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कथा-कहानी

शॉपिंग मॉल में अचानक पलाश और पलक दिखाई दे गए। पलक अपने चिर-परिचित अंदाज में चहकते हुए बोली, ‘हैलो, भीनी कैसी हो?’

मेरे अंदर क्रोध का लावा जमा था, वह लावा बाहर तो निकलना चाह रहा था लेकिन समय व स्थान को देखते हुए खुद पर काबू रखना पड़ा। बड़े रूखे स्वर में कहा, ‘अच्छी ही हूं’।

लेकिन पलक ने मेरी रुखाई की परवाह किए बगैर खिलखिला कर पूछा, ‘और हमारे जीजू कैसे हैं?’

पलक का इस तरह खिलखिलाना मुझे नागवार गुजरा। इस बार मैंने सख्त स्वर में कहा, ‘तुम होती कौन हो? मेरे और मेरे पति की कुशलक्षेम जानने वाली?’

मेरे इस तरह बोलने का बुरा माने बगैर वह जोशीले अंदाज में बोली, ‘तुम्हारी प्यारी सहेली।’

‘जो अपनी सहेली से झूठ बोले, उसे धोखा दे, वह सहेली, सहेली नहीं एक दुश्मन होती है।’ कहती हुई मैं तेज कदमों से आगे बढ़ गई।

‘भीनी, भीनी, प्लीज मेरी बात तो सुनो’ पलक आवाज देती रही और मैं उसे अनसुना करते हुए आगे बढ़ती गई।

एम.ए. में मैं और पलक साथ-साथ पढ़ते थे। हम दोनों में गहरी दोस्ती थी, हमारी क्लास में पलाश नाम का एक लडक़ा पढ़ता था। वह पढऩे में बेहद होशियार था और साथ ही कविताएं बहुत अच्छी लिखता था। मंच और क्लास में जब कभी कविताएं सुनाता तो सभी ‘वाह-वाह’ कह उठते। मैं भी उसकी कविताओं में अपनी सुध-बुध खो बैठती। देखने में अति साधारण था। पता नहीं उसके साधारण सौंदर्य और व्यक्तित्व में, मैंने ऐसा क्या देख लिया जो उसे मन ही मन चाहने लगी। धीरे-धीरे यही चाह प्रेम में परिवर्तित हो गई, उससे अपना प्रेम प्रकट करने का साहस मुझ में न था। अपना प्रेम प्रस्ताव पहुंचाने के लिए मैंने पलक को चुना, क्योंकि पलक और वह पास के एक ही कस्बे के थे और यहां शहर में कॉलिज में पढ़ रहे थे। पलाश कमरा लेकर रह रहा था और पलक अपनी मौसी के यहां रहती थी। यह बात स्वयं मुझे पलक ने बताई थी।

जब मैंने पलक से कहा कि मेरे दिल का हाल पलाश तक पहुंचा दो तो वह मुझे छेड़ते हुए बोली, ‘जानेमन, कबूतरी बनकर मैं तुम्हारी चिट्ठी तुम्हारे आशिक तक नहीं पहुंचाऊंगी, तुम खुद ही उससे मिलकर अपने दिल का हाल बयां करो। भई, यह इश्क का मामला है, मैं क्यों बनूं कबाब में हड्डी?’

लेकिन मेरे बहुत जोर देने पर वह मान गई। दूसरे दिन उसने कहा कि, पलाश को उसने सब कुछ बता दिया है।

कॉलेज में, मैं पलाश की प्रत्येक गतिविधि देखती रही। लेकिन उसकी तरफ से कोई ऐसा संकेत नहीं मिला जिससे मुझे लगे कि वह मुझे चाहता है। मैंने फिर पलक से कहा तो वह बोली, ‘मैंने पलाश को बता दिया है, हो सकता है वह झिझक रहा हो।’

मैंने पलाश से खुद मिलने का निर्णय लिया। इस विषय में पलक को भी कुछ नहीं बताया। उसके एक मित्र से उसके कमरे का पता लेकर मैं वहां पहुंच गई। मुझे देखकर वह चौक गया और बोला, ‘भीनी, तुम यहां कैसे? क्या कोई काम था? कॉलिज में ही बता देती।’

‘पलाश, पलक ने तुम्हें सब कुछ तो बता दिया है। मैं तुम्हारा जवाब जानना चाहती हूं।’ कहते हुए मेरी पलकें लाज से झुक गई।

‘पलक ने मुझे क्या बता दिया है? पिछले 2-3 दिनों से तो उससे मेरी कोई बात ही नहीं हुई’ वह आश्चर्य भाव से बोला।

‘पलक ने तुम्हें कुछ नहीं बताया, तुम सच बोल रहे हो?’

