के लिए भी वही अंगूठा। ऐसा नहीं चलेगा।’
‘भाग्यवान, ठीक से याद करो। हमने अंगूठा कब दिखाया? हां, दिलाने से इंकार जरूर किया था!’ हमने खंडन किया।
‘बात तो वही हुई ना। इंकार का मतलब अंगूठा दिखाना, फिर बाकी क्या बचा?’
श्रीमतीजी की अंगूठा चर्चा ने फिर हमें उस कॉलेज की परी का अंगूठा दिखाना याद दिला दिया। मुझे लगा कि कुछ भी हो जाए यह अंगूठा महाशय मुझे यूं ही दर्द की याद दिलाते रहेंगे।
‘पापा, आइसक्रीम खिलाने ले चलो ना। बहुत मन कर रहा है।’ तभी नन्ही बिटिया अपना बांया अंगूठा चूसते हुए आकर बोली।
मैं क्या कहता? ‘आइसक्रीम तो जरूर खिलाएंगे। पहले मुंह से अंगूठा बाहर निकाल लो बेटी!’ अपने कलेजे पर हाथ रखते हुए हमने कहा तो वह हमें टुकुर-टुकुर ताकने लगी।