Hindi Story: सर्दी का मौसम था और बहुत देर बाद अब जाकर धूप निकली थी। इस कारण हॉस्पिटल के छोटे से बरामदे में ही कुछ मरीज और उनके परिजन बैठे हुए थे। जिनको धूप में बैठने की जगह नहीं मिल सकी, वे अंदर ही बैंचों पर ऊंघते अलसाते हुए या अपने मोबाइल फोन स्क्रॉल करते हुए बैठे थे। बीच–बीच में कोई अधीर व्यक्ति पास से गुजरते हॉस्पिटल के कर्मचारियों से पूछ लेता कि डॉक्टर साहब कब तक आयेंगे। रिसेप्शन काउंटर पर बैठा व्यक्ति सभी की पर्ची बनाने के बाद नर्सिंग रूम में हीटर के आगे बैठा गप्पें मारने में व्यस्त था।
दिन के बारह बज चुके थे। अचानक आवाज आई – डॉक्टर साहब आ रहे हैं और हॉस्पिटल में एकदम हलचल सी हो गई। सभी कर्मचारी अपनी–अपनी जगह मुस्तैद हो गए।
” आप लोग अंदर चलकर बैठिए। डॉक्टर साहब आ रहे हैं”, अभी तक आराम से बीडी सुलगा रहे गार्ड ने बाहर बैठे मरीजों से रौबदार आवाज़ में बीड़ी को पैर के नीचे मसलते हुए कहा। तब तक एक चमकदार काली मर्सिडीज हॉस्पिटल के गेट पर आ कर रुक गई। तीन–चार जूनियर डॉक्टर तेजी से कार की ओर लपके, एक ने मुस्तैदी से गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल दिया। डॉक्टर डी सी रिछारिया गाड़ी से बाहर आए। गेहुआं रंग, मध्यम कद और इकहरे बदन के डॉक्टर रिछारिया की आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा लगा हुआ था। उनकी आयु फोर्टी प्लस थी किंतु अच्छे खानपान और सेहत का ख्याल रखने के कारण वह पेंतीस साल से अधिक नहीं लगते थे।
एक नज़र हॉस्पिटल परिसर पर डालकर बिना गार्ड की नमस्ते का जबाव दिए वे तेजी से अपने केबिन की ओर चल दिए। कुछ लोग डॉक्टर को आता देखकर खड़े हो गए पर डॉक्टर रिछारिया ने किसी पर ध्यान नहीं दिया और अपने केबिन के अंदर चले गए। उनके जाते ही रिसेप्शनिस्ट ने मरीजों की फाइल एक कर्मचारी से अंदर भिजवा दी।
” काय, अभी कित्ती देर में नंबर आयेगा ?”, ग्रामीण वेशभूषा वाले एक व्यक्ति ने डॉक्टर रिछारिया को केबिन में जाते देखकर अधीर होकर रिसेप्शन पर पूछ लिया।
” अभी डॉक्टर साहब स्टाफ से मीटिंग करेंगे उसके बाद मरीज देखने शुरू करेंगे। बैठ जाओ, जब तुम्हारा नाम बोलें तब अंदर चले जाना।”
” हओ भईया, हम भांडेर से आए हैं , समय बहुत लग जात है झांसी आने में फिर वापिस भी जाना है। थोड़ा जल्दी करवा देना, माता जी से ज्यादा देर बैठा नहीं जाता। “, उस व्यक्ति ने विनती के स्वर में कहा।
” अरे भईया, यहां सभी दूर–दूर से ही आए हुए हैं। यश ही इतना है डॉक्टर साहब का। चिंता मत करो, बैठ जाओ जाकर।”
केबिन में मीटिंग शुरू हो गई थी।
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” डॉक्टर साहब ,बेड नंबर सत्ताइस के पेशेंट की रिपोर्ट आ चुकी है। उसके पेट में अल्सर है और हीमोग्लोबिन भी कम है।”, फाइल सामने रखते हुए जूनियर डॉक्टर ने बताया।
” उसकी एंटीबायटिक जारी रखो और दो दिन बाद ऑपरेशन की डेट दे देना।”, डॉक्टर रिछारिया ने रिपोर्ट देखते हुए कहा।
” ऑपरेशन…लेकिन सर उसे तो..”
