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कथा-कहानी

सुमित उनकी प्रभा बिटिया का इकलौता बेटा था जो सातवीं कक्षा में पढ़ता था और छुट्टियों में अपने ननिहाल आया हुआ था। दामू दादा हाल ही में नौकरी से सेवानिवृत हुए थे और पत्नी पार्वती के साथ अपने छोटे से मकान में रहते थे। पार्वती का स्वभाव थोड़ा अलग टाईप का था। इसलिए आस पड़ोसियों से उनके संबंध बस काम पूर्ति के ही थे। कई बार वह बात बेबात दामू दादा पर भी बरस पड़ती थी, इसलिए जहां तक हो सकता था वे उससे दूर ही रहते थे। कभी सुमित को लेकर गार्डन चले जाते तो कभी सिनेमा तो कभी मेले में। यह मेला तो छुट्टियाें में हाल ही में लगा था पर उसकी तारीफ हो रही थी तो उन्होंने सोचा क्याें न सुमित को मेला ही दिखा लाएं। पार्वती को भी चलने को कहा पर उसने मना कर दिया। तो सुमित को लेकर वे मेले में चले गए थे। मेले में अनेक प्रकार के झूले, चकरी, खिलौने, खाने पीने और सस्ते तथा एक भाव वाले सौंदर्य प्रसाधन के स्टाल वगैरह थे। यह मेला देखकर उन्हें अपनी जवानी के वे दिन याद आ गए जब वे पार्वती को घुमाने लाए थे।

मेले से लौटते हुए वे सुमित का हाथ थामे घर में प्रवेश कर ही रहे थे कि क्या देखते है कि वही कुत्ता घर तक आ गया है। शायद इसे और बिस्किट चाहिए यह सोचकर पैकेट में कुछ और बिस्किट उस कुत्ते को देकर उन्होंने घर का दरवाजा बंद कर लिया। पार्वती ने खाना तैयार कर लिया था। तीनों ने भोजन ग्रहण किया इसी दौरान सुमित नानी को मेले की बातें बताने लगा। वह एक पजल भी ले आया जिसे देखते हुए आदत अनुसार पार्वती ने उसकी किमत पूछी। दामू दादा ने कीमत को लेकर सुमित को पहले ही सचेत कर दिया। कि वास्तविक कीमत से कम बताना तो नानी नाराज नहीं होगी और बिल्कुल यही हुआ। पजल से खेलते हुए तीनों कब सो गए किसी को पता नहीं चला। आधी रात को कुत्तों के भौंकनें की आवाज ने दामू दादा की नींद खलल पैदा किया। आवाज नजदीक और लगभग घर के बाहर से ही आती प्रतीत हो रही थी। कहीं चोर वोर तो नही है। इस शंका में वे उठे और दरवाजा खोला तो देखा मेले से पीछे लग कर आया कुत्ता घर के बाहर ही अभी तक जमा था और दूसरे आवारा कुत्ते उस पर भौंक रहे थे। उन्हें जाने क्या सूझी कि उस कुत्ते को उन्होंने अंदर कर लिया और दरवाजा बंद कर सांकल चढ़ा ली और सो गए। अब कुत्तों की आवाज आना बंद हो गई थी। 

सुबह पार्वती की नींद पहले खुल गई थी। बरामदे में कुत्ते को देखकर वह भड़क गई। कौन लाया इसे, किसने अंदर किया निकालो इसे। आवाज सुनकर दामू दादा उठ गए थे। उन्होनें मेले से घर तक की सारी बातें बताई। तो पार्वती कुत्ते को जहां से पीछे लगा था वहीं छोड़ आने को कहने लगी।

