बारात विदा हो गयी थी। मेहमान भी रुख़सत हो गये थे। रात के नौ बज गये थे। विवाह के बाद की नींद मशहूर है। घर के सभी लोग सरेशाम से सो रहे थे। कोई चारपाई पर, कोई तख्त पर, कोई ज़मीन पर, जिसे जहाँ जगह मिल गयी, वहीं सो रहा था। केवल मानी घर की देख-भाल कर रही थी और ऊपर गोकुल अपने कमरे में बैठा हुआ समाचार पढ़ रहा था।
सहसा गोकुल ने पुकारा- मानी, एक गिलास ठंडा पानी तो लाना, बड़ी प्यास लगी है।
मानी पानी लेकर ऊपर गयी और मेज़ पर पानी रखकर लौटना ही चाहती थी कि गोकुल ने कहा-ज़रा ठहरो मानी, तुमसे कुछ कहना है।
मानी ने कहा-अभी फुरसत नहीं है भाई; सारा घर सो रहा है। कहीं कोई घुस आये तो लोटा-थाली भी न बचे!
गोकुल ने कहा-घुस आने दो, मैं तो तुम्हारी जगह होता, तो चोरों से मिलकर चोरी करवा देता। मुझे इसी वक्त इन्द्रनाथ से मिलना है। मैंने उससे आज मिलने का वचन दिया है। देखो संकोच मत करना, जो बात पूछ रहा हूँ, उसका जल्द उत्तर देना। देर होगी तो वह घबराएगा। इन्द्रनाथ को तुमसे प्रेम है, यह तुम जानती हो न?
मानी ने मुँह फेरकर कहा-यही बात कहने के लिए मुझे बुलाया था? मैं कुछ नहीं जानती।
गोकुल-खैर, यह वह जाने और तुम जानो। वह तुमसे विवाह करना चाहता है। वैदिक रीति से विवाह होगा। तुम्हें स्वीकार है?
मानी की गर्दन शर्म से झुक गयी। वह कुछ जवाब न दे सकी।
गोकुल ने फिर कहा- दादा और अम्माँ से यह बात नहीं कही गयी, इसका कारण तुम जानती ही हो। वह तुम्हें घुड़कियाँ दे-देकर, जला-जलाकर चाहे मार डालें; पर विवाह करने की सम्मति कभी न देंगे। इससे उनकी नाक कट जाएगी। इसलिए अब इसका निर्णय तुम्हारे ही ऊपर है। मैं समझता हूँ, तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। इन्द्रनाथ तुमसे प्रेम तो करता ही है, यों भी निष्कलंक चरित्र का आदमी और बला का दिलेर है। भय तो उसे छू ही नहीं गया। तुम्हें सुखी देखकर मुझे सच्चा आनन्द होगा।
मानी के हृदय में एक वेग उठ रहा था; मगर मुँह से आवाज़ न निकली।
गोकुल ने अबकी खीझकर कहा-देखो मानी यह चुप रहने का समय नहीं है। सोचती क्या हो?
मानी ने काँपते हुए स्वर में कहा-हाँ।
गोकुल के हृदय का बोझ हलका हो गया। मुस्कराने लगा। मानी शर्म के मारे वहाँ से भाग गयी।
शाम को गोकुल ने अपनी माँ से कहा-अम्माँ, इन्द्रनाथ के घर आज कोई उत्सव है। उसकी माता अकेली घबरा रही थी कि कैसे सब काम होगा? मैंने कहा, मैं मानी को भेज दूँगा। तुम्हारी आज्ञा हो, तो मैं मानी को पहुँचा दूँगा। कल-परसों तक चली आएगी।
मानी उस वक्त वहाँ आ गयी; गोकुल ने उसकी ओर कनखियों से ताका। मानी लज्जा से गड़ गयी। भागने का रास्ता न मिला।
माँ ने कहा-मुझसे क्या पूछते हो, वह जाये तो ले जाओ!
गोकुल ने मानी से कहा-कपड़े पहनकर तैयार हो जाओ तुम्हें इन्द्रनाथ के घर चलना है।
मानी ने आपत्ति की-मेरा जी अच्छा नहीं है, मैं न जाऊँगी।
गोकुल की माँ ने कहा-चली क्यों नहीं जाती, क्या वहाँ कोई पहाड़ खोदना है?
मानी एक सफ़ेद साड़ी पहनकर ताँगे पर बैठी, तो उसका हृदय काँप रहा था और बार-बार आँखों में आँसू भर आते थे। उसका हृदय बैठा जाता था, मानो नदी में डूबने जा रही हो।
ताँगा कुछ दूर निकल गया तो उसने गोकुल से कहा-भैया, मेरा जी न जाने कैसा हो रहा है। घर लौट चलो, तुम्हारे पैर पड़ती हूँ।
गोकुल ने कहा-तू पागल है। वहाँ सब लोग तेरी राह देख रहे हैं और तू कहती है लौट चलो।
मानी-मेरा मन कहता है, कोई अनिष्ट होनेवाला है।
गोकुल-और मेरा मन कहता है तू रानी बनने जा रही है।
मानी-दस-पाँच दिन ठहर क्यों नहीं जाते? कह देना, मानी बीमार है।
गोकुल-पागलों की-सी बातें न करो।
मानी-लोग कितना हँसेंगे!
गोकुल-मैं शुभ कार्य में किसी की हँसी की परवाह नहीं करता।
मानी-अम्माँ तुम्हें घर में घुसने न देंगी। मेरे कारण तुम्हें भी झिड़कियाँ मिलेंगी।
गोकुल-इसकी कोई परवाह नहीं है। उनकी तो यह आदत ही है।
ताँगा पहुँच गया। इन्द्रनाथ की माता विचारशील महिला थीं। उन्होंने आकर वधू को उतारा और भीतर ले गयी।