” एंडोस्कोपी होगी लेकिन पेशेंट को ऑपरेशन बताना है। अकाउंटेंट से पूरा अमाउंट बनवा लो और उनसे एडवांस भी ले लेना। कह देना ऑपरेशन जल्दी करना जरूरी है वर्ना कैंसर तेजी से फैल सकता है।”
” पर रिपोर्ट में तो ऐसा कुछ नहीं है सर।”, जूनियर डॉक्टर ने हैरान होकर कहा।
” अरे यार, इसे समझाओ कोई, नये आए हो न … ये कैंसर हॉस्पिटल पैसे कमाने के लिए खोला है हमने। बहस मत करो…जो कहा है वो करो,समझे?”, डॉक्टर रिछारिया ने फाइल उसकी ओर सरकाते हुए कहा।
” सर, चिरगांव की जिस महिला का पिछले महीने ऑपरेशन किया था, वह फिर से यहां एडमिट हुई है। उसकी हालत खराब होती जा रही है। रात में भी उसे नींद का इंजेक्शन लगाना पड़ा, अब तो दर्द के इंजेक्शन भी तीन बार देने पड़ते हैं।”, दूसरे जूनियर डॉक्टर के बताने पर डॉक्टर रिछारिया के माथे पर बल पड़ गए।
उसकी फाइल देखते हुए उन्होंने कहा, ” ऐसा करो, उनको बोल दो कि इनको दिल्ली या मुंबई ले जाएं और छुट्टी दे दो। बता देना कि कैंसर दुबारा से फैल गया है और लास्ट स्टेज पर है।…एक काम करना, मेरी बात करा देना पेशेंट्स देख लेने के बाद । मैं खुद ही उनको समझा दूंगा। …यह सब तो चलता रहता है हॉस्पिटल है आखिर , तुम बताओ जोशी , एम आर से फॉरेन ट्रिप के गिफ्ट की बात का क्या हुआ?”
” हां सर, वे तैयार हैं, आपका वीजा के लिए आपका पासपोर्ट लगेगा।”, असिस्टेंट सुनील जोशी का उत्तर सुनकर डॉक्टर रिछारिया के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। ” विधायक जी को भी नये साल का बढ़िया तोहफ़ा भिजवा देना याद से…आखिरकार उन्हीं के आशीर्वाद से यह हॉस्पिटल चल रहा है।” कहकर डॉक्टर रिछारिया ने गहरी सांस भरी और मन में बोला , “वर्ना हम तो अब भी सरकारी अस्पताल में मरीजों नाक–कान– गले का ही इलाज कर रहे होते। कौन चेक कर रहा है कि मैं कैंसर स्पेशलिस्ट हूं भी या नहीं। ” सोचते हुए वो मुस्कुरा दिए।
मीटिंग खत्म हो चुकी थी। जोशी ने रिसेप्शन पर फोन करके मरीजों को अंदर भेजने के लिए कहा।
एक के बाद एक मरीज आ रहे थे। अगले पेशेंट को बुलाने के लिए असिस्टेंट ने घंटी बजाई। परदा हटाकर एक संभ्रांत सा बुजुर्ग व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ अंदर आया। उनके साथ उनकी बेटी भी थी।
” नमस्कार डॉक्टर साहब।”
” नमस्कार, आइए.. बैठिए। “, कहते हुए डॉक्टर साहब ने उनकी फाइल खोल ली।” तो बताइए, कब की डेट फाइनल की आपने ऑपरेशन के लिए?”
” ऑपरेशन की डेट लेने के लिए ही आया हूं। अब बेटियां आ गई हैं तो दिक्कत नहीं होगी। ये मेरी बड़ी बेटी है मालविका।”, बुजुर्ग ने परिचय कराते हुए कहा।
” लोगों को परिचय बढ़ाने की बहुत आदत होती है, मुझे क्या करना कि यह इनकी बेटी है या कौन है!”, डॉक्टर रिछारिया मन ही मन झुंझलाए लेकिन प्रकट में उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ” अच्छा यही आपकी बेटी है न जो भोपाल में रहती है!”
