Hindi Love Story: ट्रेन की बर्थ पर सामने बैठे व्यक्ति को देख कर जया जड़ हो आयी थी..वही कद काठी,वही चौड़ी मिलिट्रीमैन जैसी देह.तभी मुनमुन की खिलखिलाहट सुनकर वो उसकी तरफ़ घूमा. एकसाथ उसकी निगाहें जया और सुशांत पर पड़ीं. चेहरे पर कई रंग आए और गए.
“ हेलो जया,हाऊ आर यू?”
फिर अपना परिचय ,सुशांत को देता हुआ बोला,
“हेलो ,आई एम आशीष.. मैं और जया मेडिकल कॉलेज में एक साथ ही पढ़ते थे”
“ मैं,डॉक्टर सुशांत.ग्लैड तो मीट यू.” सुशांत ने बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया,फिर बोला,“जया ने कभी आपका जिक्र नहीं किया”
“ डिग्री मिलने के बाद सब अलग अलग हो जाते हैं फिर कौन किसको याद करता है…..”
आशीष ने बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में कहा तो सुशांत हंस दिए थे. जया भी मुस्कुरा दी पर मुस्कुराहट में छिपा दर्द स्पष्ट दृष्टिकोचर हो रहा था.
“ बड़ी प्यारी बिटिया है तुम्हारी”आशीष ने मुनमुन की आँखों में झाँकते हुए कहा.तो जया की आँखें डबडबा आयीं थीं. कुछ देर बाद जब सुशांत,मुनमुन को टॉयलेट लेकर गए तो जया ने पूछा,
“ आजकल तुम कहाँ काम कर रहे हो”
“ लखनऊ के एक प्राइवेट नर्सिंग होम में जॉब कर रहा हूँ”
“ शादी हो गई”
“ हाँ,ठहरो ..तुम उसे पहचानती भी हो.”आशीष ने अपने वॉलेट से एक तस्वीर निकालकर दिखायी.तस्वीर में रश्मि ,आशीष के कंधों पर झुकी हुई थी.आशीष की गोद में गोल मटोल सा उसका बेटा था.
“ अरे ये तो रश्मि है”
“ हाँ. रश्मि से मैंने शादी की इसीलिए तुम्हें आश्चर्य हो रहा है न?”
“ नहीं,दरअसल वो….”जया कहते कहते चुप हो गई
“ उसका अफ़ेयर विक्रम के साथ था और मेरा तुमसे..”
जया ने सर नीचे झुका लिया था.
“ तुम ख़ुश तो हो न जया?”
“ हाँ आशीष,सुशांत बहुत अच्छे पति हैं.” अब तक सुशांत मुनमुन को लेकर वापस आ गए थे. काफ़ी देर तक आशीष और सुशांत मेडिकल प्रोफेशन और उस से जुड़ी प्रॉब्लम्स की बातें करते रहे. जया उनकी बातें सुनकर “हाँ हूँ “ करती रही.इतनी देर तक उछल कूद करते करते मुनमुन को नींद आ गई थी.उसे सुलाकर जया भी सोने का उपक्रम करती रही पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी.रिवाइंड होती यादों की रील कॉलेज के दिनों तक पहुँच गई.हल्के नीले रंग की डेनिम ज़ीन्स और सफेद टी शर्ट पहने,हाथ में गिटार लिए आशीष,फ्रेशर्स पार्टी में गाना गा रहा था.
“ ऐसे न मुझे तुम देखो,सीने से लगा लूंगा

तुमको मैं चुरा लूँगा तुमसे,दिल में छिपा लूँगा”
गाना ख़त्म होते ही पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.हर किसी की नज़र आशीष पर टिकी थी,और आशीष की नज़रें जया पर.ग़ज़ब का आकर्षण था उसकी आँखों में,जिसमे आशीष,गाना गाते गाते खो गया था.
प्रोग्राम ख़त्म होते होते सात बज गए थे. अब हर किसी को घर जाने की जल्दी थी. आसमान पर बादल भी छाने लगे थे.जया सीने से बैग चिपकाए स्कूटर स्टैंड की तरफ़ बढ़ रही थी.तभी आशीष की गाड़ी एकदम उसके पास आकर रुकी,
“ आइए मैं आपको आपके घर तक छोड़ दूँ”
“ नहीं नहीं ,मैं चली जाऊँगी.आप परेशान न हों”
“ अरे आप घबरा क्यों रही हैं? मैं सही सलामत आपको आपके घर छोड़ दूँगा”
अब जया के पास आशीष की गाड़ी में बैठने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था.कार की उस एक घंटे की ड्राइव में बोलते बतियाते दोनों सहपाठी कब एक दूसरे के मित्र बन गए ,फिर प्रणयी पता ही नहीं चला.
