Saloom Broo
Saloom Broo

Best Hindi Story: वह अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं और लखनऊ से यहां आई थीं। उनकी पूरी जिंदगी बीमार मां की सेवा में गुजर गई, बाद में मां भी चल बसी और अवंतिका जी अकेली रह गईं।

धर्मकोट की उस शांत पहाड़ी पर, जहां बादल अक्सर चीड़ और देवदार के पेड़ों से लिपट जाते हैं, एक छोटा- सा कैफे था। बाहर एक साधारण-सा बोर्ड टंगा था, ‘शालोम ब्रू’ कैफे की खिड़कियों से दिखाई देता हिमालय, मानो जीवन के अनुभवों की एक खुली किताब हो। पहाड़ों की हर परत किसी अध्याय की तरह प्रतीत होती, कुछ हल्के, कुछ गहरे और कुछ रहस्यमयी। कैफे के भीतर की दीवारें किताबों
से भरी थीं, यहां वर्ड्सवर्थ, जॉन कीट्स, इलियट, लॉर्ड बायरन, व्हिटमैन, टॉल्स्टॉय, वर्जीनिया वुल्फ’ खलील जिब्रान, टैगोर।
किताबों के साथ हल्के संगीत का माहौल था, कभी इजरायली किनोर धुनें, कभी मिडल ईस्ट
औद की रहस्यमय गूंज, तो कभी जापानी कोतो की मधुर तान।
कैफे में घुसते ही ताजी पीसी हुई कॉफी की खुशबू सांसों में घुल जाती। गर्म कॉफी के साथ ताजे बेक किए हुए क्वासों और पेन औ चॉकलेट की मीठी महक वहां की हवा में रची-बसी रहती। एक कोने में देसी मसालों से महकता हुआ कैरेट और अखरोट का केक और पिसी हुई दालचीनी के साथ गर्म सॉरडो ब्रेड के लोफ। पास ही एप्पल पाई, चीजकेक और मैकरॉन्स की सजी हुई ट्रे, तो दूसरी ओर
टार्ट्स और ब्रियोश बन्स की नरम सुगंध हर किसी को लुभा लेती।

अवंतिका जी, इस कैफे की मालकिन जो करीब उनसठ की उम्र की थीं। वह अपने कैफे को बहुत लगाव से संभालती थीं। उनके हाथों की बनाई ‘फ्रेंच प्रेस’ कॉफी यहां की पहचान थी। वह अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं और लखनऊ से यहां आई थीं। उनकी पूरी जिंदगी बीमार मां की सेवा में गुजर गई, बाद में मां भी चल बसी और अवंतिका जी अकेली रह गईं। उनके भीतर एक और जीवन छुपा था, सपनों से भरा, संभावनाओं से लबालब लेकिन वह जीवन उनके भीतर घुटता रहा। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद जब लखनऊ में रहना असंभव हो गया, तो उन्होंने सब कुछ बेच कर हिमाचल में धर्मकोट का रुख किया क्योंकि वो अक्सर यहां आती रहीं थीं। यहां उन्होंने लोकल दोस्तों की सहायता से ‘शालोम ब्रू’ कैफे खोला, जिसका अर्थ था शांति की कॉफी। अवंतिका जी ने दो तिब्बती सहायिकाओं को रखा, ताशी और पेमा, जो न सिर्फ अपनी मेहनत से कैफे को सजीव रखती थीं, बल्कि दोनों की खासियत थी विदेशी बेक्ड चीजों में महारत।

दिसंबर एक ऐसी ही शाम अवंतिका जी काउंटर के पीछे बैठी, पाब्लो नेरुदा की प्रेम कविताओं की किताब में खोई हुई थी। इजरायली संगीत बज रहा था, दरवाजा खुला और भीतर एक लंबा, दुबला-पतला लगभग साठ पैंसठ वर्ष का व्यक्ति दाखिल हुआ।
सफेद बाल हवा से बिखरे हुए थे, कमर थोड़ी झुकी, तीखी और सीधी नाक लेकिन उसकी आंखों में ऐसा गहरापन था जो पहली नजर में ही खिंचाव पैदा कर दे।
उसने साधारण-सी हिंदी में पूछा, ‘क्या यहां बैठ सकता हूं? अवंतिका जी ने चौंककर सिर हिलाया। वह विदेशी था, लेकिन उसकी हिंदी आत्मीय और सहज थी।
‘अच्छी जगह है’, उसने मुस्कुराते हुए कहा। ‘मैं डैनियल हूं, उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘इजराइल से, लेकिन अब तो भारत मेरा घर है। हिमालय और आध्यात्म ने मुझे यहां रोक लिया है।’अवंतिका जी डैनियल को ध्यान से देख रही थीं, उसका व्यक्तित्व उसके यहूदी होने की पहचान करवा रहा था। उनकी नजरें डैनियल के चेहरे पर टिक गई थीं। एक अजनबी होकर भी वह इतना परिचित क्यों
लग रहा था?

