Grehlakshmi Story: “अम्मा, आपके पैरों में तेल लगा दूं?” शांताबाई ने तेल की शीशी हाथ में लिए विमला देवी से पूछा।
” हां बिटिया, लगा दे बड़ा उपकार होगा!” “अरे अम्मा लाओ पैर दो। इसमें उपकार कैसा?” शांताबाई ने विमला देवी के पैर अपने हाथों में लेकर उनके घुटने से पैर तक में गर्म तेल से मालिश शुरू कर दी।
थोड़ी देर में विमला देवी को काफी आराम मिलने लगा। उन्होंने उसे दुआ देते हुए कहा
” जुग जुग जियो शांताबाई! लगता नहीं कि भगवान नहीं है। भगवान तो है। जब से विवेक विदेश गया है ,बड़ा डर लग रहा था कोई अपना है नहीं, किसके आगे हाथ जोड़ें… देखो भगवान ने तुम्हें विदा कर हमारे दरवाजे भेज दिया।”
शांताबाई की आंखों में आंसू आ गए ।
काफी देर तक पैर में तेल लगाने के बाद विमला देवी सो गई तो रजाई उढ़ा कर शांताबाई रसोई में चली गई। वह जल्दी-जल्दी खाना बनाने लगी। एक तरफ लौकी की सब्जी छौंक दिया और आटा माड़ कर रख दिया।
जब तक विमला देवी सो रही थी शांताबाई फोन लेकर ड्राइंग रूम में आ गई और वहां बैठकर फोन करने लगी। आखिर वह भी एक मां थी, उसे अपने घर की चिंता थी। सब कुछ कुशल देखकर शांताबाई निश्चिंत हो गई।
उसने समय देखा तो शाम के 6:30 हो रहे थे।
“अरे शाम हो गई है। उठा देती हूं अम्मा को चाय पी लेंगी।”
उसने जल्दी से चाय बनाया और चाय बिस्किट लेकर विमला देवी को उठाते हुए कहा
“अम्मा, चाय पी लो।”
“अरे तुमने चाय भी बना लिया।” चाय में बिस्किट डुबा कर खाते हुए विमला देवी ने खुशी से कहा
चाय बहुत ही अच्छी बनी है शांताबाई।”
“धन्यवाद अम्मा!” कप और जूठे समेट कर शांताबाई किचन में चली गई।
जल्दी-जल्दी खाना समेट कर उसे घर भी जाना था। उसने अपने हाथ तेजी से चलाने लगे।रोटी, लौकी की सब्जी और दूध वह तैयार करने लगी।
यह उसका रोज का काम था। लगभग 78 साल की विमला देवी एक बुजुर्ग और विधवा महिला थी।
वह अपने बेटे और बहू के साथ रहती थी।सबकुछ ठीक चल रहा था।
अचानक बेटे विवेक को उसकी कंपनी ने एक साल के लिए विदेश का चक्कर लगा दिया।
विवेक वहां जाने के बाद अपनी पत्नी और बच्चों को भी कंपनी की लिगल टर्म पर बुलवा लिया।
विवेक को विदेश अब अच्छा लगने लगा था, वह वहीँ सैटल करने की सोचने लगा।
इतनी जल्दी विमला जी को बुलाना पॉसिबल नहीं था इसलिए एक फुल टाइम मेड की जरूरत थी जो शांताबाई में जाकर खत्म हुई। हालांकि शांताबाई की भी कुछ अपनी शर्तें थीं। वह रात में नहीं रह सकती थी।
घर में बीमार ससुर थे।उसकी अपनी दो बेटियां थी और पति था। उनको छोड़कर वह रात में रुकने के लिए तैयार नहीं थी।
मन मारकर सोसायटी के गार्ड को रात की जिम्मेदारी दी गई और बाकी पूरे दिन की जिम्मेदारी शांताबाई निभाई रहती थी। शांताबाई को भी विमला देवी के यहां काम करने से बहुत ज्यादा सहारा मिल रहा था।