‘भला मैं क्यों झूठ बोलूंगा।’

मैं चुप रही। सोचा, पहले पलक का मन जान लूं। पलाश से ‘फिर बताऊंगी’ कहकर मैं वहां से चली आई।

दूसरे दिन कॉलिज में पलक मिली, मैंने उसका मन जानने के लिए आग्रह भरे स्वर में कहा, ‘प्लीज, पलक पलाश से एक बार और बोल दो, रियली, मैं उसे बेहद प्यार करती हूं।’

पलक मुझे समझाते हुए बोली, ‘भीनी मैंने उसे सब कुछ बता दिया है। वैसे तुम मेरी सलाह मानो, इन चक्करों में न पडक़र सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाओ।’

उसकी बात सुनकर मुझे पक्का यकीन हो गया कि इसने मेरी बात पलाश तक नहीं पहुंचाई है, इसलिए मैंने सोचा खुद पलाश के यहां जाकर उसे अपनी चाहत के विषय में बता दूंगी।

अगले दिन उसके कमरे पर गई तो वहां ताला पड़ा था। मैंने कॉलेज में ही बात करने का निर्णय लिया। अगले रोज मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि पलक और पलाश दोनों ही कॉलेज नहीं आए। फिर 4-5 दिन लगातार जब दोनों कॉलेज नहीं आए तो मैं पलक की मौसी के घर गई। वहां मुझे उसके मौसा-मौसी भी नहीं मिले, उनके किरायेदार ने बताया कि वह लोग पलक को लेकर उसकेघर गए हैं, जहां उसकी शादी है। मुझे हैरानी हुई कि पलक ने अपनी शादी की बात मुझसे क्यों छिपाई? मैंने उनसे पूछा, ‘क्या आप बता सकते हैं कि पलक की शादी कब है?’

‘हां-हां क्यों नहीं?’ कहते हुए वह एक शादी का कार्ड ले आए। कार्ड पर पलक के साथ पलाश का नाम पढक़र मेरे होश उड़ गए और मैं एक हारे हुए जुआरी की तरह वहां से लौट आई, तभी से मेरे मन में पलक के प्रति नफरत हो गई।

करीब 15 दिनों बाद पलक और पलाश कॉलेज आए पति-पत्नी के रूप में। मैंने उन दोनों से बोलना छोड़ दिया। पलक ने मुझसे बात करने की कोशिश की, लेकिन मैंने उससे कभी बात नहीं की। परीक्षाएं हो जाने के बाद हम सभी बिछड़ गए और इस दौरान मेरी भी शादी जय से हो गई। आज फिर लगभग एक माह बाद मॉल में उन दोनों से मिलना हो गया।

तेज-तेज चलने के कारण मेरी सांस फूलने लगी। सुस्ताने के लिए मैं एक बेंच पर बैठ गई। सामने से पलाश आ गया। उसे देखकर, उठकर जाने लगी तो वह कातर स्वर में बोला, ‘प्लीज भीनी, तुम्हें मेरी कसम, मेरी बात सुने बगैर तुम यहां से जाना नहीं। आज तुम्हें मेरी बात सुननी ही पड़ेगी। भीनी, पलक तुम्हें बहुत प्यार करती है, लेकिन तुम इस तरह रूखा व्यवहार करके उसे दुख पहुंचा रही हो।’

यह सुनकर मेरे क्रोध का ज्वालामुखी फूट गया। जमा लावा शब्दों के रूप में बहने लगा, ‘दुख, उसे दुख मैं पहुंचा रही हूं। दुख तो उसने मुझे पहुंचाया है, मुझसे झूठ बोलकर, मुझे धोखा देकर, पलाश प्यार तुमसे मैं करती थी और अपना प्रेम प्रस्ताव तुम तक पहुंचाने के लिए मैंने उससे कहा था, लेकिन उसने मेरे साथ दगा किया, तुम्हें मेरी बात पहुंचाने की बजाय खुद तुमसे इश्क कर शादी तक रचा बैठी। यह धोखा नहीं तो और क्या है? तुम जवाब दो मुझे’ मैं क्रोध से भरपूर स्वर में बोली।

