dhikkaar by munshi premchand
dhikkaar by munshi premchand

मानी पाषाण-मूर्ति के समान खड़ी थी, मानो वहीं जम गयी हो। उसका सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। ऐसा जी चाहता था, धरती फट जाय और मैं समा जाऊँ, सामने उसका पानी उतर गया! उसकी आँखों से आँसू की एक बूँद भी न निकली। हृदय में आँसू न थे। उसकी जगह एक दावानल-सा दहक रहा था, जो मानो वेग से मस्तिष्क की ओर बढ़ता चला जाता था। संसार में कौन जीवन इतना अधम होगा।

सास ने पुकारा-बहू, अन्दर आ जाओ।

गाड़ी चली तो माता ने कहा-ऐसा बेशर्म आदमी नहीं देखा। मुझे तो ऐसा क्रोध आ रहा था कि उसका मुँह नोच लूँ।

मानी ने सिर ऊपर न उठाया।

माता फिर बोली-न जाने इस सड़ियलों को बुद्धि कब आएगी, अब तो मरने के दिन भी आ गये। पूछो, तेरा लड़का भाग गया तो हम क्या करें; अगर ऐसे पापी न होते तो यह वज्र ही क्यों गिरता?

मानी ने फिर भी मुँह न खोला। शायद उसे कुछ सुनाई ही न देता था। शायद उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान भी न था। वह टकटकी लगाये खिड़की की ओर ताक रही थी। उस अंधकार में जाने क्या सूझ रहा था।

कानपुर आया। माता ने पूछा-बेटी, कुछ खाओगी? थोड़ी-सी मिठाई खा लो; दस कब के बज गये।

मानी ने कहा-अभी तो भूख नहीं है अम्माँ, फिर खा लूँगी।

माताजी सोयीं। मानी भी लेटी; पर चाचा की वह सूरत आँखों के सामने खड़ी थी और उनकी बातें कानों में गूँज रही थीं-आह! मैं इतनी नीच हूँ, ऐसी पतित कि मेरे मर जाने से पृथ्वी का भार हलका हो जायेगा? क्या कहा था, तू अपने माँ-बाप की बेटी है तो फिर मुँह मत दिखाना! न दिखाऊँगी, जिस मुँह पर ऐसी कालिमा लगी हुई है, उसे किसी को दिखाने की इच्छा भी नहीं।

गाड़ी अंधकार को चीरती हुई चली जा रही थी। मानी ने अपना ट्रंक खोला और आपने आभूषण निकालकर उसमें रख दिये। फिर इन्द्रनाथ का चित्र निकालकर उसे देर तक देखती रही। उसकी आँखों से गर्व की एक झलक-सी दिखाई दी। उसने तस्वीर रख दी और आप-ही-आप बोली-नहीं-नहीं, मैं तुम्हारे जीवन को कलंकित नहीं कर सकती। तुम देवतुल्य हो, तुमने मुझ पर दया की है। मैं अपने पूर्व-संस्कारों का प्रायश्चित कर रही थी। तुमने मुझे उठा कर हृदय से लगा लिया; लेकिन मैं तुम्हें कलंकित न करूँगी। तुम्हें मुझसे प्रेम है। तुम मेरे लिए अनादर, अपमान, निन्दा सब सह लोगे, पर मैं तुम्हारे जीवन का भार न बनूँगी।

गाड़ी अन्धकार को चीरती चली जा रही थी। मानी आकाश की ओर इतनी देर तक देखती रही कि सारे तारे अदृश्य हो गये और अंधकार में उसे अपनी माता का स्वरूप दिखाई दिया-ऐसा उज्ज्वल, ऐसा प्रत्यक्ष कि उसने चौंककर आँखें बन्द कर ली। फिर कमरे के अन्दर देखा तो माताजी सो रही थीं। न जाने कितनी रात गुज़र चुकी थी। दरवाज़ा खुलने की आहट से माताजी की आँखें खुल गयीं। गाड़ी तेज़ी से चली जा रही थी; मगर बहू का पता न था। वह आँखें मलकर उठ बैठी और पुकारा-बहू! बहू! कोई जवाब न मिला।

उनका हृदय धक्-धक् करने लगा। ऊपर के बर्थ पर नज़र डाली, पेशाबख़ाने में देखा, बेंचों के नीचे देखा, बहू कहीं न थी। तब वह द्वार पर आकर खड़ी हो गयी। शंका हुई, यह द्वार किसने खोला? कोई गाड़ी में तो नहीं आया! उनका जी घबराने लगा। उन्होंने किवाड़ बन्द कर दिये और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। किससे पूछें? डाकगाड़ी अब न जाने कितनी देर में रुकेगी! कहती थी, बहू मर्दाने डिब्बे में बैठो। मेरा कहना न माना कहने लगी, अम्माँ जी, आपको सोने की तकलीफ़ होगी। यही आराम दे गयी!

