Funny Stories for Kids: निक्का के पापा ने निक्का को ला दी कहानियों की एक किताब । उसमें संदुर-संदुर चित्र बने थे । कहानियाँ भी लाजवाब थीं । परियों की, राजकुमारी पूप्सी की कहानी…ऊका-बाका हाऊ और परियाँ । मेंगा राजा और
मिंगनी रानी का मजेदार किस्सा । पत्तापुर का हुल्ला हाथी और ढोलनपुर के ढोल वाले सि पाही…और भी न जाने क्या -क्या ! फर्श पर चौकड़ी मारकर निक्का कहानियाँ पढ़ने में डूबा हुआ था । कहानियाँ सचमुच मजेदार थीं । एक से एक अनोखी । उसे बहुत अच्छा लग रहा था । तभी एक नटखट चुहिया उछलते-कूदते हुए कहीं से आई । निक्का के आस-पास नाचने लगी । वह इस कदर मस्ती में नाच रही थी कि उसके पैर ही नहीं, पूरा शरीर थिरक रहा था ।
निक्का का ध्यान किताब में था । पर चुहिया को बार-बार उछलते-नाचते देखा, तो उसका ध्यान टूटा । थोड़ा गुस्से में आकर चुहिया से बोला, “हटो जी, तुम मेरी कि ताब काट डालोगी ।” चुहिया को हँसी आ गई । बोली, “अच्छा जी, नहीं काटूँगी । अब तो दोस्ती कर लो ।” “दोस्ती और तुमसे…?” निक्का ने बड़े कौतुक से उसे देखा । “क्यों, मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगती ?” कहकर चुहिया ने बड़े मजे में गरदन नचाई ।
निक्का हँस पड़ा । वह भी उसी तरह गरदन नचाकर बोला, “लो जी, हो गई दोस्ती । अब करो मुझसे बातें, चाहे जितनी भी करनी हैं ।” और वह किताब छोड़, नन्ही चुहि या से बातें करने लगा । बातें करते-करते बोला, “मैं तुम्हारा नाम पूप्सी रख दूँ तो बुरा तो नहीं मानोगी ?”
“पूप्सी …! पूप्सी कौन ?” चुहिया ने अचकचाकर कहा । “अरे, पूप्सी को नहीं जानती ? मेरी कहानियों की कि ताब में है उसका किस्सा । पूप्सी थी परियों की राजकुमारी । बड़ी ही चतुर, बड़ी हँसोड़ और
खुशदिल । बिल्कुल तुम्हारी तरह…! इसीलि ए तो मैंने तुम्हारा नाम पूप्सी रखा है ।”
“ठीक है…ठीक है ! चलो, पूप्सी ही सही । तुम्हें पसंद है न !” कहकर पूप्सी चुहि या ने दाँत दिखाए और झट गायब हो गई । अब तो वह नन्ही सी नटखट चुहिया रोज आती । उसे निक्का से बातें करना
अच्छा लगता । निक्का को भी नन्ही चुहि या बड़ी अच्छी लगी । एक दिन उसने देखा, चहिु या के सिर पर लाल-पीली-हरी टोपी है । बड़ी ही संदुर । डि जाइनदार । दूर से चमक रही थी ।
निक्का हैरान । बोला, “चुहिया…चुहिया, यह रंग-बिरंगी टोपी तो एकदम नई लग रही है । कहाँ से आई ?” चुहिया हँसकर बोली, “कहीं फोकटी में नहीं मिली । दर्जी नफासत अली से सिलवाई है ।…सच्ची कह रही हूँ निक्का , एकदम सच्ची । चाहो तो अभी दर्जी नफासत अली से जाकर पूछ लो ।” “अरे, वाह ! दर्जी ने सी दी । कैसे भई, कैसे ?” निक्का ने पूछा, तो चुहि या हँसकर बोली, “मेरे प्यारे निक्का बाबू, इसकी भी एक कहानी है । बड़ी मजेदार कहानी । वरना दर् जी नफासत अली जैसा खड़ू स आदमी भला कैसे सी देता…?” “ओहो ! तो फिर सुनाओ ना ? मैं वही तो सुनना चाहता हूँ ।” निक्का ने कुछ उतावलेपन से कहा ।
“अरे, वही तो सुना रही हूँ ।” चुहि या हँसकर बोली, “बस, मैंने थोड़ी चतुराई से काम कि या, और बात बन गई । हुआ यह कि मैंने दर्जी नफासत अली की दुकान से लाल-पीली-हरी कतरनें इकट्ठी कीं । फिर उससे कहा, दर्जी चाचा, सी दो टोपी ।”
“ठीक…! फिर आगे क्या हुआ ?” निक्का ने बड़ी अधीरता से पूछा । उत्सुकता के मारे उसकी जान निकली जा रही थी । पूप्सी चुहि या आँखें चमकाकर बोली, “अरे, होना क्या था ? दर् जी नफासत
