“उठो बच्चों देखो स्कूल जाने का वक्त हो गया है। जल्दी उठो वरना बस निकल जाएगी”। रमा दोनों बच्चों की रज़ाई हटाते हुए बोली”। “नहीं हमें नहीं जाना” पिंकी दोबारा रज़ाई ओढ़ती हुई बोली। बंटी भी रज़ाई में घुसता हुआ बोला,” हां मम्मा हम स्कूल नहीं जाएंगे”। “अरे ऐसे कैसे नहीं जाओगे। चलो-चलो, गेट रेडी फॉर स्कूल” कहती हुई रमा कमरे से बाहर आ गई।
‎निशांत को बरामदे में अखबार पढ़ता देख उसके हाथों से अखबार ले चाय की प्याली थमाती हुई रमा बोली-” लीजिए जनाब आप की गर्मा—गर्म चाय। देखूं तो जरा आज की ताज़ा खबर में ऐसा क्या है, जो तुम अपनी आँखें गड़ाए बैठे हो”।
निशांत झट से रमा के हाथों से अखबार लेते हुए बोला- ” मैडम जब मैं तुम्हारे सामने हूँ तो तुम्हें कुछ और पढ़ने की क्या जरूरत?। इठलाती हुई रमा-“बस—बस ज्यादा रोमांटिक होने की आवश्यकता नहीं”।
सहसा रमा के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच आई और वह बोली- “निशांत देखो ना आज फिर बच्चे स्कूल नहीं जाना चाह रहे। पिछले एक महीने से वे स्कूल नहीं जा रहे और तुम भी तो दफ्तर नहीं जा रहे। आखिर बात क्या है”?
रमा परेशान होती हुई कहने लगी। “अरे यार…तुम सोचती बहुत ज्यादा हो। कोई बात नहीं है। तुम जा कर अपने काम निपटाओ, ओके। मैं बच्चों को देखता हूँ”।
कहकर निशांत चला गया। रमा चुपचाप खड़ी रही तभी उसने देखा मेन गेट के बाहर कुछ अजनबी उसके घर की ओर इशारा कर रहे हैं। रमा उन्हें नज़र अंदाज़ कर भीतर आकर अपने काम में लग गई। उसे ऐसा लग रहा है जैसे पिछले एक माह में उसके साथ कुछ घटना घटित हुई है। लेकिन उसे ठीक-ठीक कुछ याद नहीं आ रहा। निशांत और बच्चों के व्यवहार में भी परिवर्तन नज़र आ रहा है। उसकी अंतरात्मा कुछ अनिष्ट के संकेत दे रही है। घबराहट में सारा दिन निकल गया।
रात्रि के अंधेरे में अकस्मात ही रमा के कानों में अजीब-अजीब सी आहटें सुनाई पड़ने लगीं। वह घबराती हुई ध्वनि की ओर धीरे—धीरे बढ़ने लगी । कड़ाके की ठंड में उसका गला सूखने लगा और माथे से पसीना टपकने लगा। उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह किसी अनजान जगह पर पहुंच गई है।डरावनी आवाजों में उसे एक स्वर जाना—पहचाना सा लगा। सघन ताम (अंधेरा) में रमा को कुछ दिखाई नहीं दे रहा। वह बदहवास सी काफी देर तक आ रहे आवाज़ की ओर बढ़ती रही। एकाएक उसने देखा निशांत उन्हीं अपरिचित लोगों से घिरा हुआ है जो सुबह उसके गेट के बाहर खड़े थे। निशांत उन्हें कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था। माजरा क्या है यह जानने के लिए जैसे ही रमा आगे बढ़ी, उसकी नज़र अपने बच्चों पर पड़ी। जो रजनी की शरद हवाओं में उन बच्चों के साथ खेल रहे थे जिन्हें उसने कभी नहीं देखा। रमा दौड़ कर अपने बच्चों को बाकी बच्चों से अलग करती हुई बोली, “मैंने तुम दोनों को सुला दिया था ना! फिर तुम इतनी रात में यहाँ कैसे आए?और ये बच्चे कौन हैं?
“‎मम्मा ये सब हमारे न्यू फ्रेंड्स हैं। अब हम सब इन्हीं के साथ रहेंगे।”-पिंकी बोली।
‎”हाँ मम्मा…पापा ने हम से कहा है। वही तो हमें यहाँ लेकर आए हैं।” बंटी कहने लगा।
“‎बंद करो बेकार की बातें। हम भला यहाँ क्यों रहेगें। देखो इस जगह को कितनी भयावह है”। रमा झुंझलाती हुई बोली।”चलो यहाँ से” कहती हुई दोनों बच्चों को खींचती हुई ले जाने लगी। बच्चे रोने और चिल्लाने लगे तभी निशांत आ गया। ” रमा ये क्या कर रही हो ? छोड़ो इन्हें”। “नहीं” मैं अपने बच्चों को यहाँ नहीं रहने दूंगी। तुम भी चलो यहाँ से निशांत। ये जगह बड़ी विचित्र सी लग रही है और ये लोग भी।”
‎”नही” रमा अब ये संभव नहीं, तुम्हें भी यहीं हमारे साथ रहना होगा “।
‎”नहीं मैं यहाँ एक पल भी नहीं ठहरुंगी”। कहती हुई रमा बच्चों को घसीटती हुई कमरे में लाकर बाहर से दरवाजा बंद कर दिया।
‎अनायास रमा हड़बड़ा कर जागी। शायद वह काफी देर से सो रही थी। सूरज सर पर चढ़ आया था, तभी रमा को किचन में आहट सुनाई पड़ी। वह आश्चर्य से किचन की ओर बढ़ी। उसने देखा एक औरत खाना बना रही है। रमा के तन—बदन में आग लग गई। उसके अनुमति के बगैर एक अजनबी उसके किचन में कैसे काम कर रही है। रमा उसके करीब जा उसे खरी—खोटी सुनाने लगी, लेकिन रमा की बातों का उस पर कोई असर नहीं हुआ। वह अपने ही धुन में काम करती रही। रमा बौखला कर निशांत को इधर—उधर तलाशने लगी।