सहसा इस खतरे की ज़ंज़ीर याद आयी। उसने ज़ोर-ज़ोर से कई बार ज़ंजीर खींची। कई मिनट के बाद गाड़ी रुकी, गार्ड आया। पड़ोस के डिब्बे से दो-चार आदमी और भी आये। फिर लोगों ने सारा डिब्बा तलाश किया। नीचे तख़्ते को ध्यान से देखा। रक्त का कोई चिह्न न था। असबाब की जाँच की। बिस्तर, संदूक, संदूकची, बर्तन सब मौजूद थे। ताले भी सबके बंद थे। कोई चीज़ गायब न थी। अगर बाहर से कोई आदमी आता, तो चलती गाड़ी से जाता कहाँ? एक स्त्री को लेकर गाड़ी से कूद जाना असम्भव था। अब लोग इन लक्षणों से इसी नतीज़े पर पहुँचे कि मानी द्वार खोलकर बारह झाँकने लगी होगी और मुट्ठियाँ हाथ से छूट जाने के कारण गिर पड़ी होगी। गार्ड भला आदमी था। उसने नीचे उतरकर एक मील तक सड़क के दोनों तरफ़ तलाश किया। मानी का कोई निशान न मिला। रात को इससे ज़्यादा और क्या किया जा सकता था? माताजी को आग्रहपूर्वक कुछ लोग मर्दाने डिब्बे में ले गये। यह निश्चय हुआ कि माताजी अगले स्टेशन पर उतर पड़ें और सवेरे इधर-उधर दूर तक देख-भाल की जाए। विपत्ति में हम पर मुखापोक्षी हो जाते हैं। माताजी कभी इसका मुँह देखतीं, कभी उसका। उनकी याचना से भरी हुई आँखें, मानो सबसे कह रही थीं-कोई मेरी बच्ची को ख़ोज क्यों नहीं लाता? हाय! अभी तो बेचारी की चुँदरी भी नहीं मैली हुई! कैसे-कैसे साधों और अरमानों से भरी पति के पास जा रही थी! कोई उस दुष्ट वंशीधर से जाकर कहता क्यों नहीं-ले तेरी मनोभिलाषा पूरी हो गयी-जो तू चाहता था, वह पूरा हो गया। क्या अब भी तेरी छाती नहीं जुड़ाती?

वृद्धा बैठी रो रही थी। और गाड़ी अंधकार को चीरती चली जाती थी।

रविवार का दिन था। संध्या इन्द्रनाथ दो-तीन मित्रों के साथ अपने घर की छत पर बैठा हुआ था। आपस में हास-परिहास हो रहा था। मानी का अगमन इस परिहास का विषय था।

एक मित्र बोले-क्यों इंद्र, तुमने तो वैवाहिक जीवन का कुछ अनुभव किया है, हमें क्या सलाह देते हो? बनाये कहीं घोंसला, या यों ही डालियों पर बैठे-बैठे दिन काटे? पत्र-पत्रिकाओं को देखकर तो यही मालूम होता है कि वैवाहिक जीवन और नर्क में कुछ थोड़ा ही-सा अंतर है।

इन्द्रनाथ ने मुस्कराकर कहा-यह तो तक़दीर का खेल है भाई, सोलहों आना तक़दीर का। अगर एक दशा में वैवाहिक जीवन नरकतुल्य है, तो दूसरी दशा में स्वर्ग से कम नहीं।

दूसरे मित्र बोले-इतनी आज़ादी तो भला क्या रहेगी?

इन्द्रनाथ-इतनी क्या इसकी शतांश भी न रहेगी। अगर तुम रोज़ सिनेमा देखकर बारह बजे घर लौटना चाहते हो, नौ बजे सोकर उठना चाहते हो और दफ़्तर से चार बजे लौटकर ताश खेलना चाहते हो, तो तुम्हें विवाह करने से कोई सुख न होगा। और जो हर महीने सूट बनवाते हो, तब शायद साल भर भी न बनवा सकी।

‘श्रीमतीजी तो आज रात की गाड़ी से आ रही हैं?’

‘हाँ, मेल से। मेरे साथ चलकर उन्हें रिसीव करोगे न?’

‘यह भी पूछने की बात है। अब घर कौन जाता है, मगर कल दावत खिलानी पड़ेगी।’

सहसा तार के चपरासी ने आकर इन्द्रनाथ के हाथ में तार का लिफ़ाफ़ा रख दिया।

इन्द्रनाथ का चेहरा खिल उठा। झट तार खोलकर पढ़ने लगा। एक बार पढ़ते ही उसका हृदय धक् हो गया, साँस रुक गयी, सिर घूमने लगा। आँखों की रोशनी लुप्त हो गयी जैसे विश्व पर काला परदा पड़ गया हो। उसने तार की मित्रों के सामने फेंक दिया और दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर फूट-फूटकर रोने लगा। दोनों मित्रों ने घबराकर तार उठा लिया और उसे पढ़ते ही हतबुद्धि से हो दीवार की ओर ताकने लगे। क्या सोच रहे थे क्या हो गया!

तार में लिखा था-मानी गाड़ी से कूद पड़ी। उसकी लाश लालपुर से तीन मील पर पायी गयी। मैं लालपुर में हूँ तुरन्त आओ।

एक मित्र ने कहा-किसी शत्रु ने झूठी ख़बर ने भेज दी हो?

दूसरे मित्र बोले-हाँ, कभी-कभी लोग ऐसी शरारतें करते हैं।

इन्द्रनाथ ने शून्य नेत्रों से उनकी ओर देखा; पर मुँह से कुछ बोले नहीं।

कई मिनट तीनों आदमी निर्वाक्-निस्पंद बैठे रहे। एकाएक इन्द्रनाथ खड़े हो गये और बोले-मैं इस गाड़ी से जाऊँगा।

बम्बई से नौ बजे रात को गाड़ी छूटती थी। दोनों ने चटपट बिस्तर आदि बाँधकर तैयार कर दिया। एक ने बिस्तर उठाया, दूसरे ने ट्रंक। इन्द्रनाथ ने चटपट कपड़े पहने और स्टेशन चले। निराशा आगे थी; आशा रोती हुई पीछे।