दामू दादा ने कुत्ते का पक्ष लिया और कहने लगे आजकल तो कुत्ते स्टेटस सिंबल बन रहे हैं पार्वती। इन्हें तो पालने का चलन है। बड़ी कीमत चुका कर विभिन्न नस्ल के खरीदे जाते हैं । कारों में घुमाएं जाते हैं और बेचारा यह तो मुफ्त का फिर ये खुद चल कर आया है। तो रह लेने दो कुछ दिन। चौकीदार का काम करेगा। देख लेना मुसीबत परेशानी में काम ही आएगा। सुमित को भी खेलने का साधन मिल जाएगा। जब तक सुमित है रहने दो। कुत्ता बच्चे से थोड़ा बड़ा था पर दिखने में अच्छा था। शेष रात को उसने किसी को तंग नहीं किया था। कुत्ता हल्के पीले रंग का था।

दामू दादा के तर्कों से संतुष्ट पार्वती फिर कुछ न बोली और अपने दैनिक नित्य कर्म में लग गई। स्नान पूजा के बाद भोजन की तैयारी कर ही रही थी कि दामू दादा बोले अब गाय के साथ इस कुत्ते के लिए भी रोटी निकाल दिया करना। सुनकर पार्वती की भकुटी तनी पर वह कुछ बोली नहीं। ठीक है। तब तक मैं बिस्किट के पैकेट में कुछ बिस्किट इसे दिये देता हूं, कह कर दामू दादा झोला टटोलने लगे। इतने में सुमित भी उठकर नित्य कर्म निबटा कर कुत्ते के पास आ गया था। नानाजी मैं दूंगा इसे बिस्किट सुमित कुत्ते को सहलाने लगा। दामू दादा ने उसे सचेत किया कि सावधान रहे कहीं काट न ले। पीछे से पार्वती बोली-अगर इसे रखना है तो इंजेक्शन वगैरह भी जल्दी लगवा लेना।

हो हो भागवान। कहते हुए दामू दादा इस नए खर्चे पर थोड़ा चोकें। उन्होंने कुछ बिस्किट सुमित के हवाले किए। सुमित बड़े प्यार से कुत्ते को बिस्किट खिलाने लगा। कुत्ता भी पूंछ हिलाते हुए बिस्किट खाने लगा। तभी सुमित बोला नानाजी इसका कोई नाम रख दें।

हां हां क्यों नहीं इसके आने से तेरा टाइम अच्छा पास हो जायेगा। इसलिए इसका नाम टाॅम रख देते हैं। दामू दादा के मुंह से यों ही निकल गया। पास , हां यही ठीक रहेगा नानाजी, क्याें टाॅम, सुमित कुत्ते से मुखातिब हुआ। बदले में कुत्ता पूंछ हिलाने लगा। मानो जैसे उसे भी यह इंग्लिश नाम जंच गया हो। पार्वती ने भोजन तैयार कर भगवान को भोजन की थाली लगा दी थी। घंटी बजा कर उन्होंने थाली हटाई और रोटी के डिब्बे से गाय और कुत्ते की रोटी निकाल कर सुमित को आवाज दी। सुमित ने दौड़कर रोटी हाथ में ले ली।

आज मैं दोनों को रोटी दूंगा आमतौर पर दामू दादा ही गाय को रोटी दिया करते थे। पर घर में कुत्ता आ जाने से सुमित उत्साहित हो गया था। गाय की रोटी एक ओर रख सुमित रोटी हाथ से उपर उचकाने लगा। टाॅम ने उचक कर रोटी मुंह में ले ली। देखकर सुमित हंसने लगा। शाबास अब ऐसे ही रोटी मिलेगी टाॅम ओके कह कर सुमित गाय को रोटी देने घर के बाहर हो लिया।

 दामू दादा पार्वती से बोले, देखा हींग लगी न फिटकरी और रंग चोखा हो गया। सुमित को अब टाईम पास करने के लिए किसी की जरूरत नहीं। कुत्ता आने से अब यह बोर नहीं हुआ करेगा। कुत्ते से इसका मन बहल जाया करेगा । मेरे साथ इधर- उधर जाने की अब जिद तो न किया करेगा। फालतू के खर्चे से बचेेगें। तुम अपना फायदा देखते हो। एक ओर काम बढ़ गया उसका कुछ नहीं पार्वती बोली। चलो अब खाने की तैयारी करें।