शांताबाई कोई पेशेवर कामवाली नहीं थी। उसका पति एक कंपनी में काम करता था। उसके घर में सास ससुर दो ननदें भी थीं। अचानक ही जब नंद की शादी ठीक हुई तभी ससुर का एक्सीडेंट हो गया। ससुर के एक्सीडेंट और अस्पताल का खर्च और ननद की शादी और दहेज के लिए शांताबाई के पति को एक अच्छा खासा रकम लोन पर चढ़ाना पड़ा।
शादी बीत गई और ससुर अस्पताल से वापस पर आ गए लेकिन कर्ज की रकम बढ़ती गई। मजबूरी में शांताबाई को खाना बनाने का काम पकड़ना पड़ा।
जब विमला देवी के बेटे विवेक ने एक अच्छी तन्ख्वाह में शांताबाई को अपनी मां को देखने के लिए ऑफर किया तो वह इनकार नहीं कर पाई। वह खुशी-खुशी कम करने के लिए तैयार हो गई। काम भी क्या था एक बुजुर्ग महिला की देखभाल ही तो करनी थी।
उसके बदले में विमला देवी उसे हजारों आशीर्वाद दे दिया करती थी।
कुछ दिनों से उनके पैरों में काफी दर्द रहने लगा था और सबसे बड़ी बात की अकेलेपन सबसे बड़ी बीमारी होती है जिससे विमला देवी जूझ रही थी।
शांताबाई से दो-चार शब्द बात कर विमला देवी को दिल से बड़ी शांति मिलती थी।
जब विमला देवी खाना खा ली तब विमला देवी ने कहा
“शांताबाई, बचा खाना घर ले जाना। फ्रिज में कुछ भी मत रखना।”
शांताबाई जैसे ही विमला देवी को रात्रि का दवाई खिलाने आई वैसे ही बेटे विवेक का फोन आने लगा।
शांताबाई फोन पर बात सुन रही थी। विवेक बोल रहा था
“मां अब पूरे साल की तैयारी कर लो मैं आपको अकेले रहने नहीं दूंगा। बस हो गया।”
यह सुनकर शांताबाई के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
विमला देवी के भरोसे उसने अपनी दोनों बेटियों के लिए अच्छे-अच्छे सपने देखे थे। उसे फैशन डिजाइन और कंप्यूटर की पढ़ाई में डालना चाह रही थी ताकि दोनों बेटियां शादी से पहले अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।
मगर विवेक की बात ने तो उसके दिल को सहमा दिया। उसकी आंखों में आंसू आ गए।
उसने विमला देवी से कहा
” अम्मा, अपना ख्याल रखना अब मैं चलती हूं।”
” हां बेटी जाओ अच्छे से।”
रात भर शांताबाई को नींद नहीं आई। कहीं से कोई उम्मीद की किरण नहीं नजर आ रही थी।
दस घर में भी काम कर ले वह तो भी इतने पैसे नहीं मिलेंगे जितना बिमला देवी के यहां से मिलते हैं और फिर उसका पति क्या और जगह काम करने दे देगा?
बड़ी उधेड़बुन में शांताबाई ने रात काटी।
अगले महीने दीपावली भी आने वाली थी। उसने सोचा था इस बार बेटियों को और सास ससुर को अच्छी कपड़े दिलवाऊंगी।
अब एक-एक पैसे और जोड़ कर रखने पड़ेंगे।
दूसरे दिन शांताबाई जब विमला देवी के घर पहुंची तो आज विमला देवी ज्यादा ही खुश लग रही थी।
जाहिर सी बात थी कि बेटे ने उन्हें अपने पास बुलाने के लिए हरी झंडी दिखा दी थी तो वह खुशी से फूले न समा पा रही थी।
शांताबाई अपने कामों में लगी रही।
“कोई बात नहीं ईश्वर तो है कोई ना कोई तो मेरे लिए उपाय छोड़ा होगा। और मेरी बेटियों के लिए के लिए भी।”
“क्या बात है शांताबाई, आज तो बड़ी ही बुझी सी लग रही है.. बड़ी उदासी लग रही है?” विमला देवी ने उसे उदास देखकर पूछा ।
“नहीं अम्मा कोई बात नहीं।”
” घर में सब खैरियत तो है?”