उसके बाद तो दिन,महीने,वर्ष प्यार में गोते लगाते,,पंख लगाकर उड़े. आशीष और जया की जोड़ी पूरे मेडिकल कॉलेज में प्रसिद्ध हो गई.कभी छुट्टियों के बाद घर लौटने में दोनों में से किसी एक को तीन चार दिन की भी देर हो जाती तो दूसरे की हालत परकटे पंछी सी हो जाती.. उसके बाद जब मिलते तो कितने स्नेहपगे उपालम्भ मिलते.
“ क्या आशीष,रश्मि से भी वैसा ही प्यार करता होगा”सोचकर तस्वीर में आशीष से लिपटी रश्मि की किस्मत से जया को ईर्ष्या हो आयी थी.
एम बी बी एस की फ़ाइनल सैद्धांतिक परीक्षाओं के बाद प्रेक्टिकल्स शुरू होने में थोड़ा वक्त था.जया और आशीष को मिले हुए कई कई दिन बीत जाते थे.एक दिन,जया ने आशीष को फ़ोन मिलाकर उस से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की तो पता चला,आशीष घर गया है.
“ यूँ बिना बताए आशीष घर क्यों चला गया”किसी बुरी आशंका से जया का दिल घबरा गया.घर पहुँच कर आशीष के पिता ने बताया ,
“आशीष, हम दोनों कब से तुम्हारे लिए एक योग्य लड़की की तलाश कर रहे थे. आख़िरकार अपने हीरे जैसे बेटे के लायक़ हमे एक सजातीय डॉक्टर लड़की मिल गई.लड़की और परिवार, हर तरीके से तुम्हारे योग्य है.अब मैं मर भी गया तो मुझे कोई दुख नहीं होगा”
“ छी: पापा आप कैसी बातें कर रहे हैं..”आशीष सिसक उठा था
कुछ देर बाद आशीष अपनी माँ के पास गया. घुटनों पर सर झुकाकर रोते रोते उसने जया और अपने प्यार के बारे में सब कुछ बता दिया. माँ हतप्रभ थीं. उन्होंने आशीष को समझाया,
“ तू तो जानता है न कि इस घर में वही होता है जो तेरे पापा चाहते हैं.”
“ माँ,आप पापा से बात तो करो..”
“तेरे पापा दिल के मरीज़ हैं आशीष. उनकी ज़िंदगी अब तेरे हाथ में है..”
आशीष रोते रोते सज्ञाशून्य सा हो गया.अब उसे जया कभी नहीं मिल पायेगी! उसका कलेजा चाक चाक हो रहा था.हॉस्टल पहुँच कर उसने जया को कुछ नहीं बताया,क्योंकि वो जानता था सबकुछ जानने के बाद जया प्रैक्टिकल्स नहीं दे पायेगी.
जया सुशांत की पत्नी बन गई.शुरू शुरू में सुशांत के हर स्पर्श से जया पर आशीष की यादें हावी होने लगतीं.बाद में उसने दूसरे शहर से अपने पीजी की पढ़ाई पूरी की.
पूरी रात जया रोती रही थी. सुबह उठी तो आशीष जा चुका था.आँसुओं से भीगे हुए तकिये के नीचे एक पत्र रखा था. लिखावट आशीष की थी.
“ जया,.वक्त बड़े बड़े घाव भर देता है.मैं ईश्वर से हमेशा प्रार्थना करता था कि,मेरी जया जहाँ भी हो खुश हो. मुझे ख़ुशी है तुम सुशांत के साथ सुखी हो. मैं और रश्मि भी अपने बेटे के साथ बेहद ख़ुश हैं. आज इस यात्रा के बाद मैं अपने सीने से एक बहुत बड़े बोझ को सीने से उतारकर जा रहा हूँ.
असीम स्नेह के साथ – तुम्हारा आशीष”
पत्र पढ़कर जया ने उसे टॉयलेट में फ़्लश चलाकर बहा दिया. आज उसके दिल का बोझ भी जैसे पानी की तरह बह गया था
