एक सप्ताह गुजर गया था। लाला वंशीधर दफ़्तर से आकर द्वार पर बैठे ही थे कि इन्द्रनाथ ने आकर प्रणाम किया। वंशीधर उसे देखकर चौंक पड़े, उसके अनपेक्षित आगमन पर नहीं, उसकी विकृत दशा पर; मानो वीतराग शोक सामने खड़ा हो, मानो कोई हृदय से निकली हुई आह मूर्तिमान हो गयी हो।
वंशीधर ने पूछा-तुम तो बम्बई चले गये थे न?
इन्द्रनाथ ने जवाब दिया-जी हाँ, आज ही आया हूँ।
वंशीधर ने तीखे स्वर में कहा-गोकुल को तो तुम ले बीते!
इंद्र ने अपनी अँगूठी की ओर ताकते हुए कहा-वह मेरे घर पर है।
वंशीधर के उदास मुख पर हर्ष का प्रकाश दौड़ गया। बोले-तो यहाँ क्यों नहीं आये? तुमसे कहाँ उसकी भेंट हुई? क्या बंबई चला गया था?
‘जी नहीं, कल मैं गाड़ी से उतरा तो स्टेशन पर मिल गये।’
‘तो जाकर लिवा आओ न, जो किया अच्छा किया।’
यह कहते हुए वह घर में दौड़े। एक क्षण में गोकुल की माता ने उसे अंदर बुलाया।
वह अंदर गया तो माता ने उसे सिर से पाँव तक देखा-तुम बीमार थे क्या भैया? चेहरा क्यों इतना उतरा हुआ है?
इन्द्रनाथ ने कुछ उत्तर न दिया?
गोकुल की माता ने लोटे का पानी रखकर कहा-हाय-मुँह धो डालो बेटा! गोकुल है तो अच्छी तरह? कहाँ रहा इतने दिन? तब से सैकड़ों मन्नतें मान डाली। आया क्यों नहीं।
‘और था कहाँ इतने दिन?’
‘कहते थे, देहातों में घूमता रहा।’
‘तो क्या तुम अकेले बम्बई से आये हो?’
‘जी नहीं, अम्माँ भी आयी हैं।’
‘गोकुल की माता ने कुछ सकुचाकर पूछा-मानी तो अच्छी तरह है?’
इन्द्रनाथ ने हँसकर कहा-जी हाँ, अब वह बड़े सुख से है। संसार के बंधनों से छूट गयी।
माता ने अविश्वास करके कहा-चल, नटखट कहीं का! बेचारी को कोस रहा है; मगर जल्दी बम्बई से लौट क्यों आये?
इन्द्रनाथ ने मुस्कराते हुए कहा-क्या करता! माताजी का तार बम्बई में मिला कि मानी ने गाड़ी से कूदकर प्राण दे दिये। वह लालपुर में पड़ी हुई थीं, दौड़ा हुआ आया। वही दाह-क्रिया की। आज घर चला आया। अब मेरा अपराध क्षमा कीजिए।
वह और कुछ न कह सका। आँसुओं के वेग ने गला बंद कर दिया। जेब से एक पत्र निकालकर माता के सामने रखता हुए बोला-उसके संदूक में यही पत्र मिला है।
गोकुल की माता कई मिनट तक मर्माहत-सी बैठी ज़मीन की ओर ताकती रही। शोक और उससे अधिक पश्चात्ताप ने सिर को दबा रक्खा था। फिर पत्र उठाकर पढ़ने लगी‒
‘स्वामी’
जब यह पत्र आपके हाथों में पहुँचेगा, तब तक मैं इस संसार से विदा हो जाऊँगी। मैं बड़ी अभागिनी हूँ। मेरे लिए इस संसार में स्थान नहीं है। आपको भी मेरे कारण क्लेश और निंदा ही मिलेगी। मैंने सोचकर देखा और यही निश्चय किया कि मेरे लिए मरना ही अच्छा है। मुझ पर आपने जो दया की थी, उसके लिए आपको क्या प्रतिदान करूँ? जीवन में मैंने कभी किसी वस्तु की इच्छा नहीं की; परंतु मुझे दु:ख है कि आपके चरणों पर सिर रखकर न मर सकी। मेरी अंतिम याचना है कि मेरे लिए आप शोक न कीजिएगा। ईश्वर आपको सदा सुखी रखें।
माताजी ने पत्र रख दिया और आँखों से आँसू बहने लगे। बरामदे में वंशीधर निस्पंद खड़े थे और जैसे मानी लज्जानत उनके सामने खड़ी थी।
