Summary: प्यार धीरे-धीरे होता है... और यही इसकी सबसे खूबसूरत बात है
एक अरेंज मैरिज, जो वक्त के साथ प्यार में बदल गई। ये कहानी है दो अजनबियों की, जो धीरे-धीरे एक-दूसरे की ज़िंदगी बन गए।
Hindi Love Story: दिसंबर की एक धुंधली सुबह थी। कोलकाता के पुराने मोहल्ले की गलियों में सूरज की किरने धीरे-धीरे उतर रही थीं। घर की छत पर मम्मी धूप सेंक रही थीं और नीचे किचन में बाबूजी चाय के लिए आवाज़ लगा रहे थे। इसी हलचल में, आरोही की ज़िंदगी बदलने जा रही थी। 28 की हो चुकी थी वो। इंजीनियरिंग के बाद मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी थी, पर अब रिश्तेदारों के ताने, मम्मी की बेचैनी और सोसायटी की “अब तो शादी कर ही लो” वाली नज़रों ने उसे थका दिया था।
और फिर आया एक रिश्ता। नाम था यश अग्रवाल। चार्टर्ड अकाउंटेंट, दिल्ली में नौकरी। शांत, पढ़ा-लिखा लड़का। और सबसे ज़रूरी मम्मी की पसंद। “एक बार मिल लो,” मम्मी ने कहा था, “कुछ नहीं तो चाय पीकर लौट आना।” अगले रविवार को आरोही दिल्ली आई। यश के साथ मिलने एक कैफे में गई। पहली नज़र में कुछ खास नहीं लगा। सामने बैठा लड़का साधारण था। सादा शर्ट, हल्की मुस्कान और थोड़ी झिझक। पर बातचीत शुरू होते ही कुछ बदलने लगा।
“तुम्हें किताबें पसंद हैं?”
“हाँ,” आरोही बोली, “खासकर वो जिनमें किरदार बोलते नहीं, बस महसूस होते हैं।”
यश चौंका नहीं, मुस्कुराया “मेरे लिए The Little Prince अब भी सबसे गहरी किताब है।”
बातचीत रुक-रुक कर चलती रही। जैसे दो अनजान लोग एक ही सुर तलाश रहे हों। कोई तड़क-भड़क नहीं थी, न ही कोई झटपट क्लिक होने वाली केमिस्ट्री। लेकिन फिर भी कुछ ऐसा था जो भीतर चुपचाप उतर रहा था।
रिश्ता तय हो गया। बिना किसी बहुत बड़े इमोशन के। न फिल्मी रोमांस, न छुप-छुप के बातें। बस दो परिवार, दो लोग और एक सामाजिक समझदारी। शादी के पहले तीन महीने एक नई लय में बीते।

नई दिल्ली के एक फ्लैट में दोनों साथ रहने लगे। यश ऑफिस से 7 बजे आता, आरोही 6 बजे। आरंभ में सब ‘ठीक-ठाक’ था। “खाना ऑर्डर करें या मैगी बना लूं?” “तुम्हारी मर्ज़ी।” कोई झगड़ा नहीं, पर कोई गहराई भी नहीं।
फिर एक शाम बारिश आई। यश ऑफिस से भीगता हुआ लौटा। कपड़े बदले बिना सीधे किचन में गया। “अरो… आरोही, क्या तुम्हें मसाला चाय पसंद है?” “हां… बहुत।” “तो फिर बैठो, आज मैं बनाता हूँ।” वो दोनों खिड़की के पास बैठे, गरम चाय के साथ। और शायद वो पहली बार थी जब दोनों साथ हँसे। यश ने कॉलेज के दिनों की कहानियाँ सुनाईं, जब उसने स्कूटर चलाना सीखा और दीवार से टकरा गया। आरोही ने बताया कैसे उसने ऑफिस के इंटरव्यू में गलती से ‘Sir’ को ‘Mummy’ कह दिया था।
हँसी रुक नहीं रही थी। और उस हँसी में एक रिश्ता जन्म ले रहा था धीरे-धीरे, चुपचाप। जैसे दो अजनबी अब कमरे में अकेले नहीं थे। जैसे दो नामों के बीच कोई ‘हम’ बन रहा था।
एक रात आरोही बीमार पड़ी। तेज बुखार, सिर दर्द और शरीर में कंपकंपी। यश ने ऑफिस से छुट्टी ली। चुपचाप माथे पर पट्टियां रखता रहा, दवा पिलाई और पहली बार उसके माथे पर हल्की सी किस की। “कभी लगता नहीं था, मैं इतना फ़िक्र करूंगा किसी के लिए,” यश ने कहा। आरोही की आँखें भर आईं। शायद पहली बार उसने खुद को किसी के “अपने” जैसा महसूस किया।
धीरे-धीरे सब बदलने लगा। अब आरोही यश के लिए कॉफी बनाती थी बिना पूछे, जैसे आदत हो। यश उसके बालों में बिना कहे कंघी करता जैसे हक हो। रविवार को दोनों किताबें पढ़ते, ग्रीन टी पीते और कभी-कभी बस एक-दूसरे को देखते रहते।
एक दिन आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा “शादी से पहले लगा था, तुम बहुत नॉर्मल हो। कुछ खास नहीं।” यश हँस पड़ा “अब क्या सोचती हो?”
