सुबह का भूला-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Subha ka Bhula

Hindi Kahani: “तन्मय तुम ना बिल्कुल बच्चे हो.. अभी कितने रूठे हुए थे और अब मुस्कुरा रहे हो?”
“प्रिया मैं तुमसे ज्यादा देर तक रूठ नहीं सकता ..तुम मेरी कमजोरी हो, पता नहीं …या कोई जादूगरनी हो.. क्षण भर में सारा गुस्सा दूर कर देती हो।”
” वैसे जनाब इतना गुस्सा किस बात पर कर रहे थे?”
” गुस्सा कैसे नहीं होता? तुमने 1:00 बजे मिलने को कहा था… और अब पूरे 4:00 रहे हैं.. कुछ पता है मेरा क्या हाल हुआ ..इस नदी किनारे बैठे-बैठे कितने कंकर मैंने इस शांत नदी के जल में फेंक दिए.. और बेचारे कंकड़ों की क्या गलती जो नदी के तल तक जा पहुंचे?”
” अरे कुछ तो मजबूरियां रही होंगी यूं ही कोई बेवफा नहीं होता।”
” अच्छा स्वयं को बेवफा मानती हो ..?”
“नहीं ..कभी नहीं .तन्मय”
“फिर इस लफ़्ज़ का प्रयोग ही क्यों कर रही हो ?यदि सांस बेवफाई कर दे तो कह नहीं सकता लेकिन मैं तुमसे कभी जुदा नहीं हो सकता”
” चुप.. एकदम चुप.. और सांसों की बेवफाई की बात न करना तन्मय।”
प्रिया ने अपने नरम होठों को तन्मय के होठों पर रख दिया। क्षण भर के लिए दोनों एक -दूसरे में सामीप्य के लिए आतुर हो गए। फिर एक बिजली सी दोनों के तन मन में कौंध गई। किंतु पक्षियों के कलरव से मानो दोनों की तंद्रा टूटी और एक -दूसरे से अलग हो गए।

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” सुनो “
“सुनाओ “
“अपने पापा से तुमने मेरे विषय में बात की ?”
प्रिया ने पलकें झुका कर कहा ।तन्मय ने आश्वस्त करते हुए कहा “तुम फिक्र न करो.. जैसे ही पिताजी विवाह का जिक्र करेंगे मैं उन्हें स्पष्ट शब्दों में बता दूंगा कि मैं प्रिया से प्यार करता हूँ और वैसे भी मेरे पिताजी तुम्हारे बाबूजी के परम मित्र हैं। वे इस विवाह को कभी इंकार नहीं करेंगे और फिर एक दिन तन्मय नेपिताजी के समक्ष अपने मन की बात कह दी। सुनते ही सेठ किशोरीलाल आग बबूला हो उठे। और क्रोध में तन्मय पर बरसते हुए बोले ” तुम्हें शर्म नहीं आई ..एक नौकर की बेटी से प्रेम करते हुए।”
किंतु पिताजी रामदीन अंकल नौकर तो नहीं ..”
“तो क्या हुआ उसपर अमीरी नई-नई आई है। उसके पूर्वज हमारे यहां काम करते रहे हैं। कोई क्या कहेगा कि इकलौते बेटे का विवाह नौकर की बेटी से कर दिया। आखिर शादी अपने समाज और अपनी ही उठा बैठ के लोगों के साथ की जाती है।”
” किंतु पिताजी मैं प्रिया से बेपनाह मोहब्बत करता हूँ।”
” अरे मोहब्बत तो उसी से हो जाएगी बरखुरदार जिससे विवाह होगा। यह मोहब्बत का भूत 2 दिन में उतरकर भाग जाता है। बहुत देखे हैं तुम जैसे सिरफिरे।प्रिया तुम्हारी दौलत के चक्कर में तुम पर डोरे डाल रही है।”
उस रात तन्मय और पिताजी में बहुत बहस हुई ।किंतु कोई भी निर्णय न निकल सका।
अगले दिन तन्मय कुछ उदास -उदास सा कॉलेज गया। प्रिया वही लाइब्रेरी में बैठी है उसका इंतजार कर रही है। उसके हाथ में धर्मवीर भारती जी का उपन्यास है “गुनाहों का देवता”
“तन्मय क्या तुमने यह उपन्यास पढ़ा है?”