डैनियल: ‘यहां कैफे में कोई इजरायली संगीत चल रहा है लेकिन कोई वहां की डिश भी हो, तो बताइए।’ अवंतिका: ‘जैसेहलवा, बाबका या बोरका?’ डैनियल: (चौंककर) ‘आपने बोरका का नाम लिया?
अद्भुत! क्या आपके पास है?’ अवंतिका: (हंसते हुए) ‘जी, है।’ डैनियल: (गर्मजोशी से) ‘बस एक कॉफी और बोरका।’
अवंतिका ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी पसंद का ध्यान रखते हुए कॉफी और ताजा डिश टेबल पर रखवा दी। दोनों में खूब बातचीत हुई। डैनियल ने अपनी उंगलियों में कॉफी के कप को थामा और पहली चुस्की लेते ही उसकी आंखों में एक अपरिचित चमक उभरी और उसने अवंतिका जी को
ध्यान से देखा। अवंतिका जी ने यह देख, चुपचाप अपनी दृष्टि खिड़की के पार मोड़ ली। यह पहली शाम थी। बातों की शुरुआत का पहला स्वाद।
सर्दियों के दिन अब जैसे अपनी एक नई लय में ढलने लगे थे। कैफे शालोम ब्रू की टेबल, जो पहले एक अजनबी कोने की तरह थी, अब डैनियल के लिए एक परिचित ठिकाना बन गई थी। वह नियमित आगंतुक बन गया था और उसे अब कभी ऑर्डर देने की जरूरत नहीं पड़ती थी। अवंतिका जी उसकी पसंद जान चुकी थीं। कॉफी के साथ एक प्लेट में स्ट्रॉबेरी टार्ट, कभी एप्पल स्ट्रूडेल और कभी लेमन मैरिंग पाई।

डैनियल जब भी आता, वह खिड़की के पास वाली अपनी पसंदीदा सीट पर बैठता। उनके बीच की बातचीत, जैसे धीमी आंच पर सिंकते इजरायली चल्लाह ब्रेड का स्वाद, हर शब्द, हर बात में सौंधी मिठास।
शामें यूं ही बीतने लगीं। डैनियल के लिए यह कैफे अब केवल एक जगह नहीं बल्कि एक अनुभव बन चुका था और अवंतिका जी के लिए हर डिश जो वह उसके लिए परोसती, जैसे किसी अनकही भावना का इजहार थी। वह हर बार नई कहानियां अवंतिका जी को सुनाता, उसकी अपनी यात्राओं की कहानियां। माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले पहले इजरायली व्यक्ति डोरोन एरन से प्रभावित होकर उसने जीवन भर यायावरी को ही अपना धर्म बना लिया था। परिवार बसाने का ख्याल कभी उसकी प्राथमिकताओं में नहीं रहा। उसका ज्यादातर वक्त यहां धर्मकोट या कसोल में बीतता। वह
गले में एक चेन डाले रहता था जिसमें एक हंसा के डिजाइन वाली अंगूठी होती थी। एक दिन अवंतिका जी ने साहस करके पूछा, ‘यह हंसा वाली अंगूठी जो आपने गले में पहनी है…, इसकी क्या कहानी है?’ डैनियल ने क्षणभर अंगूठी को देखा। उसकी आवाज धीमी और गहरी हो गई। ‘यह मेरी मां
की थी। जब मैं छोटा था, वह इसे पहनकर कहती थीं, ‘हंसा आत्मा का दूत है। यह हर तूफान में सही दिशा दिखाएगा।’

एक शाम वो दोनों पहाड़ की चोटी पर खड़े थे। सामने धौलाधार का बर्फ से ढका विस्तार था। ठंडी हवा देवदार और बांज के वृक्षों के बीच से गुजर रही थी। कहीं दूर हिमालयन मॉनाल पक्षियों की आवाज सुनाई दे रही थीं। नीचे की पहाड़ी से मोनेस्ट्री से हल्का धुआं उठ रहा था। अवंतिका ने उस वक्त महसूस किया कि पहाड़ का मौन, सचमुच मौन नहीं था, वह एक अदृश्य गीत था। एक सुंदर
कविता। उन्होंने धीरे से कहा, ‘डैनियल… सुनिए, एक कविता है।’ उन्होंने बिना किसी तैयारी के, सहज ही पाब्लो नेरुदा की कविता सुनानी शुरू की। ‘मैं तुमसे प्रेम करती हूं, यह जाने बिना कि कैसे, कब या कहां, मैं तुमसे प्रेम करती हूं, बिना किसी जटिलता या गर्व के, निश्चल, निष्कपट प्रेम…क्योंकि मुझे पता है, इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है।’ उनके शब्द हवा में तैर रहे थे। डैनियल उनकी बातें गहरे ध्यान से सुन रहा था और फिर उसने आवाज में एक ठहराव के साथ कहा, ‘नेरुदा तो यह भी कहते हैं, ‘क्या कहते हैं चक्रवातों को, जब वे ठहरे हुए होते हैं…?’ अवंतिका जी उसके शब्दों का अर्थ समझ रही थीं। दोनों वापस कैफे की तरफ चल पड़े। चलते- चलते डैनियल एक यहूदी गान गुनगुनाना रहा था, ‘एरेव शेल शोशनीम, नेत्से ना एल हाबुस्तान…’ जिसका अर्थ था ‘यह गुलाबों की शाम है, चलो बगीचे की ओर चलें, जहां सुगंधित फूल और खुशबू हमारी राह को सजाएंगे।’ समय आगे बढ़ रहा था और उनका अनकहा प्यार भी। फरवरी की बर्फबारी की उस शांत और सर्द शाम, जब धर्मकोट को बर्फ ने अपनी आगोश में लेकर उसकी गति को शांत कर दिया था, अवंतिका
जी अकेली कैफे में बैठी हुईं थीं। खिड़की से गिरती हुई बर्फ को देख रही थीं। उनकी दृष्टि में एक अधूरी प्रतीक्षा थी, एक अनकहा आह्वान। शायद उनको किसी का इंतजार था। फिर अचानक, दरवाजे के उस ओर बर्फ की चादर के बीच एक छाया सी महसूस हुई। दरवाजा खुला और डैनियल का चेहरा, जो