” हां अम्मा सब खैरियत है।”
” कभी तो तुम मुझे छुपाया नहीं करती कोई भी बात फिर क्या बात है?” विमला देवी के बार-बार पूछने पर शांता देवी शांताबाई रुक नहीं पाई वह फूट-फूट कर रोने लगी।
उसने अपनी सारी हाल बताते हुए कहा
“अम्मा, आप मेरी बेटियों के लिए सहारा हो, उम्मीद हो। आप चले जाओगे तो फिर हमारा क्या होगा?
सिर पर कर्ज का बोझ है। कैसे उतरेगा वो भी! यही सोच कर उदास हूं।”
” अच्छा तो इतनी बड़ी बात हो गई। विमला देवी मुस्कुराने लगी। मेरा बेटा आने वाला है शायद कल तक पहुंच जाएगा।”
” इतनी जल्दी?”शांताबाई चौंक गई।
” अगले महीने दिवाली है ना तो वह उससे पहले ही यहां से ले जाना चाहता है।”
“ओह..!, शांताबाई बस इतना ही बोल पाई। फिर उसने कहा
” अम्मा, मैं खाना बना लेती हूं ।”
“हां ठीक है।जाओ बना लो।”
दूसरे दिन विवेक विमला देवी को लेने आ पहुंचा।
“छह महीने के लिए यह घर ऐसे ही बंद कर चाबी तुम्हें दे जाएंगे शांताबाई। अगर मां को वहां अच्छा नहीं लगा तो वापस आकर वह यही रहेंगी।”विवेक ने कहा तो शांताबाई की उम्मीद की किरणें फिर से खिल गई।
विवेक ने शांताबाई से कहा
“शांताबाई, तुमने बड़ी अच्छे से हमारी अम्मा का ध्यान रखा है। ऐसा लगता है कि तुमसे हमारा पिछले जन्म का ही रिश्ता है।”
” हां साहब, शायद पिछले जन्म का रिश्ता है तभी तो! शांताबाई अपना सिर झुकाए हुए बोली।
” तुम्हारी दो बेटियां है ?”
“वो क्या कर रही हैं?”
“अभी तो पढ़ रही हैं। मैं तो यह चाहती थी कि अपनी दोनों बेटियों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाऊं और उसके बाद उन दोनों की शादी ब्याह करूँ। शादी से पहले दोनों अपने पैरों पर खड़ी हो जाएं।”
” यह तो बहुत अच्छी बात है शांताबाई। विवेक ने कहा, क्या पढ़ाई कराना चाहती हो?”
वैसे तो मेरी बेटी को फैशन डिजाइन पसंद है और दूसरी को कंप्यूटर पसंद है पर इतना पैसे हम कहां से लेकर आएंगे?”
” कोई बात नहीं बच्चों के सपने नहीं टूटने चाहिए।”
उसने शांताबाई के हाथ उसके तन्ख्वाह के अलावा पचास हजार रुपये दिए और कहा
” शांताबाई, तुम्हारे भरोसे ही 6 महीने से मां को मैं भारत में अकेला छोड़ा हुआ था। आपने वह भरोसे की कदर की। यह मत सोचना मैं आपकी गरीबी पर दया कर रहा हूं।
यह एक बेटे की तरफ से या भाई आप जो समझ लो इसे रख लो।
इस घर की सफाई वैसे ही चलेगी।और आपको तन्ख्वाह मिलती रहेगी।”
शांताबाई रूपये देखकर विवेक के पैरों पर गिर गई।
” अरे यह क्या कर रहे हो? आपकी जगह पैरों पर नहीं है शांताबाई हमारे दिल में है ।”
शांताबाई के आंखों से आंसू बहने लगे।
वह विमला देवी से लिपटकर रो पड़ी
” अम्मा आप बहुत याद आओगी।”
” कोई बात नहीं शांताबाई तुम भी बहुत याद आओगी।जाओ अपनी बच्चियों को अच्छे से पढ़ाओ।”
शांताबाई की दीवाली पहले ही मन गई थी।वह खुशी से अपने घर की ओर चल पड़ी।
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