” कैसी बात करती हो प्रिया? क्या तुम्हें याद नहीं यह उपन्यास मैंने ही तुम्हें एक बार दिया था पढ़ने के लिए। तुमसे पहले पढ़ रखा है मैंने।”
“मुझे चंदर बिल्कुल तुम्हारे जैसा लगता है तन्मय, सही बात को सही कहने वाला।”
“अच्छा मेरी सुधा” तन्मय ने मुस्कुराते हुए कहा।
” तन्मय तुम्हें चंदर का चरित्र कैसा लगता है?”
” चंदर की छोड़ो पहले यह बताओ कि तुम्हें सुधा कैसी लगती है ?क्या मेरी प्रिया के जैसी नहीं लगती?”
” किंतु तन्मय इस उपन्यास में सुधा और चंदर कभी मिल ही नहीं पाते ।दोनों आस-पास रहते हुए भी नदी के दो किनारो की तरह दूर-दूर रहते हैं। मात्र जल की धारा से ही एक- दूसरे को आभासी रूप से छू पाते हैं। कल्पनाओं में मिलन करते हैं ।यथार्थ में तो उनका मिलना लिखा ही नहीं।”
” क्या प्रिया.. तुम उपन्यास के पात्रों को अपने जीवन से जोड़ रही हो ।”
“कभी-कभी ऐसा लगता है चंदर जैसे मैं भी तुमसे हमेशा -हमेशा के लिए दूर हो जाऊँगी।”
” ऐसी बातें क्यों सोचती हो ?तुम तो मेरी जाँ में हो ..आत्मा में हो ..हर कहीं हो ..तुम्हें मुझसे कोई नहीं छीन सकता “
और ऐसा कहकर तन्मय ने अपना हाथ प्रिया के हाथ पर रख दिया। तभी बेल बजी और दोनों की तंद्रा भंग हुई।वे अपने विचारों से बाहर निकले और दोनों ने एक दूसरे को गहरी निगाहों से देखा।ऐसा कई बार हुआ जब वे दोनों यह तक भूल गए कि वह कॉलेज में है या लाइब्रेरी में बैठे हैं ।मानो दीन- दुनिया की कोई सुधि ही न रही थी। फिर तन्मय ने प्रिया से बाबूजी का फैसला बताया। सुनकर प्रिया के गालों पर आंसुओं की धारा बहने लगी।
” सुनो तन्मय …तुम मुझे भूल जाना… तुम्हारे पिताजी जहां भी विवाह के लिए कहें कर लेना… किंतु उनका मन न तोड़ना.. तुम उनके इकलौते बेटे हो..”
तन्मय ने उसके होठों पर अपने होंठ रख दिए
” चुप हो जाओ..बिल्कुल चुप.. कुछ मत कहो.. एक शब्द भी न बोलो..” मैं इस तरह हार नहीं मान सकता.. सुनो ..क्या एक नाटक करोगी ?”
“नाटक ..यह तुम्हें क्या हो गया ?अब मन में कौन सी खुराफात सोच रहे हैं?”
“कुछ न कहो प्रिया बस अब पिताजी को मनाने का यह आखिरी उपाय है ..पिताजी चाहे कितने भी उसूलों वाले हों किंतु इस बात को सुनकर अवश्य ही तुम्हें अपने घर की बहू बनाने पर राजी हो जाएंगे।”
और फिर एक शाम प्रिया तन्मय के घर पहुंच गई और तन्मय की मां को भी अपने प्लान में शामिल कर लिया। रात को ही सावित्री देवी ने अपने पति से कहा कि “देखो तुम्हें तन्मय का विवाह प्रिया से ही करना पड़ेगा “
“अरे तुम्हारा भी दिमाग बेटे की तरह घास चरने गया है?माना कि प्रिया एक सुशील लड़की है ,किंतु तुम यह क्यों भूल जाती हो कि उसके दादा और परदादा हमारे यहां पर नौकर रह चुके हैं?”