वे दोनों एक-दूसरे के करीब बैठे रहे, पूरी दुनिया से बेखबर और उस पल में, उनके बीच
केवल एक ही सच था ‘एक- दूसरे के प्रेम का एहसास’, जिसे केवल वायु, अग्नि और हिम ही
समझ सकते थे। प्रकृति जैसे श्वास रोक, उस क्षण की साक्षी बन रही थी।

सर्द हवाओं और बर्फ के फाहों से नम था, सामने आया। उसकी आंखों में वही हल्की सी गर्मी थी, जो अवंतिका जी ने हमेशा महसूस की थी वह चुपचाप, फायरप्लेस के पास जाकर बैठ गया, बिना किसी शब्द के। अवंतिका जी ने बिन कहे, उसे फ्रेंच प्रेस कॉफी और बाबका दिया, बाहर ‘क्लोज’ का साइन टांगा और खुद भी आकर उसके पास बैठ गईं। आज तक वो दोनों भीड़ में मिले थे। जब उन्होंने पहली बार एकांत में एक-दूसरे की आंखों में देखा, तो जैसे सब कुछ ठहर गया। कोई आवाज नहीं, कोई हलचल नहीं। डैनियल ने धीरे से अवंतिका के हाथ को छुआ और उस पल ने दोनों को ऐसे अपनी गिरफ्त में लिया, जैसे एक चुप्प सन्नाटा। उनके बीच की दूरी जैसे सिमट कर गायब हो गई। डैनियल ने एक शांत मुस्कान के ‘हंसा’ के डिजाइन वाली अंगूठी अवंतिका जी को पहना दी। अपनी मां की अंगूठी किसी को देना, शायद यही एक ऐसा पल होता है, जब शब्द नकारे जाते हैं और भावनाएं अपनी पूरी गहराई में व्यक्त होती हैं। अवंतिका जी की आंखों में नमी थी, जो शब्दों से कहीं अधिक
कह रही थी। पहली बार, उनके दिल में यह एहसास गूंजा कि कोई उनकी आत्मा के उस कोने को देख सकता है, जहां प्यार की तलाश, निराशाओं में खो गई थी।

Best Hindi Story
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अवंतिका जी कुछ संभल कर बोलीं, ‘डैनियल, तुमने ओब्लिवियन के बारे में सुना है!’ डैनियल, ‘नहीं।’ अवंतिका जी, ‘ये एक नदी है। कहते हैं, जो भी वहां पहुंचा, उसने अपने सारे दर्द, सारी यादें…सब कुछ भूल दिया।’ डैनियल (मुस्कुराते हुए): ‘और ये नदी कहां मिलती है?’ अवंतिका जी (धीमे स्वर में), ‘शायद खोजने से नहीं, बुलाने से। जिसने भी उसे पाया, उसने उसकी धारा में डुबकी लगाई…या
उसका जल पिया…फिर, वो हर दुख, हर कसक से मुक्त हो गया। डैनियल (धीरे से): ‘ये नदी की बात नहीं कर रहीं हैं आप।’ अवंतिका जी (मुस्कुराकर): ‘तो तुम समझ गए।’ डैनियल (आंखें मूंदते हुए): ‘तो क्या आपको वो नदी मिल गई अवंतिका?’ अवंतिका: ‘जी, शायद नदी ने खुद मुझे बुला लिया।’

बर्फ गिरती रही, फायरप्लेस जलता रहा और कैफे की पीली रोशनी में गूंजती जैज म्यूजिक की धुन, यह सब जैसे समय की धारा को रोककर उन्हें एक साथ समेट लेना चाहता हो। वे दोनों एक-दूसरे के करीब बैठे रहे। ‘शालोम ब्रू’ के भीतर दोनों प्रेमी उस क्षण में पूरी सृष्टि को समेटे हुए थे