 धीरे धीरे टाॅम परिवार में घुलने लगा था। पार्वती जो पहले उससे खींची खींची रहती थी। अब उसे भी वह अच्छा लगने लगा था। टाॅम ने सभी का मन जीत लिया था। दामू दादा बाजार जाते तो उसका ख्याल रख टोस वगैरह लाना नहीं भूलते। धीरे धीरे टाॅम आहट मात्र से परिवार के सदस्यों को पहचानने लगा था। दामू दादा ने उसे इंजेक्शन तो लगवा ही दिया था साथ ही गले का पट्टा और बांधने की चैन भी ले आए थे।

 टाॅम के लिए जगह फिक्स हो गई थी। वह बरामदे में दरवाजे के पास बैठा रहता और किसी अपरिचित के आने पर भौंक कर सचेत करता। नजदीक रहने वाले दामू दादा के मित्र रमेश जी यदा कदा दामू दादा से मिलने आया करते थे। जब आते, दोनों के बीच थोड़ी गप शप होती चाय नाश्ता होता, ताश वगैरह खेला जाता और फिर रमेशजी अपने घर निकल जाते। टाॅम के आने के बाद से उनका आना नहीं हुआ और न ही दामू दादा का रमेशजी के यहां जाना ही। एक दिन रमेश जी आ धमके। अभी वे घर में घुसने को थे ही कि टाॅम उन्हें देखकर भौंकने लगा। सुमित घर मं नहीं था वह दोस्तों के साथ खेलने चले गया था। सो दामू दादा फूर्ति से बाहर आए रमेशजी को देखकर टाॅम को चुप कराने लगे।

कितने में खरीदा। रमेशजी को कुत्ता खरीदा हुआ लगा तो पूछने लगे। मुफ्त का है। मेले से पीछे हो लिया था। तब से यही है। अच्छा है आपके लिए भी एक काम पैदा हो गया है। जिसको जितनी सेवा करवाना है कैसे भी करवा ही लेता है, कहते हुए दामू दादा रमेशजी को ड्राइंगरूम में लिवा लाए।

दोनों के दो घंटे कैसे निकल गए पता ही नहीं चला। वो तो रमेशजी के घर से मोबाईल आया तो उन्हें विदा लेनी पड़ी। जाते अपने घर टाॅम को भी ले आने का रमेशजी दामू दादा को कहते गए। 

टाॅम पालतू नहीं था। वह सड़क से आ गया था। उसे घर में कम ही अच्छा लगता था। तीनों में से कोई भी घर के बाहर जाता तो वह उनके साथ हो लिया करता था। टाॅम इतना तो समझदार हो ही गया था कि वह घर को कभी गंदा नहीं करता था। जब भी उसे लघुशंका या निपटने की लगती वह चुपचाप बाहर चले जाया करता। हां इतना अवश्य था कि दूसरे कुत्तों से उसे बचाने के लिए ऐसे समय छड़ी लेकर दामू दादा को भी उसके साथ जाना पड़ता था।

 ऐसे ही, एक दिन पार्वती कोई काम से घर से बाहर निकली तो टाॅम भी उनके साथ हो लिया। पार्वती अपनी धुन में चले जा रही थी। उन्हें पता नहीं चला कि टाॅम उनके पीछे पीछे आ रहा है कि पीछे से कोई लड़का तेजी से उनकी बगल में आया और गले की चेन पर झपट्टा मार कर भागने लगा। यकायक हुई घटना से पार्वती हतप्रभ रह गई। वे चिल्लाना चाहती थी, पर आवाज नहीं निकली। आसपास कोई नजर नहीं आ रहा था ऐसे में उन्होंने देखा कि टाॅम उस बदमाश पर लपक पड़ा है टाॅम ने लड़के की पेंट को मुंह में ले लिया इससे वह लड़का गिर पड़ा। तब तक कहीं से और भी लोग आ गए। क्या हुआ, उत्सुकतावश पूछने लगे। पार्वती अब तक संभल चुकी थी। उन्हें चेन की फिक्र थी। लड़के को दो धौल जमा उससे चेन लेकर पर्स में रख ली। लोगों ने भी उस बदमाश पर अपने हाथ साफ किए। कहने लगे इसे थाने में बंद करवाते हैं चलो।