” जी हां , वही है,छोटी भी आ गई है। दोनों के आने से श्रीमती जी को भी सहारा हो जाएगा।”
” चलिए अच्छा है। ऐसा करते हैं ,दो दिन बाद यानि परसों ऑपरेशन कर लें?”, डॉक्टर रिछारिया ने पूछा।
” जैसा आप कहें। हमे कोई दिक्कत नहीं।”, जबाव मालविका ने दिया।
” ठीक है, आप एक दिन पहले ही दोपहर में एडमिट हो जाइएगा क्योंकि ऑपरेशन के पहले आपकी सभी जांच होनी जरूरी है , आपका बीपी …शुगर सब कंट्रोल में रखना होगा।”, डॉक्टर रिछारिया ने उनकी फाइल बंद करके उनको वापिस करते हुए कहा। ” अच्छा हुआ, आप जल्दी आ गईं, इनको मुंह का कैंसर है…ऑपरेशन जितना जल्दी हो उतना अच्छा रहेगा।”
” कोई दिक्कत तो नहीं होगी न? आई मीन… मैं जब बाहर बैठी हुई थी तो मैने देखा कि ड्रेसिंग करवाने आए लोगों के बैठने के लिए बैंच भी नहीं है ,वे खड़े हुए थे और एक मरीज की ग्लूकोज की बोतल उसके साथ वाले आदमी ने पकड़ी हुई थी ,कोई वार्ड ब्वाय या नर्स नहीं थी।”, मालविका ने संदेह से पूछा।
डॉक्टर रिछारिया एक पल के लिए सकपकाए लेकिन तुरंत ही भौंहों पर बल डालकर उन्होंने असिस्टेंट की ओर देखा,” जोशी, मैडम क्या कह रही हैं! क्या है यह सब…मरीजों का ध्यान रखना पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए मैं लाखों बार कह चुका हूं फिर भी?”
” सॉरी सर, दरअसल पुरानी बैंचों में दीमक लग गई थी, आपको बताया था। नई बैंच आने वाली हैं बस कुछ दिन की बात है…”
” कुछ दिन की बात!…क्या मतलब है इस बात का? तब तक मरीज परेशान होते रहेंगे क्या? कुर्सियां रखवाइए वहां और कोई भी मरीज जिसके ड्रिप लगी हो या चलने में दिक्कत हो ,उसे नर्स या वार्ड बॉय ही लेकर आएं , ध्यान रखिए इन सब बातों का और आज मीटिंग बुलाइए स्टाफ की!… थैंक यू मैडम, व्यस्तता के कारण मैं पर्सनली ध्यान नहीं दे पाता हॉस्पिटल पर। इसकी जिम्मेदारी इन लोगों की है पर ये लोग भी लापरवाही करने लगे हैं। आप निश्चिंत रहिए, अंकल को कोई परेशानी नहीं होगी।”, डॉक्टर रिछारिया ने आश्वस्त करने की कोशिश की।
उनके व्यवहार से मालविका के चेहरे पर भी राहत के भाव दिखने लगे थे।
” ऑपरेशन की तारीख नोट कर लेना।” असिस्टेंट से कहते हुए डॉक्टर रिछारिया को अचानक कुछ याद आया,” वैसे आपका तो बीमा होगा न?”,
” नहीं , बीमा नहीं है लेकिन मैं सरकारी पद से रिटायर हुआ हूं तो मेडिकल सुविधा मिलती है लेकिन कुछ प्रतिशत तक ही।”, बुजुर्ग व्यक्ति जिनका नाम नारायण दास था, ने कहा।
” यानि आप अच्छे पद पर कार्यरत रहे होंगे?”
” जी हां, मैं सिविल इंजीनियर था।”, बुजुर्ग के उत्तर को सुनकर डॉक्टर रिछारिया के चेहरे पर एक राजदार मुस्कान आ गई।” चलिए मिलते हैं जल्दी ही, दवाइयां समय से लेते रहिएगा और हल्का खाना खाइएगा।”
उनके जाने के बाद रिछारिया ने अपने असिस्टेंट से कहा, ” इनके बारे में पहले नहीं पता किया था ? इस हॉस्पिटल में ऐसे लोग कम ही आते हैं…”
असिस्टेंट कुछ कहता उसके पहले ही उन्होंने बोल दिया, ” खैर, यह तो मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था…अगले मरीज को बुलाओ।”
दूसरे दिन दोपहर में नारायण दास एडमिट होने के लिए आ गए।
” एडवांस जमा कर दीजिए।”, रिसेप्शनिस्ट ने एक फॉर्म और कुछ कागज देते हुए कहा। ” ये ऑपरेशन के खर्च की डिटेल्स है वैसे आप एक साथ पैसे जमा करेंगे या बाद में?”
