dhikkaar by munshi premchand
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गोकुल यहाँ से घर चला तो ग्यारह बज रहे थे। एक ओर तो शुभ कार्य के पूरा करने का आनंद था, दूसरी ओर भय था कि कल मानी न जाएगी, तो लोगों को क्या जवाब दूँगा। उसने निश्चय किया, चलकर सब साफ़-साफ़ कह दूँ। छिपाना व्यर्थ है। आज नहीं कल, कल नहीं परसों तो सब-कुछ कहना ही पड़ेगा। आज ही क्यों न कह दूँ?

यह निश्चय करके वह घर में दाख़िल हुआ।

माता ने किवाड़ खोलते हुए कहा-इतनी रात तक क्या करने लगे? उसे भी क्यों न लेते आये? कल सवेरे चौका-बर्तन कौन करेगा?

गोकुल ने सिर झुकाकर कहा-वह तो अब शायद लौटकर न आये अम्माँ! उसके वही रहने का प्रबंध हो गया है।

माता ने आँखें फाड़कर कहा-क्या चाहता है? भला वहाँ वह कैसे रहेगी?

गोकुल-इन्द्रनाथ से उसका विवाह हो गया।

माता मानो आकाश से गिर पड़ीं। उन्हें कुछ सुध न रही कि मेरे मुँह से क्या निकल रहा है, कुलांगार, भड़वा, हरामज़ादा, और न जाने क्या-क्या कहा। यहाँ तक कि गोकुल का धैर्य चरम सीमा का उल्लंघन कर गया। उसका मुँह लाल हो गया, त्योरियाँ चढ़ गयीं। बोला-अम्माँ, बस करो, अब मुझमें इससे ज़्यादा सुनने की सामर्थ्य नहीं है। अगर मैंने कोई अनुचित कर्म किया होता, तो आपकी जूतियाँ खाकर भी सिर न उठाता; मगर मैंने कोई अनुचित कर्म नहीं किया। मैंने वही किया, जो ऐसी दशा में मेरा कर्तव्य था और जो हर एक भले आदमी को करना चाहिए! तुम मूर्ख हो, तुम्हें कुछ नहीं मालूम कि समय की क्या प्रगति है। इसीलिए अब तक मैंने धैर्य के साथ तुम्हारी गालियाँ सुनीं। तुमने, और मुझे दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि पिताजी ने भी, मानी के जीवन को नारकीय बना रक्खा था। तुमने उसे ऐसी-ऐसी ताड़नाएँ दीं, जो कोई अपने शत्रु को भी न देगा। इसीलिए न कि वह तुम्हारी आश्रित थी? इसी लिए न कि वह अनाथिनी थी? अब वह तुम्हारी गालियाँ खाने न आवेगी। जिस दिन तुम्हारे घर विवाह का उत्सव हो रहा था, तुम्हारे ही एक कठोर वाक्य से आहत होकर वह आत्महत्या करने जा रही थी। इन्द्रनाथ उस समय ऊपर न पहुँच जाते तो आज हम, तुम-सारा घर हवालात में बैठा होता।

माता ने आँखें मटकाकर कहा-आहा! कितने सपूत बेटे हो तुम, कि सारे घर को संकट से बचा लिया। क्यों न हो? अभी बहन की बारी है। कुछ दिन में मुझे ले जाकर किसी के गले बाँध आना। फिर तुम्हारी चाँदी हो जाएगी। यह रोज़गार सबसे अच्छा है। पढ़-लिखकर क्या करोगे?

गोकुल मर्म-वेदना से तिलमिला उठा। व्यथित कंठ से बोला-ईश्वर न करे कि कोई बालक तुम जैसी माता के गर्भ से जन्म ले। तुम्हारा मुँह देखना भी पाप है।

यह कहता हुआ वह घर से निकल पड़ा और उन्मत्तों की तरह एक तरफ़ चल खड़ा हुआ। ज़ोर के झोंके चल रहे थे; पर उसे ऐसा मालूम हो रहा था कि साँस लेने के लिए हवा नहीं है।

एक सप्ताह बीत गया; पर गोकुल का कहीं पता नहीं। इन्द्रनाथ को बम्बई में एक जगह मिल गयी थी। वह वहाँ चला गया था। वहाँ रहने का प्रबंध करके वह अपनी माता को तार देगा और तब सास और बहू वहाँ चली जाएँगी! वंशीधर को पहले संदेह हुआ कि गोकुल इन्द्रनाथ के घर छिपा होगा, पर वहाँ पता न चला तो उन्होंने सारे शहर में खोज-पूछ शुरू की। जितने मिलनेवाले, मित्र, स्नेही, सम्बन्धी थे, सभी के घर गये, पर सब जगह से साफ़ जवाब पाया। दिन-भर दौड़धूप कर शाम को घर आते, तो स्त्री को आड़े हाथों लेते-और कोसो लड़के को, पानी पी पीकर कोसो। न जाने तुम्हें कभी बुद्धि आएगी या नहीं। गयी थी चुड़ैल, जाने देती। एक बोझ सिर से टला। एक महरी रख लो, काम चल जाएगा। जब वह न थी, तो घर क्या भूखों मरता था? विधवाओं के पुनर्विवाह चारों ओर तो हो रहे हैं, यह कोई अनहोनी बात नहीं है। हमारे वश की बात होती, तो इन विधवा-विवाह के पक्षपातियों को देश से निकाल देते, शाप देकर जला देते; लेकिन यह हमारे वश की बात नहीं। फिर तुमसे इतना भी न हो सका कि मुझसे तो पूछ लेतीं। मैं जो उचित समझता, करता। क्या तुमने यह समझा था, मैं दफ़्तर से लौटकर आऊँगा ही नहीं, वहीं अंत्येष्टि हो जाएगी। बस, लड़के पर टूट पड़ीं। अब रोओ, ख़ूब दिल खोलकर।