‘भीनी, झूठ पलक ने नहीं, मैंने बोला था। सच तो यह है कि तुम्हारी हर बात पलक ने मुझे बता दी थी, उसके पिता और मेरे पिता आपस में बहुत गहरे दोस्त हैं, उन दोनों ने बचपन में ही हमारी शादी तय कर दी थी। यह हम दोनों को पता था। इस वजह से हम दोनों एक-दूसरे से बेहद प्रेम करते थे। हमारी सगाई भी एक वर्ष पहले हो चुकी थी और शादी मेरी जॉब मिल जाने के बाद होगी, ऐसा पहले ही तय हो चुका था। प्रेम, सगाई और शादी की गोपनीयता हमें रखनी थी, यह हम दोनों का निर्णय था, लेकिन जब पलक ने मुझे बताया कि तुम मुझसे मन ही मन प्रेम करने लगी हो तो मैंने उससे कहा कि वह तुम्हें सच्चाई से अवगत करा दे लेकिन पलक इसके लिए राजी नहीं हुई, उल्टे वह मुझे जोर देते हुए बोली, ‘यह सगाई तोड़ दो पलाश, भीनी मेरी बहुत अच्छी और प्यारी सहेली है, मैं उसे खुश देखना चाहती हूं।’

‘तुम पागल हो गई हो पलक? यह नहीं हो सकता।’ फिर पलक ने धमकी देते हुए कहा, ‘यह सगाई मैं ही तोड़ देती हूं।’

उसकी इस धमकी को सुनकर मैंने कहा, ‘अगर तुम्हारी यही मर्जी है कि मैं भीनी से शादी कर लूं, तो मैं उससे शादी तो कर लूंगा लेकिन उसे पत्नी का दर्जा कभी नहीं दूंगा।’

यह सुनकर वह रोने लगी और बोली, ‘अब ना तुम मुझसे शादी करोगे ना भीनी से, तुम्हें किसी और से शादी करनी पड़ेगी।’

मैं धर्मसंकट में फंस गया। मैंने सारी बातें उसके माता-पिता को बता दी। उन्होंने मेरे माता-पिता से मिलकर पलक को बताए बगैर हमारी शादी की तिथि निश्चित कर दी, उसे बहाने से घर ले आए। उसके माता-पिता ने अपनी सौगंध देकर उसे राजी कर लिया और हम दोनों का बहुत ही साधारण तरीकेसे विवाह हो गया। इस तरह विवाह करने से वह बेहद दुखी हो गई।’

पलाश भावुक स्वर में बोला, ‘भीनी, शायद तुम नहीं जानती कि पलक तुम्हें कितना प्यार करती है, इस तरह विवाह हो जाने के बाद वह खुद को तुम्हारा गुनहगार समझती है और उसने मुझे एक सजा दे रखी है जिसे मैं आज तक भुगत रहा हूं।’

मैं चौंक कर बोली, ‘सजा? कैसी सजा पलाश?’

शादी के बाद आज तक उसने मुझे अपना स्पर्श तक नहीं करने दिया है। उसका कहना है कि जब तक भीनी उसे क्षमा नहीं कर देगी, तब तक वह मुझे अपना पति स्वीकार नहीं करेगी। प्लीज भीनी तुम पलक और मुझे क्षमा कर दो, जिससे मैं इस कठोर सजा से मुक्त हो जाऊं।’ पलाश निवेदन करते हुए बोला।

जब तक पलक भी आ चुकी थी। धीरे से पास आकर रुंधे स्वर में बोली, ‘सॉरी भीनी, वास्तव में मैं तुम्हें दुख नहीं पहुंचाना चाहती, प्लीज मुझे माफ कर दो।’

मैं उसका कान खींचते हुए बोली, ‘सॉरी की बच्ची, तू दुख मुझे नहीं मेरे प्यारे जीजू को पहुंचा रही है।’ फिर उसे पलाश की तरफ धकेलते हुए शरारती अंदाज में बोली, ‘चल इनको सॉरी बोल, आज ही इन्हें अपनी कठोर सजा से मुक्त कर देना… वरना तेरी खैर नहीं, समझी।’

‘ठीक है, ठीक है बाबा, कान तो छोड़,

बहुत दर्द हो रहा है।’ वह मुस्कराते हुए बोली, ‘और तू मेरे जीजू को लेकर घर कब आ रही है?’

‘कल ही आऊंगी, लेकिन जब तक तू…’

मेरी बात का अर्थ समझ शरमा कर वह मुझसे लिपट गई।

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