“अब लगता है सुकून तुम हो। और शायद यही असल खास होता है।”
एक शाम, यश ऑफिस से देर से लौटा। “आरोही?” उसने घर का दरवाज़ा खोला। कोई जवाब नहीं। ड्राइंग रूम में एक गुलाबी लिफाफा रखा था। उसमें एक चिट्ठी थी “तुमसे कुछ कहना है। इस छत पर आओ, वहीं बताया जाएगा। तुम्हारी पत्नी, जो अब तुम्हें प्यार करने लगी है।” यश छत पर भागा। वहाँ आरोही खड़ी थी हाथ में एक छोटा सा पौधा।
“ये क्या?” यश ने पूछा।
“ये हमारी लव मैरिज का पहला पौधा है। अरेंज तो सिर्फ शुरुआत थी न?” यश कुछ नहीं बोला। बस उसे गले लगा लिया देर तक, चुपचाप।
अब दो साल हो चुके हैं। आरोही और यश अब भी वैसी ही बातें करते हैं। लड़ते हैं कभी किचन के काम को लेकर, तो कभी रिमोट के लिए। लेकिन हर झगड़े के बाद वही चाय। वही बारिश में भीगना। वही एक-दूसरे की पीठ पर हल्के से हाथ फेरना। और कभी-कभी, दोनों मुस्कुराते हैं जैसे पहली बार मिले हों। क्योंकि…
कभी-कभी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत लव स्टोरीज़… एक अरेंज मैरिज के पीछे छुपी होती हैं।
और हाँ, अब हर साल अपनी शादी की सालगिरह पर वो दोनों उसी पुराने कैफे में जाते हैं जहाँ पहली बार मिले थे। वही टेबल, वही कोना, और आज भी यश पूछता है, “तुम्हें किताबें पसंद हैं?” और आरोही मुस्कराकर कहती है, “अब तो तुम सबसे पसंदीदा हो। बाकी सब तो सिर्फ कहानियाँ हैं।”
कहते हैं, प्यार एक बार होता है। पर उन्हें देख कर लगता है कभी-कभी प्यार धीरे-धीरे होता है, रोज़ थोड़ा-थोड़ा। किसी अजनबी के साथ दिन बिताते-बिताते, वो तुम्हारी आदत, फिर ज़रूरत और फिर तुम्हारा हिस्सा बन जाता है। जैसे यश बना आरोही का, और आरोही… यश की सबसे प्यारी कहानी।
कहते हैं, प्यार एक बार होता है… लेकिन उन्हें देखकर लगता है सच्चा प्यार धीरे-धीरे उगता है। किसी बीज की तरह, जो पहले मिट्टी में खो जाता है, फिर चुपचाप जड़ें पकड़ता है, और वक्त के साथ शाखाएं फैलाता है। हर दिन की छोटी-छोटी बातों में, एक कप चाय में, माथे पर रखा ठंडा हाथ, ऑफिस से लौटने पर इंतज़ार करती आँखें, बिना कहे समझ लेना सब में प्यार पलता है। शुरुआत चाहे अरेंज मैरिज की हो, पर जब दो लोग एक-दूसरे की आदत नहीं, जरुरत बन जाएं… जब खामोशियाँ बोली जाने लगें और आंखों में जवाब मिल जाए… तब समझो प्यार हो चुका है। यश अब सिर्फ एक नाम नहीं था, वो आरोही की दुनिया था। और आरोही? वो यश की सांसों में बसी ऐसी कहानी बन गई थी, जो किसी किताब में नहीं, सिर्फ उसकी धड़कनों में पढ़ी जा सकती थी।
