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भोग नहीं भाव-21 श्रेष्ठ बुन्देली लोक कथाएं मध्यप्रदेश: Short Story in Hindi
Bhog Nhi Bhav

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Short Story in Hindi: बहुत पुरानी बात है। एक थे मुनि पुलस्त्य, बहुत ग्यानी-ध्यानी और विद्वान। वे लगातार देश-विदेश में घूम-घूमकर लोगों को धर्म-कर्म की शिक्षा देते और राजा-महाराजाओं को राह दिखाते थे। एक बार घूमते-फिरते हुए पुलस्त्य जी हस्तिनापुर के निकट से निकले तो उन्होंने सोचा भीष्म पितामह से मिलते चलें। भीष्म पितामह अपने आपमें बहुत विद्वान महावीर और धर्म-कर्म के ज्ञाता थे। महर्षि पुलस्त्य के आगमन का समाचार पाकर भीष्म ने उनकी अगवानी की, अपने सिंहासन पर बिठाया और आतिथ्य सत्कार के बाद कोई विचित्र वृत्तांत सुनाने का आग्रह किया।

पुलस्त्य बोले कि हे भीष्म आज तुमसे राजा सौदास का विचित्र वृत्तांत कहता हूँ। सुदूर सौराष्ट्र देश में किसी काल में एक राजपुत्र था सौदास। उसकी माँ बचपन में ही नहीं रही। पिता राज-काज में डूबा रहता। राजकुमार होने के कारण बचपन से उसे कोई रोकता-टोकता नहीं था। वह मनमानी करता, लोगों को तंग करता और लोग राजा के डर के कारण नुकसान उठाने या अपमान सहने पर भी कुछ न कहते थे। पिता के न रहने पर वह राजा बना। बचपन के दुर्गुण बढ़ते गए और वह निरंकुश होता चला गया। वह महापापी, पराया धन चुरानेवाला, पराई स्त्रियों में आसक्त रहनेवाला, महाअभिमानी, चुगलखोर और पाप कर्म कर दूसरों को दुखी देख प्रसन्नता अनुभव करने वाला हो गया

किसी समय राजा सौदास अपने सहायकों सहित उस वन में, जहाँ बहुत हिरण आदि जीव रहते थे, शिकार खेलने गया। उसने कई बेकसूर जानवरों को मारा और पकाने के लिए शाही रसोईघर में भिजवा दिया। अगले दिन थकान के कारण वह विश्राम कर रहा था। मन ऊबने लगा तो वह अकेला ही जंगल की ओर टहलते हुए चला गया। जंगल में उसने एक तालाब के किनारे, पीपल वृक्ष की छाया में एक आदमी को परिवार सहित पूजा करते देख पूछा की वह क्या और क्यों कर रहा है?

उस आदमी ने बताया कि उस दिन यम द्वितीया थी। उसने यम द्वितीया व्रत का माहात्म्य कह सुनाया। यह सुनकर राजा ने वहीं उसी दिन कार्तिक के महीने में शक्ल पक्ष की द्वितीया को उस आदमी के साथ ही उसके द्वारा दी हुई पूजन सामग्री से धर्मराज कर्मदेव चित्रगुप्तजी का पूजन किया। व्रत करके उसके बाद वह अपने शिविर में लौट आया। उसे उस रात बहुत गहरी शांतिपूर्ण नींद आई।

अगले दिन वह अपनी राजधानी लौट आया। कुछ दिन बाद याद आने पर उसने उस आदमी के द्वारा बताई गयी सामग्री मंगवाई और चित्रगुप्त जी का पूजन किया।

कुछ समय बाद राजा सौदास मर गया। यमदूतों ने उसे दृढ़ता से बाँधकर यमराज जी के पास पहुँचाया। यमराज ने राजा सौदास को अपने दूतों से पिटवाना आरंभ किया। देवयोग से देवाधिदेव चित्रगुप्त जी वहाँ से निकले। उन्होंने यमदूतों से पूछा कि इस राजा को किस दुष्कर्म की सजा मिल रही है?

यमराज बोले- इसने बहुत दुष्कर्म किए हैं किन्तु एक सत्कर्म भी किया है। देवयोग से कार्तिक के शुक्ल पक्ष में यम द्वितीया के दिन इसने आपका और मेरा गन्ध, चंदन, फूल आदि सामग्री से एक बार भोजन के नियम से और रात्रि में जागने से पूजन किया। हे देव! हे महाराज! इस कारण से यह राजा नरक में डालने योग्य नहीं है।

चित्रगुप्तजी ने कहा कि बचपन में सत्संगति और देख-रेख न होने के कारण दुर्भाग्यवश इसने दुष्कृत्य किए किंतु सत्संगति मिलते ही इसने सदाचार को अपनाया। यदि उसके बाद भी यह अनाचार करता तो कठोर दंड का भागी होता। खुद में सुधार लाकर सत्कर्म की ओर प्रवृत्त होकर इसने दुष्कृत्यों का पश्चाताप किया है इसलिए यह क्षमा का पात्र है। यह कहकर चित्रगुप्त जी ने उसे छुड़ा दिया और वह इस यम द्वितीया के व्रत के प्रभाव से उत्तम गति को प्राप्त हुआ।

ऐसा सुनकर राजा युधिष्ठिर भीष्म से बोले- हे पितामह! इस व्रत में मनुष्यों को धर्मराज और चित्रगुप्तजी का पूजन कैसे करना चाहिए? सो मुझे कहिए। भीष्मजी बोले- यम द्वितीया के विधान को सुनो। एक पवित्र स्थान पर धर्मराज और चित्रगुप्तजी की स्थापना कर उनका पूजन करें। यथाशक्ति पूजन सामग्री से श्रद्धा भक्ति सहित पूजन कर दक्षिणादि सामग्रियों का दान कर प्रभु को प्रणाम करें। पूजन सामग्री जुटा सकने की सामर्थ्य न हो तो मानसिक पूजन ही पर्याप्त है। चित्रगुप्त जी भोग नहीं, भाव के भूखे हैं। भक्ति के साथ यम द्वितीया का व्रत करनेवाला धन-धान्य, संतानादि से युक्त होकर मनोवांछित फल पाता है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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