वो यह पूछ ही रहा था कि तभी नारायण दास कागज पलटते हुए चौंक गए।
” नब्बे हजार! … हमारी तो डॉक्टर साहब से पचास हजार में बात हुई थी और उसमें तो दवाई का खर्च, ब्लड बैंक, डॉक्टर की विजिट, कमरे और टेस्टिंग; सभी के खर्च अलग – अलग दिए हुए हैं। हमें तो पूरा पैकेज बना कर दिया गया था।”
” दिखाइए पैकेज।”, रिसेप्शनिस्ट के कहने पर दोनों बुजुर्ग दंपत्ति एक दूसरे को देखने लगे।
” उन्होंने लिखित में नहीं दिया था। डॉक्टर साहब जब खुद ही बोल रहे थे तो हमने मान लिया उनकी बात को।”, नारायण दास की पत्नी हैरान – परेशान थी।
” तब आप डॉक्टर साहब से ही जाकर बात कर लीजिए।”
” आप यहीं बैठिए, मैं और मालविका बात करके आते हैं।”, नारायण दास की पत्नी उनकी सांस फूलती देखकर बोली।
” जब आपका नाम नाम बोलें तब आना।”, केबिन के बाहर बैठी महिला ने उन्हें अंदर जाने से रोकते हुए कहा।
” हम मरीज को एडमिट करवाने के लिए लाए हैं, कल ऑपरेशन होना है। उसी बारे में बात करना है।”,मालविका के कहने पर उस महिला ने उन्हें ठहरने के लिए कहा और अंदर चली गई।
कुछ देर बाद अंदर गए मरीज के बाहर निकलते ही उसने उन दोनों को केबिन में भेज दिया।
” नमस्कार “, नारायण दास जी की पत्नी ने कहा लेकिन मालविका का चेहरा सपाट था।
” हां, हो गए एडमिट अंकल?”, डॉक्टर रिछारिया ने नम्रता से पूछा।
” हम एडमिट करने के लिए लाए थे लेकिन डॉक्टर साहब हमारी तो आपसे ऑपरेशन के खर्च को लेकर कुछ और बात हुई थी और रिसेप्शन पर ज्यादा मांगे जा रहे हैं।”
” कितने कह रहे हैं?”
” नब्बे हजार..”
” मुंह के कैंसर का ऑपरेशन है मिसेज दास , सही तो बोले हैं उसने बल्कि हम तो आपसे बहुत कम ले रहे हैं , यही आप मुंबई– दिल्ली जाएंगी तो लाखों लग जाएंगे आपके। छोटे शहर में इतना बड़ा ऑपरेशन इतने कम पैसों में हो रहा है।”, डॉक्टर रिछारिया के बोलने का अंदाज़ ही बदल गया।
” पर आपने तो हमसे पचास हजार कहे थे। अब एकदम से…हम कैसे कर पाएंगे इतना। रेट सुनने के बाद ही तो हमने यहां ऑपरेशन करवाने का निर्णय लिया था।”, मिसेज दास रुआंसी हो गई थीं।
” इंपोसिबिल, आपको गलतफ़हमी हुई है। इतने कम क्यों कहेंगे हम भला। ऑपरेशन का खर्च ही नहीं निकलेगा।”, इस बार जोशी ने बोला।
” देखिए, आपने पैकेज बना कर दिया था। मुझे भी मम्मी –पापा ने यही बताया था जिसमें दवाई, टेस्टिंग ,रूम सब शामिल थे।”, मालविका से चुप नहीं रहा गया।
मिसेज दास इस झूठ पर हैरान परेशान थीं। कैंसर का नाम सुनते ही व्यक्ति और उसके प्रियजनों का आधा मनोबल पहले ही टूट जाता है। ऊपर से सरकारी विभाग में रहकर भी ईमानदारी की च्विंगम चबाता व्यक्ति केवल अपनी पेंशन और थोड़ी बहुत बचत के आसरे ही होता है। नारायण दास जी ने अपनी ईमानदारी की कमाई से ही दोनों बेटियों के विवाह करवाए थे और रिटायरमेंट के बाद एक छोटा सा घर बनाकर संतुष्ट जीवन व्यतीत कर रहे थे।
” पैकेज बना कर दिया था..तो कहां है वो पैकेज?”, डॉक्टर रिछारिया ने कठोरता से कहा। ” मेरी आपसे ऐसी कोई भी बात नहीं हुई थी मैडम। ऑपरेशन का खर्च इतना ही है और इतना कम खर्च बताकर मैं अपना नुकसान करूंगा क्या? “
डॉक्टर रिछारिया अब पक्के बिजनेसमैन लग रहे थे.” आपके पति को हार्ट की भी प्रॉब्लम है, शुगर पेशेंट हैं वो. ऑपरेशन टेबल पर उनको हार्ट अटैक आया तो क्या उसकी दवाई मैं दूंगा? कमाल करती हैं आप… पचास हजार में सब था!”, डॉक्टर रिछारिया ने व्यंग्य कसते हुए हिकारत से कहा. उनका अपमानजनक ढंग देखकर मां बेटी सन्न रह गईं.