संध्या हो गयी थी। वंशीधर स्त्री को फटकारें सुनाकर द्वार पर उद्वेग की दशा में टहल रहे थे। रह-रहकर मानी पर क्रोध आता था। इसी राक्षसी के कारण मेरे घर का सर्वनाश हुआ। न जाने किस बुरी साइत में आयी कि घर को मिटाकर छोड़ा! वह न आयी होती, तो आज क्यों यह बुरे दिन देखने पड़ते! कितना होनहार, कितना प्रतिभाशाली लड़का था। न जाने कहाँ गया?

एकाएक एक बुढ़िया उनके समीप आयी और बोली-बाबू साहब, यह ख़त लायी हूँ, ले लीजिए।

वंशीधर ने लपककर बुढ़िया के हाथ से पत्र ले लिया; उनकी छाती आशा से धक्-धक् करने लगी। गोकुल ने शायद यह पत्र लिखा होगा। अँधेरे में कुछ न सूझा। पूछा-कहाँ से लायी है?

बुढ़िया ने कहा-वह जो बाबू हुसेनगंज में रहते हैं, जो बम्बई नौकर हैं, उन्हीं की बहू ने भेजा है।

वंशीधर ने कमरे में जाकर लैम्प जलाया और पत्र पढ़ने लगे। मानी का खत था लिखा था-

‘पूज्य चाचाजी, अभागिनी का प्रणाम स्वीकार कीजिए।’

मुझे यह सुनकर अत्यन्त दु:ख हुआ कि गोकुल भैया कहीं चले गये और अब तक उनका पता नहीं है। मैं ही इसका कारण हूँ। यह कलंक मेरे ही मुख पर लगना था, वह भी लग गया। मेरे कारण आपको इतना शोक हुआ, इसका मुझे दु:ख है; मगर भैया आएँगे अवश्य, इसका मुझे विश्वास है। मैं भी नौ बजे वाली गाड़ी से बम्बई जा रही हूँ। मुझसे जो कुछ अपराध हुआ है, उसे क्षमा कीजिएगा और चाची से मेरा प्रणाम कहिएगा। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि गोकुल भैया सकुशल घर लौट आएँ। ईश्वर की इच्छा हुई तो भैया के विवाह में आपके चरणों के दर्शन करूँगी।’

वंशीधर ने पत्र को फाड़कर पुर्ज़े-पुर्ज़े कर डाला। घड़ी में देखा तो आठ बज रहे थे। तुरन्त कपड़े पहने, सड़क पर आकर इक्का किया और स्टेशन चले।

बम्बई मेल प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। मुसाफ़िरों में भगदड़ मची हुई थी। खोमचे वालों की चीख-पुकार से कान में पड़ी आवाज़ न सुनाई देती थी। गाड़ी छूटने में थोड़ी ही देर थी। मानी और उसकी सास एक जनाने डिब्बे में बैठी हुई थीं। मानी सजल नेत्रों से सामने ताक रही थी। अतीत चाहे दु:खद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं। मानी आज उन बुरे दिनों को स्मरण करके सुखी हो रही थी। गोकुल से अब न जाने कब भेंट होगी। चाचाजी आ जाते तो उनके दर्शन कर लेती। कभी-कभी बिगड़ते थे तो क्या, उसके भले ही के लिए तो डाँटते थे! वह आएँगे नहीं, अब तो गाड़ी छूटने में थोड़ी ही देर है। कैसे आएँ, समाज में हलचल न मच जाएगी। भगवान् की इच्छा होगी, तो अबकी जब यहाँ आऊँगी, तो ज़रूर उनके दर्शन करूँगी।

एकाएक उसने लाला वंशीधर को आते देखा। वह गाड़ी से निकलर बाहर खड़ी हो गयी और चाचाजी की ओर बढ़ी। उनके चरणों पर गिरना चाहती थी कि वह पीछे हट गये और आँखें निकालकर बोले-मुझे मत छू, दूर रह, अभागिनी कहीं की! मुँह में कालिख लगाकर मुझे पत्र लिखती है। तुझे मौत नहीं आयी! तूने मेरे कुल का सर्वनाश कर दिया। आज तक गोकुल का पता नहीं है। तेरे कारण वह घर से निकला और तू अभी तक मेरी छाती पर मूँग दलने को बैठी है। तेरे लिए क्या गंगा में पानी नहीं है? मैं तुझे ऐसी कुलटा, ऐसी हरजाई समझता, तो पहले दिन तेरा गला घोंट देता। अब मुझे अपनी भक्ति दिखलाने चली है? तेरे जैसी पापिष्ठाओं का मरना ही अच्छा है; पृथ्वी का बोझ कम हो जाएगा?

प्लेटाफॉर्म पर सैकड़ों आदमियों की भीड़ लग गयी थी और वंशीधर निर्लज्ज भाव से गालियों की बौछार कर रहे थे। किसी की समझ में न आता था, क्या माज़रा है; पर मन में सब लाला को धिक्कार रहे थे।