अली ने तो टका-सा जवाब दे दिया कि जा-जा चुहि या, अपना रस्ता देख । तेरे जैसों की टोपि याँ सीता रहूँ, तब तो चल गया मेरा काम ।…जा भई जा, अपने घर जा । मेरा सिर न खा ।” “ओहो, पूप्सी चुहिया ! फिर तो तुम्हें बड़ा दुख हुआ होगा ?” निक्का ने हमदर्दी दिखाते हुए कहा ।
“अरे, दुख की बात कहते हो । मेरा तो दिल ही टूट गया, निक्का भैया । लगा, रंग-बि रंगी टोपी पहननें का मेरा सपना तो बस सपना ही रहेगा ।” पूप्सी चुहिया ने अजीब ढंग से गरदन हिलाकर कहा । “फिर…आगे क्या हुआ ?” निक्का ने जानना चाहा ।
“फिर क्या होना था । मैंने एक बार फिर से मनुहार की कि दर् जी चाचा, सी दो ना । मेरा बड़ा मन है कि मैं भी रंग-बिरंगी टोपी पहनू । पर दर्जी नफासत अली चिढ़कर बोला, देख चुहिया, मैं तो नहीं सीऊँगा बिन पैसे के ! ज़्यादा टोपी पहननें का शौक है तो जा । जाकर बाजार से खरीद ला ।”
“हे भगवान, दर् जी नफासत अली ने ऐसी दिल तोड़ने वाली बात कही ?” निक्का बोला ।
“और क्या निक्का ! ये दुनिया ऐसी ही है । यहाँ कोई कि सी का दर्द नहीं समझता । तुम अच्छे और प्यारे लड़के हो । मेरे दिल की बात समझ सकते हो । तभी तो मैंने तुमसे दोस्ती की, ताकि कभी-कभी अपने दिल का हाल सुना सकूँ ।” पूप्सी चहिुया ने आँखें झपकाते हुए कहा ।
“हाँ, मगर आगे क्या हुआ ? दर्जी नफासत अली ने कैसे सी दी टोपी ? यह तो तुमने बताया ही नहीं ।” निक्का ने बड़ी उत्सुकता से पूछा । “अरे निक्का , दर्जी की बातों से मैं समझ गई कि कुछ न कुछ करना होगा, वरना इस जैसे मतलबी आदमी के आगे तो नहीं गलेगी मेरी दाल ।…तभी मैंने सुना, दर् जी नफासत अली कि सी से कह रहा है कि अरे लटूरी, पता नहीं, मेरा बटुआ कहाँ गया ? अभी कल तो यहाँ रखा था ! सुनकर मैंने देखा । बड़ा परेशान लग रहा था दर् जी नफासत अली । सो मुझे लगा, चुहिया री चुहिया, आ गया मौका तेरे हाथ में !…तो मैं इधर उछली, उधर उछली । यहाँ उछली, वहाँ
उछली । पूरब देखा, पच्छिम देखा । उत्तर देखा, दक्खिन देखा ।…और लो जी लो, मुझे नजर आ गया दर् जी का बटुआ । बादामी रंग का । असल में दरवाजे के पीछे छोटा-सा गड्ढा था । उसी में फँसा पड़ा था दर्जी का बटुआ । मैंने बटुआ ढूँढ़कर रख दिया दर्जी नफासत अली के आगे ।
“अच्छा , यह तो बड़े कमाल की बात हुई ।” कहते-कहते निक्का की आँखें भी चमकने लगीं । पर आगे की कहानी तो अभी बाकी ही थी । निक्का कुछ कहता, इससे पहले ही पूप्सी चुहि या ने पूरी कर दी कहानी । बोली –
“हाँ, तो निक्का , बटुआ देखते ही दर्जी नफासत अली खुश । उसकी तो आँखें चमकने लगीं, एकदम बिजली के लट्टुओं की तरह । और लो जी, उसने मेरे हाथ से लाल-पीली-हरी कतरनें लीं । थोड़ी अपनी ओर से भी मिलाई और झट सी दी यह रंग-बिरंगी फुँदने वाली टोपी । फिर खदु अपने हाथों से मेरे सिर पर पहना भी दी ।…देखो निक्का , अच्छी है ना ?” “अच्छी …बहुत अच्छी !” निक्का ने कहा, तो पूप्सी चुहिया उछल-उछलकर नाचने लगी । नाचते-नाचते वह गा रही थी –
आहा टोपी, आहा टोपी,
मेरी टोपी खूब निराली,
देख-देखकर चंदा मामा
हँसते और बजाते ताली !
आहा टोपी, आहा टोपी,
मेरी टोपी अजब निराली,
बनी हुई है इस पर देखो
हरे रंग की संदुर जाली !
आहा टोपी, आहा टोपी,
सलमे और सितारे वाली,
बड़ी नि राली, बड़ी निराली
टोपी चंदा-तारों वाली…!
पूप्सी चुहिया नाचती रही देर तक । नाचती रही और गाती रही । गाती रही और नाचती रही । देख-देखकर निक्का भी हँसने और तालि याँ बजाने लगा ।
ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ
