उसके घर का पता और कोई फोन नम्बर भी नहीं मिला लेकिन एक डायरी मिली जिसमें आपका फोन नम्बर मिला है, साथ ही यह भी पता चला कि आप दोनों एक दूसरे से बेहद मोहब्बत करते हैं.।इसलिये प्लीज, आप यहाँ आकर उसे बचा लीजिये वह गहरे डिप्रेशन में है मुझे डर है कहीं वह दोबारा…।मुझे यकीन है आपका प्यार उसे जीने का हौसला देगा।हमारा पता….
मैसेज पढ़कर होश उड़ गये शाश्वत के। नहीं… विभु नहीं, तुम ऐसा नहीं कर सकतीं… मैं तुम्हें ऐसा करने नहीं दूँगा। मैं आ रहा हूँ तुम्हारे पास। खुद ही बुदबुदा उठा शाश्वत।
मुंबई जाने की तैयारी करते देख उसके साथी सचिन ने कहा, “शाश्वत तुम मुंबई जा रहे हो? हमें तो अगले हफ्ते आगरा जाना है। वहाँ ताज महोत्सव के अंतर्गत होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम की शृंखला में होने वाले अपने नाटक का मंचन करना है।”
“मुझे मालूम है सचिन लेकिन इस वक्त मेरा मुंबई जाना बेहद जरूरी है” । कहकर शाश्वत प्लेन द्वारा मुंबई के लिये रवाना हो गया । प्लेन में बैठते ही विभावरी के साथ बिताया गया 5 वर्ष पुराना अतीत उसकी आँखों के सामने सजीव हो उठा।
शाश्वत और विभावरी कॉलेज में हिंदी से एम.ए साथ -साथ कर रहे थे ।शाश्वत को साहित्य और नाटकों में बेहद रुचि थी तो विभावरी को फिल्मों में काम करने की दिली ख्वाहिश थी। कॉलेज के वार्षिक समारोह में “सलीम अनारकली” नाटक का मंचन किया गया जिसमें सलीम का किरदार शाश्वत ने निभाया और अनारकली का विभावरी ने। इस नाटक के दौरान ही दोनों के ह्रदय में एक दूसरे के प्रति प्रेम पुष्प पल्लवित हो गये इसके बाद दोनों ने एक साथ कई नाटकों में काम किया।
एम.ए (द्वितीय वर्ष) की परीक्षाओं के मात्र एक माह पूर्व विभावरी ने चहकते हुए शाश्वत से कहा, “शाश्वत, आज मैं बहुत खुश हूँ मैंने जिस विज्ञापन कम्पनी के लिये बतौर मॉडल के लिये अपना बायोडाटा फोटो सहित भेजा था उसे कम्पनी ने एक्सेप्ट कर लिया है मुझे शीघ्र ही मुंबई बुलाया है।”
“तुम पागल हो गयी हो विभु? नाटकों में इतना सजीव अभिनय करती हो और मात्र पैसे और पब्लिसिटी के लिये तुम मॉडल बनकर अपने शरीर का प्रदर्शन करना चाहती हो?”
“शाश्वत, मैं मॉडलिंग को अपना कैरियर नहीं बनाना चाहती लेकिन इसके जरिये मेरी फिल्मों में पहुँचने की राह आसान हो जायेगी।”
“इतना आसान नहीं है फिल्मों में काम मिलना विभु, बहुत संघर्ष करने पड़ते हैं बहुत कुछ खोना पड़ता है तमाम ऐसे समझौते करने पड़ते हैं और शर्तें माननी पड़ती हैं जिन्हें हमारा जमीर इजाजत नहीं देता।”
“मैं फिल्मों में काम पाने के लिये कुछ भी करने को तैयार हूँ क्योंकि फिल्मों में काम करना मेरा सपना है मेरी बात मानो तो तुम भी फिल्मों में ट्राई करो।”
“नहीं विभु, मैं नाटक नहीं छोड़ सकता इसमें आत्मा बसती है मेरी।”
“लेकिन मुझे छोड़ सकते हो शाश्वत, नाटक और साहित्य से तुम कभी भी वह शोहरत और दौलत हासिल नहीं कर सकते जो फिल्मों में मिलती है फिल्मी सितारों का नाम बच्चा तक जानता है लेकिन रंगकर्मी को कोई जानता तक नहीं।”
फिल्मों में अपना भाग्य आजमाने विभावरी मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया में खो गयी और शाश्वत तुलसी के अध्यात्म, कबीर के चिंतन, सूर की भक्ति, घनानंद के विरह और मीरा की पीर में डूब गया साथ ही नाटकों में भी जीता रहा विभावरी से सच्चा प्रेम किया था इसलिये शादी करने का मन भी नहीं हुआ।
प्लेन मुंबई पहुंच गया था वह टैक्सी करके निशा के दिये पते पर पहुंच गया फ्लैट का दरवाजा विभावरी ने ही खोला बड़ी हताश और बीमार लग रही थी। आश्चर्य से काँपते हुये स्वर में बोली, “शाश्वत, तुम यहाँ? पता कहाँ से मिला?”