यह डॉक्टर रिछारिया का अंतिम दांव था.मरीज की मजबूरी भांपकर ज्यादा पैसे निकलवाने का.वो आश्वस्त थे कि उनका यह दांव काम कर जाएगा लेकिन तभी मिसेज नारायण ने आंखों में आसूं भरकर उनके आगे हाथ जोड़ लिए, ” मैं हाथ जोड़ती हूं डॉक्टर साहब, उनकी हालत…”
“मम्मी”,मालविका ने मिसेज दास के कंधे पर हाथ रखा, ” हाथ जोड़ने की जरूरत नहीं, चलो.” उम्मीद के विपरीत मालविका ने बेहद शांत ठहरे हुए स्वर में कहा और अपनी मां को लेकर केबिन के बाहर चली गई.
दांव खाली जाता देखकर डॉक्टर रिछारिया ने जोशी से कहा, ” लगता है वो लड़की इनको कहीं और ले जाएगी, एक काम करो बुला लाओ उनको वापिस… पर दवाई का खर्च केवल ऑपरेशन के समय का पैकेज में जोड़ना और रूम का , विजिट वगैरह के खर्च बढ़ाकर देना, एक बार ऑपरेशन हो जाएगा उसके बाद तो यह हम पर निर्भर करता है कि कैसे पैसे निकलवाए जाय। सरकारी महकमे में बुड्ढे ने कमाई खूब की होगी. जाओ फटाफट.”
असिस्टेंट तेजी से लपकता हुआ बाहर गया.
” सुनिए..सुनिए, आप एडमिट हो जाइए. मैने सर को मना लिया है,वे उतने ही पैसे लेंगे जितने आप कह रहे थे.रिसेपशन पर जमा करवा दीजिए.”
यह सुनकर दास दंपत्ति जोशी को धन्यवाद दे ही रहे थे कि कुछ लोगों की भीड़ हॉस्पिटल में घुस आई.
” कहां है रिछारिया? गरीबों की जान का मोल नहीं है उसे!”
” बाहर निकालो.”, भीड़ के पीछे हॉस्पिटल का इकलौता गार्ड स्थिति संभालने की नाकाम कोशिश कर रहा था.
” आप एडमिट होने की ओपचारिकताएं पूरी कीजिए, यह सब इन गांव वालों का लगा रहता है. जरा सी बात हो जाय तो बस डॉक्टर पर ब्लैम. ध्यान मत दीजिए.”, कहकर जोशी तेजी से केबिन में गया. उसके पीछे – पीछे जूनियर डॉक्टर भी आ गए.
” सर वो चिरगांव वाली पेशेंट मर गई और किसी ने इन लोगों को भड़का दिया है कि आपने गलत ऑपरेशन किया है.”, जूनियर डॉक्टर के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं.
” जोशी ,फोन लगाओ विधायक जी को और पुलिस को भी खबर कर दो. उनके हिस्से समय से उन तक पहुंचते रहते हैं ऐसी ही स्थिति के लिए.”
कुछ ही देर में पुलिस ने आ गई और उपद्रव करने वाले लोगों को पकड़ कर ले गई।
” नारायण दास एडमिट हो गए ?”, इस अफरातफरी के शांत होने के बाद डॉक्टर रिछारिया ने पूछा।
” नहीं सर, उनकी लड़की किसी से फोन पर बात कर रही थी और उसके बाद वो यह कहकर गई है कि इस डॉक्टर के पास तो फर्जी डिग्री भी नहीं कैंसर स्पेशलिस्ट की, हॉस्पिटल के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की बात कर रही थी.”
” आवाज़?”
” जी सर , वो किसी अखबार की पत्रकार है.”
“ओहो, अख़बार की पत्रकार…”, डॉक्टर रिछारिया की हँसी छूट गई. ” सबके तार आपस में जुड़े हुए हैं. रुपयों की आवाज़ के नीचे सभी आवाजें दब जाती हैं, देखते हैं ये आवाज़ कहां तक जाएगी! कुछ समय बाद लोग बड़ी से बड़ी बातें भूल जाते हैं और बीमारियों का धंधा कभी मंदा नहीं होता.”
