Hindi Story: “मेरे कपड़ों को मेरे ही बैग में रखना और अपने एवम बच्चों के कपड़ों को भी अलग – अलग बैग में ही रखना और हां हमें दो घंटे पहले हवाई अड्डे पर पहुंचना होगा तुम्हें मालूम है ना हवाई अड्डे पर समय लगता है इसलिए थोड़ा जल्दी करना और सभी सामान को एक बार जरूर देख लेना कुछ रह नहीं जाए ” अभिजीत अपनी धर्मपत्नी संध्या को यह सब कहते हुए अपने लैपटॉप पर अपने दफ्तर का ज़रूरी काम कर रहा था। संध्या यह सब सुनते हुए सामान की सूची बना रही थी जिससे अंतिम समय पर कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़े। वह अभिजीत को याद दिलाते हुए उससे पूछ रही थी – ” सुनो कुछ और है शायद तुम भूल रहे हो ” ? विदेश की रोजमर्रा की जिंदगी में पूरा परिवार बहुत व्यस्त रहता है मगर हर स्वदेशी व्यक्ति को विदेश में अपने ” वतन की मिट्टी ” की सुगंध बहुत याद आती है कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा था इस परिवार को भी। दस वर्षों के इस समय में इन्होंने अपने वतन अपने ” मां के आंचल ” को बहुत याद किया , विदेश में अकेलेपन के इस माहौल में स्वदेश को याद करते हुए अपना समय इस परिवार ने कैसे निकाला यह बस उन्हें ही मालूम था।
रात का भोजन पूरा परिवार एक साथ बैठकर कर रहा था , पूरा परिवार आने वाले सुख का स्वागत करने के लिए तैयार था। विदेश में यह रात पूरे परिवार की आख़िरी रात थी यह परिवार अपने ” मां के आंचल ” में सुकून की नींद लेने वाला था। स्वदेश की मिट्टी की खुशबू की यादों में पूरा परिवार खोया हुआ था। रात भर परिवार यही सपना देखता रहा। अगले दिन की सुबह हो चुकी थी पूरा परिवार तैयार होकर हवाई अड्डे की तरफ निकल चुका था रास्ते में गुजरने वाली सभी इमारतों और बाग – बगीचों को देखते हुए अभिजीत संध्या की तरफ देखकर एक हल्की – सी मुस्कान चेहरे पर रख लेता था। संध्या भी इन इमारतों और राहों में बिताया गया समय याद कर रही थी। मानो कोई बेटी अपने ससुराल से अपने ” मां के आंचल ” में जाकर लोरी सुनते हुए सोने जा रही हो। अभिजीत और संध्या इन दोनों के माता – पिता का निधन बहुत पहले हो चुका था। माता – पिता की यादों के नाम पर बस एक घर है जो दस सालों से बंद था वो सभी यादें उसी घर में किसी कैदी की तरह कैद हो चुकी थीं।
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संध्या की मां उसके बचपन में ही उसका साथ छोड़कर चली गई थीं, विवाह के बाद उसे अपनी मां का प्यार अपनी सास से ही मिला था। मगर कुछ ही महीनों के बाद उनका भी निधन हो चुका था , संध्या को अपने जीवन में मां का प्यार बहुत ही कम प्राप्त हो पाया था , इसलिए वह अपना ज़्यादा समय अपने बच्चों के साथ में ही गुजारती थी। जिससे जो अनुभव उसे प्राप्त हुए हैं वह उसके बच्चों को प्राप्त नहीं हो पाएं। मगर आज वह खुद एक बच्ची की तरह लग रही थी जो अपनी मां से मिलने के लिए उत्साहित थी। मगर इस खुशनुमा दिल में एक डर भी अपनी जगह बना चुका था , क्योंकि परिवार जिस कारण की वजह से स्वदेश छोड़कर विदेश में रहने के लिए चला गया था वह कारण भी वहां अपनी उपस्थिति मौजूद करने वाला था। अभिजीत के माता – पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए घर गिरवी रखकर कर्जा लिया था जिसे चुकाने में वह असमर्थ हो गए थे इसलिए पिता जी की आज्ञा पर दोनों ने बच्चों के साथ स्वदेश छोड़ दिया था। सालों पहले दुःख , दर्द , अपराध बोध यह सब कहीं वापिस उनकी जिंदगी में दस्तक तो नहीं देगा , यह ख्याल मन में आते ही अभिजीत और संध्या कांपने लग जाते हैं। यह विचार मन में आने से रोकने के लिए दोनों खुशी के पलों को याद करने लग जाते हैं मगर जिस प्रकार दीए के नीचे अंधेरा होता है वैसे ही इस खुशी के पीछे दुःख स्वयं को छुपाए हुए था।
स्वदेश में हवाई जहाज़ पहुंच चुका था। सारी कार्यवाही हो जाने के बाद सभी हवाई अड्डे से बाहर आ चुके थे। अभिजीत और संध्या ने जमीन को स्पर्श किया उनको देखकर बच्चों ने भी यही किया। परिवार घर की तरफ चल दिया था। घर पहुंचकर देखा तो घर वीरान- सा लग रहा था, परिंदों , धूल , गंदगी ने अपना साम्राज्य बना लिया था दरवाजा खोलकर देखा तो बहुत सारे सरकारी कागजों को देखा जिसमें इस घर जिसका नाम ” मां का आंचल ” है वह कर्ज नहीं अदा कर पाने के कारण नीलम होने वाला है, यह पढ़कर दोनों पर पहाड़ टूट जाता है। दोनों पूरे घर मे घूमकर अपनी यादों को ढूंढकर एकत्रित करने लगे। पुरानी सभी यादें समय के साथ में कहीं खोने लगीं थीं दोनों घर की दीवारों को स्पर्श करके अपने बीते हुए कल को याद करने की कोशिश कर रहे थे। आसमान में काले बादल छाने लगे और जोरदार बारिश होने लगी सभी मुख्य बरामदे में आ जाते हैं और आसमान से गिरती हुई बारिश की बूंदों को देखकर स्वयं की जिंदगी का अनुभव करने लगते हैं।
बारिश अब थम चुकी थी , बगीचे की मिट्टी गीली हो चुकी थी और दोनों की आँखें आंसू के कारण गीली हो चुकी थीं। अब एक सवाल उनके मन में था अब आगे क्या करना है ? इस घर को नीलाम होते हुए देखना है या फिर अपने सपनों को नीलाम होते देखना है। दोनों एक दूसरे से बातें कर रहे थे अपनी जिंदगी अपने बच्चों का भविष्य किसको दांव पर लगाना है ? अगली सुबह बैंक के कर्मचारी घर आ जाते हैं और नीलामी की बात कहते हैं। संध्या उन्हें एक चैक देती है जिसमें उसने पूरे घर का कर्जा चुकाने की कीमत भर दी थी बैंक कर्मचारी चले जाते हैं। संध्या अपने बच्चों के साथ खड़े होकर अभिजीत से कहती है – अभिजीत ” मां का आंचल ” सिर्फ तुम्हारा ही नहीं बल्कि मेरा भी है। ” मां का आंचल ” ही स्वर्ग होता है।