पार्वती को उनकी चेन मिल चुकी थी टाॅम की वजह से । चेन सोने की थी भी नहीं अलबत्ता उस पर सोने का पानी जरूर चढ़ा हुआ था इसलिए वह अब कोई झमेले में पड़ना नहीं चाहती थी। उन्होंने लड़के को भीड़ के हवाले किया और स्वयं टाॅम के साथ घर को लौट गई।

इस घटना के बाद से दोनों को अब टाॅम की सार्थकता नजर आने लगी थी। पार्वती ने अर्थपूर्ण नजरों से दामू दादा को देखा और चाय बनाने किचन में चली गई। अगले दिन टाॅम के लिए अधिक रोटियां बनाई गई। 

सप्ताह मेें एक दिन तो खैर खबर और हाल चाल जानने के लिए तीनों की सुमित की मम्मी प्रभा से बात हो ही जाया करती थी। या तो प्रभा का फोन आ जाता या फिर इधर से फोन लगा लिया जाता। इस बार इधर से फोन लगा लिया गया। तीनाें से बारी बारी से प्रभा से बातें की पार्वती ने चैन वाली घटना के बारे में बताया तो प्रभा ने बताया कि सुमित के पापा को कंपनी के काम से पूना जाना पड़ा है दो तीन दिन में लौट आयेगें। सुमित ने मम्मी को टाॅम के बारे में बताया कहने लगा टाॅम के आ जाने से उसका टाईम अच्छा पास हो रहा है। पर वह मम्मी पापा दोनों को मिसकर रहा है। प्रभा ने बताया कि अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। जितना खेलना है और खेल लो। कुछ ही दिनों में स्कूल खुलने ही वाले हैं सो उसे लौटना होगा। सुमित न पापा से बात करने की जिद की तो प्रभा को कहना पड़ा कि दो तीन में लौटते ही वह उसकी बात करा देगी।

  सुमित को इस बात पर गुस्सा था कि क्या पापा आगे रहकर उससे फोन पर बात नहीं कर सकते थे। उसने पापा को मोबाईल दिलाने की जिद भी की थी तो वे टाल गए थे। सुमित ने भी सोच लिया कि इस बार वह मोबाईल लेकर ही रहेगा चाहे कुछ भी हो जाए तभी स्कूल जाएगा।

  मोबाईल आएगा तब आएगा फिलहाल तो सुमित को टाॅम का साथ मिल गया था। दोनों जैसे घुल मिल गए थे। सुमित के घर में प्रवेश करते ही टाॅम जोर जोर से पूंछ हिलाता। जमींन जमीन पर उसके पैरों के नजदीक लौट लगाता उसके आगे पीछे चक्कर लगाता। पिछले पैरों पर खड़ा भी हो जाता। सुमित ने मन ही मन सोच लिया था जो भी हो इस बार जब वह जाएगा तो टाॅम को भी ले जाएगा चाहे मम्मी पापा जा कहें।

  टाॅम भी परिवार के रंग में रंग गया था। यह शायद संगति का ही असर था कि इंसान तो इंसान जानवर भी बदल जाते हैं। रोटी के लिए शुरूआती दिनों में भौंकने वाला टाॅम भगवान को भोजन की थाली घंटी बजाकर हटने के बाद रोटी ग्रहण करने लगा था। यह बात उस दिन और साफ हो गई जब सभी के उपवास के कारण घर में रोटी नहीं बनीं। यह टाॅम के लिए हैरत भरा दिन था पर उसे दी गई ब्रेड, बिस्किट, टोस में से उसने परिवार के सदस्यों को देखते हुए कुछ भी ग्रहण नहीं किया। जब परिवार के सदस्यों ने चाय ग्रहण की और उसे दूध दिया गया तो उसने दूध ग्रहण किया। इसे देखते हुए उसे दूध ज्यादा दिया गया।