“सब बता दूंगा पहले अंदर तो आने दो।”
विभावरी उसे अंदर ले गयी। विभु , निशा के व्हाट्सएप मैसेज से मुझे सब कुछ पता चला। फिर उसके कंधे पर हाथ रखकर प्यार से बोला, “अपनी जान देने की कोशिश करते वक्त मेरा जरा भी ख्याल नहीं आया तुम्हें?” अचानक भावुक हो उठा शाश्वत।
” शाश्वत, मुझे माफ कर दो मैं जीना ही नहीं चाहती।”
“आखिर क्यों?”
“शाश्वत मुंबई सपनों का शहर है क्योंकि यहाँ लोगों के सपने पूरे होते हैं हर कोई यहाँ अपना कोई न कोई सपना लेकर आता है मैं भी फिल्मों काम पाने के लिये खूबसूरत सा सपना आँखों में सँजो कर यहाँ आयी थी उस सपने को पूरा करने के लिये मैंनें अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया तब भी मेरा सपना साकार ना हो सका” फफक पड़ी विभावरी।
“तो क्या तुम्हारे जान देने से वह सपना साकार हो जायेगा?”
“कम से कम उस जिल्लत से तो मुक्ति मिल जायेगी जिसकी वजह से मैं हर पल हजारों बार ऐसी भयानक मौत मरती हूँ जिसकी कभी कल्पना भी नहीं करी थी मैंनें।
“विभु, तुमने नीरज जी की यह कविता नहीं सुनी क्या?”
चुप चुप आँसू बहाने वालों,
मोती व्यर्थ लुटाने वालों,
कुछ सपनों के मर जाने से,
जीवन नहीं मरा करता।
खामोश रही विभावरी। प्यार से उसके चेहरे को हथेलियों में थामकर शाश्वत बोला, “अपने नाम का अर्थ जानती हो नहीं जानती हो ना? …मैं बताता हूँ… विभावरी का अर्थ है तारों भरी रात.. तो फिर तुम कैसे अंधकार की बात सोचने लगीं अंधकार तो निराशा का प्रतीक है और विभावरी नई आशा, नई सुबह और एक नये जीवन का और जीवन एक चुनौती है सामना कीजिये… जीवन एक संगीत है आनंद लीजिये… जीवन एक खूबसूरत सपना है महसूस कीजिये… जीवन एक संघर्ष है …”बस बस जीवन का दूसरा नाम शाश्वत है समझ लीजिये” कहते हुये उसके मुँह पर हाथ रखकर मुस्करा पड़ी विभावरी।
वास्तव में इस निश्चल मुस्कान में विभावरी के वास्तविक स्वरूप को महसूस किया शाश्वत ने उसे बाहों में भरकर प्यार से बोला, “विभु, वायदा करो अब तुम जीवन में कभी ऐसा खतरनाक कदम नहीं उठाओगी। और हाँ, तुम्हें मेरे साथ आगरा चलना होगा वहाँ नाट्य समारोह में आयोजित “जीवन नहीं मरा करता” नाटक में मेरे साथ काम करना होगा।”
शाश्वत के हाथों को मजबूती से थामकर वह बोली, “मैं वायदा करती हूँ कि जीवन में दोबारा कभी ऐसी वाहियात हरकत नहीं करूँगी चलूँगी मैं तुम्हारे साथ आगरा। “जीवन नहीं मरा करता” में अपने अभिनय को इतना जीवंत कर दूँगी कि थियेटर से निकलते हर दर्शक के होठों पर दृढ़ता से यही शब्द होंगे जीवन नहीं मरा करता और सच्चा प्रेम अमर होता है कहते हुये शाश्वत ने विभावरी को सीने से लगा लिया।
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