‎खिड़की से बाहर की ओर देखता निशांत बच्चों के कमरे में खड़ा मिला। रमा पैर पटकती निशांत के समीप आ कहने लगी-“वो औरत कौन है?उसे किस ने हमारे किचन में काम करने को कहा। निशांत तुम चलो मेरे साथ उसे तुरंत यहाँ से चले जाने को कहो। निशांत मौन खड़ा रहा। रमा चीखती हुई कहने लगी -” अच्छा तो तुम कुछ नहीं करोगे। ठीक है मैं ही उसे अभी अपने घर से निकाल कर बाहर करती हूँ।” रमा तमतमाते हुए कमरे से बाहर जाने लगी।
“रुको रमा” निशांत गम्भीर स्वर में बोला।
रमा के कदम थम गए। रमा के काँधे पर हाथ रखते हुए निशांत बोला-” रमा अब चलो,यह मकान हमारा नहीं रहा”।”नहीं मैं यहाँ से कहीं नहीं जाऊँगी ये घर मेरा है और मेरा ही रहेगा”। रमा जोर से चिल्लाती हुई बोली।


“रमा बात को समझो । वे लोग आ गए हैं। जिनका यह घर है। हमें यह मकान छोड़ना पड़ेगा। अब हम यहाँ और नहीं रह सकते”। रमा अपनी गोल—गोल बड़ी आँखें और बड़ा करती हुई बोली-“क्यों नहीं रह सकते बोलो क्यों नहीं रह सकते”। ” क्योंकि यह घर बिक चुका है और वे लोग हाल में पूजा की तैयारी कर रहे हैं।”
“मेरे घर पर उन्हें पूजा करने की इजाजत किसने दी?” रमा गुस्से में तेज कदमों से कमरे के बाहर जाने लगी तभी अचानक उसकी नजर एक महीने पुराने अखबार पर पड़ी जिस पर निशांत, रमा और उसके दोनोंं बच्चों की तस्वीर छपी थी। जिसका हेडलाइन था रोड एक्सीडेंट में दो बच्चों सहित एक दम्पती की मौत।

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