  पार्वती और दामू दादा दोनों का व्यवहार भी उसके प्रति अब बदल गया था। यह सब देखते हुए अब भोजन फिक्र से जल्दी बनाया जाने लगा था ताकि टाॅम को रोटी दी जा सके। उसके समक्ष पहले रोटी पटक भी दी जाती थी। तो वह तक तक रोटी सूंघता भी नहीं था जब कि भगवान के आगे से घंटी बजाकर थाली हटा नहीं ली जाती थी। 

  प्रभा से बात किए दो दिन हो चुके थे कि तीसरे दिन फोन की घंटी बजी। सुमित टाॅम के साथ बाहर चला गया था । सो दामू दादा ने फोन उठाया तो प्रभा की आवाज में घबराहट थी। दामू दादा चौकें क्या हुआ बेटी… कुछ तो बता सुनकर अंदर के कमरे से पार्वती भी लपकी। उधर से प्रभा ने जैसे तैसे पूना से बस से लौटते हुए बस के एक्सीडेंट से सुमित के पापा विश्वास के घायल होेने की सूचना दी। दामू दादा बोले कहीं ज्यादा चोट वोट नहीं लगी बेटा। हम आये क्या। 

  ये अस्पताल में भर्ती हैं। प्रभा की रूलाई फोन पर ही फूट पड़ी। पार्वती ने भी ढांढस बंधाया, तुम फिकर मत करो हम पहुंच रहे हैं।

दामाद के एक्सीडेंट ने दोनों को विचलित कर दिया था। सुमित को कुछ नहीं बताया गया। जो भी हो जाना तो पड़ेगा। जल्दी जल्दी तैयारी करो। मैं सुमित को देखता हूं कह कर दामू दादा घर के बाहर की ओर गए।

सुमित को जैसे  ही बताया कि नाना नानी के साथ उसे लेकर उसके घर जाना है तो पहले तो वह चौंका एकदम से क्यों। ऐसा कौन सा काम आन पड़ा जो आज ही जाने को कह रहे हैं। टाॅम को सहलाते हुए उसने सोचा। दामू दादा ने जैसे तैसे उल्टी सीधी पट्टी पढ़ा कर उसे राजी कर लिया। वे चाहते थे सुमित को उसके घर पहुंच कर ही बताया जाए। सुमित अड़ गया अगर वह चलेगा तो टाॅम को भी लेकर चलेगा वरना नहीं। टाॅम की नई मुसीबत थी जिस हड़बड़ी में दामू का ध्यान ही नहीं गया था अब तक। उन्होंने पार्वती से मशविरा किया। दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि टाॅम को ले जाना संभव नहीं । तो फिर टाॅम का क्या किया जाए। पार्वती का कहना था कि उसे मोहल्ले में छोड़ दिया जाए। पर दामु दादा इसके लिए तैयार न थे क्योंकि वे जानते थे कि इसे छोड़ा तो मोहल्ले के कुत्ते इसे छोड़गें नहीं।

अब उन्हें रमेशजी का ख्याल आया। क्यों न उनके यहां छोड़ आए। उनके यहां पर्याप्त जगह भी है। हां, यही ठीक रहेगा। उन्होंने इस पर सुमित और पार्वती को भी राजी कर लिया। सुमित ने भी सोच लिया कि वह मम्मी पापा को राजी करके अगली बार टाॅम को यहां से ले जाकर रहेगा। पार्वती को सामान पैक करने से बोल कर रमेशजी टाॅम को लेकर रमेशजी के यहां के लिए निकल गए। संयोग से रमेशजी घर  पर थे। और कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे। दामू दादा को टाॅम के साथ आता देख थोड़े विस्मित हुए। दामू दादा ने दामाद के एक्सीडेंट की बात बताई तो रमेशजी अफसोस जााहिर करने लगे। दामू दादा ने बताया कि उन्हें प्रभा के पास जाना है सो कुछ दिनों के लिए टाॅम को रख लें।