” वह बीते जमाने की बात थी साहब.. आप कौन से युग में जी रहे हैं ?अब जमाना बदल रहा है ।भावनाओं को रिवायतों में नहीं बांधा जा सकता ।दोनों बच्चों की भावनाएँ एक दूसरे से जुड़ चुकी हैं।”
” चाहे कितना भी जुड़ाव हो गया हो ..किंतु मैं इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करूंगा।”
आप समझने की कोशिश क्यों नहीं करते ..अब बात हद से आगे बढ़ चुकी है.. दोनों बच्चे अपनी हदें पार कर चुके हैं ।”
“कौन सी हद पार हो गई है? क्या पहेलियां बुझा रही हो ?”
“यही की प्रिया की कोख में हमारे वंश का वारिस पल रहा है।”
इतना सुनना था कि सेठ किशोरी लाल अर्श से फर्श पर आ गिरे और उन्होंने कुछ देर तक गंभीर मुद्रा में इस विषय पर मनन किया ।फिर तन्मय और प्रिया के विवाह के लिए हामी भर दी। आनन फानन में तन्मय और प्रिया का विवाह कर दिया गया। प्रिया के कदम तन्मय के घर में क्या पड़े घर जैसे जन्नत हो गया ।प्रिया तन्मय के माता-पिता का बहुत ध्यान रखती। वह पाककला में तो निपुण थी ही, साथ ही साथ व्यवहार कुशल भी थी। उसने महीने भर में ही सेठ किशोरी लाल जी और आभा देवी को अपना बना लिया ।अब तो प्रिया यदि एक दिन के लिए भी मायके जाती तो किशोरी लाल उसे गाड़ी में बिठाते हुए कहते “बेटी सांझ तक आने की कोशिश करना ..तुम्हारे बिना घर काटने को दौड़ता है ..तुम्हारे हाथ की चाय बहुत याद आएगी ..”
सब कुछ सही चल रहा था किंतु तन्मय के मन पर एक बोझ था जो वह हल्का करना चाहता था। और फिर एक दिन उसने एक पत्र लिखकर पिताजी की डायरी के अंदर रख दिया.. उस डायरी के अंदर जिसे वे रोज सोने से पहले लिखा करते थे। पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार था

आदरणीय पिताजी
सादर चरण स्पर्श
मैंने आपसे एक बहुत बड़ा झूठ बोला है, किंतु आपने ही हमेशा सिखाया है कि कोई झूठ यदि भलाई की मंशा से बोला जाए तो वह सच के बराबर होता है। मैंने और प्रिया ने विवाह से पूर्व मर्यादा की कोई भी सीमा नहीं लांघी है। यह सब तो मात्र विवाह की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए रचा गया एक नाटक था ।किंतु आपसे बोला गया यह झूठ मेरे हृदय पर एक विशालकाय पत्थर की भांति रखा हुआ है ।आज प्रिया भी अपने मायके गई हुई है ।यदि आप सत्य जानकर हम दोनों को कोई दंड देंगे तो हमें सहर्ष ही स्वीकार होगा। जायदात से भी बेदखल करेंगे तो हम सहज ही यह घर छोड़कर चले जाएंगे ,किंतु झूठ की बुनियाद पर गृहस्थ जीवन का आरंभ करना सही नहीं लगा, इसलिए आपसे सब सच बता दिया। अब आप ही न्याय कीजिए और हमें इस झूठ के बोझ से मुक्त कर दीजिए ।
आपका बेटा
तन्मय
पत्र पढ़ कर किशोरी लाल जी की आंखें भीग उठी।
वे अगले दिन तन्मय के कक्ष में गए और उसे अपने सीने से लगा लिया। और अश्रुपूरित नेत्रों से कहने लगे
“तन्मय बेटा ..तुम उम्र में छोटे हो.. लेकिन अनुभव में नहीं.. तुम्हारी पारखी नजर कमाल की है।वाकई में मैं तुम्हारी नजर का मुरीद बन गया हूं ।यदि मैं दिया लेकर भी ढूंढता तो मुझे प्रिया जैसी योग्य वधु तुम्हारे लिए नहीं मिल पाती ।मुझे तो तुम्हारा शुक्रगुजार होना चाहिए ,यदि तुम यह नाटक न करते तो मैं अपनी मूढ़ बुद्धि के कारण कभी भी प्रिया से तुम्हारा विवाह न होने देता। और फिर मुझे इतनी प्यारी बेटी कभी नहीं मिलती। यदि सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।