हालात देखकर रमेशजी राजी हो गए। उन्होनें टाॅम को सहलाया। टाॅम पूंछ हिलाने लगा। रमेशजी ने चेन अपने हाथ में ले ली। दामू दादा के जल्दी थी और सारा ध्यान एक्सीडेंट वाली घटना पर था सो टाॅम को रमेशजी के हाथों सौंप फटाफट लौट गए जाते जाते वे घर की निगरानी का भी बोल गए।

इधर तब तक पार्वती और सुमित लगभग तैयार थे। बस स्टैंड टिकीट पक्की की और बैठ गए स्लीपर बस में 15 घंटे का सफर बैचेनी से कटा। कुछ नींद आई कुछ नहीं आई। सफर पूरा हुआ बस स्टैंड पर उतरे । सीधे अस्पताल पहुंचने के लिए बस स्टैंड पर ही फ्रेश होना उचित समझा। सुलभ काम्पलेक्स की सुविधा होने से कोई असुविधा नहीं हुई। आॅटो वाले को प्रभा द्वारा बताए अस्पताल का नाम बताया और बैठ गए। फ्लेट पर जाने के बजाए अस्पताल क्यों सुमित चौंका । उसे अब डर लगने लगा था। 

अवश्य ही कोई बात है। बताओ ना नानी क्या हुआ।

आखिर पापा के एक्सीडेंट वाली बात सुमित को बताना ही पड़ी। सुनकर वह बैचेन हो गया। अस्पताल के गेट पर पहुंचते ही पास की दवा की दुकान पर प्रभा दवा लेती हुई दिखाई दी। मम्मी, मम्मी कहता हुआ सुमित दौड़ा। दामू दादा और पार्वती दोनों ने प्रभा की अस्त व्यस्त हालत देखी। सबको देख प्रभा विवहल हो उठी। दोनों ने प्रभा को ढांढस बंधाया। प्रभा तीनों को लेकर प्राइवेट वार्ड में दाखिल हो गई जहां विश्वास पलंग पर लेटे थे। एक्सीडेंट से एक हाथ और एक पांव बुरी तरह जख्मी हुए थे।

विश्वास के चेहरे पर दर्द को पढ़ा जा सकता था। सुमित पापा की हालत देखकर रोने लगा। विश्वास ने सुमित को प्यार से सहलाया। प्रभा दवा तैयार कर रही थी। दामू दादा ने दामाद से सारी जानकारी ली। आखिर यह सब कैसे हो गया। विश्वास ने घटना की जानकारी दी। बताया कि बस गनीमत समझे कि बच गया। पार्वती ने यह सुन ईश्वर को लाख लाख धन्यवाद दिया।

प्रभा ने बताया कि चोट गहरी होने से अभी जल्दी अस्पताल से छुट्टी मिलना संभव नहीं है । दामू दादा ने कहा अब वे आ गए है सब संभाल लेंगे। विश्वास के परिवार में कोई नहीं है तो क्या। वे है तो । सब ठीक हो जाएगा।

  अब सबका अस्पताल, फ्लैट और इलाज में समय निकलने लगा। भाग दौड़ से प्रभा को थोड़ा आराम मिला। अब विश्वास के आॅफिस से मिलने आने वाले सह कर्मियों को वह ठीक प्रकार से अटेंड करने लगी। दामाद की सेवा चाकरी और फ्लैट की साज संभाल में सभी व्यस्त हो गए। दामाद के इलाज में कुछ समय ज्यादा ही लग गया। कोई 10 दिन के लगभग समय होने को हुआ तो दामू दादा को सुध आई। डाक्टरों ने दामाद को घर ले जाने को कह दिया था। जो पट्टा चढ़ाया था, उससे अब उन्हें घर पर आराम ही करना था। स्थिति कंट्रोल में आ गई थी। काम अब ऐसा कोई विशेष रह नहीं गया था। प्रभा अब सब संभाल सकती थी सो सुमित को वही छोड़ उन्होंने अपने शहर इन्दौर लौटने का मन बनाया। सुमित ने कहा कि पापा के ठीक होते ही वह टाॅम को लेने आएगा। सभी से अलविदा ले दामू दादा और पार्वती से बस पकड़ी । अब रह रह कर घर और टाॅम का विचार उन्हें आ रहा था।

  सुबह स्टेशन से उतरते ही सीधे घर जाने के बजाए दोनों से रमेशजी के यहां जाने का मन बनाया। वहीं से टाॅम को लेकर घर चलेगें। आॅटो सीधा रमेशजी के घर के निकट रूका। दोनों उतरे  और रमेशजी के यहां पहुंचे। रमेशजी की पत्नी दीक्षा ने दरवाजा खोला। आईये आईये क्या सीधे बड़ौदा से आ रहे हैं कैसे हैं अब आपके दामाद जी । दीक्षा ने पूछा । पीछे से रमेश जी भी आ गए।

अब ठीक है। एकाध महीने में काम पर जाने लगेंगे। पार्वती बोली पर दोनों की निगाहें टाॅम को ढूंढ रही थी। टाॅम नहीं दीख रहा। कहां है वह दामू दादा ने रहा न गया।

ओह साॅरी मैं तो बताना ही भूल गया। आपका टाॅम..कहते कहते रमेश जी रुक से गए। क्यों क्या हो गया टाॅम को। क्या नगर निगम वाले पकड़ कर ले गए या सड़क के कुत्तों ने उसे…

नहीं, नहीं हमारी कुछ भी खाने की इच्छा नहीं है पहले आप बताए बात क्या है पार्वती ने जिद की। दरअसल अब वह इस दुनिया में नहीं रहा। रमेशजी ने ठंडी सांस ली। 

अरे ऐसा कैसे हो गया। दामू कुछ चिढ़ से गए। आपको उसी समय बताना था।  खैर अब बताइये । वैसे वह जाने जैसा नहीं था। हम चंगा छोड़ के गए थे । दामू दादा बोले। 

आपके जाने के बाद से उसने खाना पीना सब छोड़ दिया था। हमने रोटी, दूध, बिस्किट, टोस सब कुछ दिया, क्यों दीक्षा है ना… हां हां भाई साहब, ये बिल्कुल सच कह रहे हैं, शुरू के एक दो दिन हम न खाने का कारण आपका बिछोह समझे थे। दीक्षा बोली। पर बाद के दिनों मे भी इसने जैसे खाना त्याग ही दिया। इस पर हमने पशु चिकित्सक को भी दिखाया पर उसने चेक करने के बाद बताया कि सब ठीक है… जैसे कुछ याद आया दामू दादा बोले -अरे बाप रे ध्यान आया। मैं तो आपको बताना ही भूल गया था। क्या बताना भूल गए थे दामू। अब रमेशजी जैसे चौकेें।

घर में रहने के कुछ ही दिनों में उसे भगवान को भोजन बिस्किट खाने की आदत सी पड़ गई थी। जब तक यह क्रिया नहीं होती। वह कुछ भी नहीं खाता था। क्या बात कर रहे है आप। इसका मतलब वह नियम का पक्का हो गया था। कुछ न खाने से ही दो तीन दिन पहले प्राण त्याग दिए । हम तो समझे थे कि आपके जाने से।

अनजाने में मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। दामू दादा रूआंसे से हो गए। बहुत ही अच्छा कुत्ता था। यहां किसी को परेशान नहीं किया। रमेश जी और दीक्षा एक साथ बोलें। 

काश मैं यह बात आपको बता जाता। दामू दादा ने अपने दोनों हाथों से अपना मुंह ढांप लिया। मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाउंगा।

ओह टाॅम, हो सके तो हमें माफ कर देना। पार्वती के भी सब्र का बांध टूटा। सभी की आखें सजल हो उठी । यकायक माहोल गमगीन हो गया। सुमित को यह बात कैसे बताएं दामू दादा और पार्वती यही सोचते हुए घर की ओर बोझिल कदमों से बढ़े जा रहे थे। 

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