Hindi Kahani: जाड़े की सर्द सुबह धूप की तलाश में मैं छत पर पहुँच गई थी और मेरा पीछा करते-करते तुम्हारी यादें भी…हवाई जहाज की एक हल्की सी आवाज़ सुन मैंने अपना सर ऊपर की ओर उठाया।ऊपर सिर्फ़ धुंध ही धुंध थी।सूरज भगवान मेरे साथ आँख-मिचौली का खेल खेल रहे थे या शायद मेरी परीक्षा ले रहे थे। मैंने नजरें उठाकर उस धुंध में तुम्हें ढूंढने की नाकाम कोशिश की पर हमेशा की तरह मेरे हाथ निराशा के कुछ भी न लगा।
तुम मुझसे इतनी दूर जा चुके थे जहाँ से कोई वापस लौट कर नहीं आता।सफ़ेद बादलों के पार की शांत दुनिया, हर बंधनों से मुक्त वह खूबसूरत दुनिया जहाँ कोई रिश्ता उसे बांध नहीं सकता कोई आँसू उसके रास्ते की रुकावट नही बन सकते।
माँ अक्सर कहा करती थी—पीछे से आवाज़ नहीं देते, अपशकुन होता है। बचपन से यह वाक्य हमारे घर में किसी नियम की तरह था। तुम भी इन बातों पर बहुत विश्वास करते थे—यह बात मैंने तुम्हारी बहन के मुँह से कई बार सुनी थी। वह हँसते हुए कहती, “भैया बहुत सीधे हैं, पर मन से बहुत डरते भी हैं।”
सच कहूँ तो, तुम्हें मैं उतना ही जान पाई जितना तुम्हारी बहन ने मुझे बताया। बहुत कुछ जानना चाहती थी—तुम्हारी पसंद, तुम्हारी आदतें, तुम्हारे सपने—पर जब भी तुम सामने आए, बात सिर्फ आँखों से हुई। शब्दों तक कभी बात पहुँची ही नहीं। शायद इसलिए कि ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
कितने सालों तक आँखों ही आँखों में बातें करते रहे हम।चुप तुम थे, चुप मैं थी—फिर वह कौन था जो हमारे बीच बोलता रहा?
शायद वही अनकहा प्रेम, जो शब्दों से डरता है या फिर जिसके लिए किसी वर्णमाला में शब्द बने ही नहीं होते।
माँ अक्सर तुम्हारे बगीचे से फूल लाने को कहती। मैं टोकरी लेकर जाती और तुम पहले से वहाँ खड़े मिलते। बिना कुछ पूछे, बिना कुछ कहे, तुम फूल तोड़कर मेरी टोकरी में रखने लगते।
“नहीं-नहीं, ये नहीं… लाल वाले,” मैं टोकरी आगे बढ़ाते हुए कहती।
तुम ठिठक जाते।
हैरानी से मेरा चेहरा देखते और मुस्कुराकर कहते—
“फूल तो फूल होते हैं… लाल-पीले क्या?”
मैं कुछ नहीं कहती, बस मुस्कुरा देती।
और अगले ही दिन, बिना किसी बहस के, बिना किसी सवाल के—मेरी टोकरी लाल फूलों से भरी होती।
शायद वही मेरे अनगिनत,अंतहीन सवालों का तुम्हारा जवाब होता। सुना था तुम बहुत बातूनी थे पर मेरे सामने आते ही तुम्हारे शब्द चूक जाते।ऐसा क्यों?ये एक सवाल था जो तुम्हारे साथ ही चला गया।
तुम मोहल्ले के बच्चों के सबसे प्यारे भैया थे। किसी की शटलकॉक डाल में फँस जाती, कोई बैट पर ग्रिप चढ़ाना नहीं जानता, या फिर दशहरे पर चंदा इकट्ठा करके रावण बनाना होता—बस तुम्हारा नाम लिया जाता।
न जाने तुममें ऐसा क्या था कि तुम्हारे एक आग्रह पर सब कुछ सहज हो जाता। बच्चे ही नहीं, बड़े भी तुम्हारी बात टाल नहीं पाते। यहाँ तक कि चिड़चिड़े, खड़ूस से दिखने वाले शुक्ला अंकल भी तुम्हें मना नहीं कर पाते थे।
“तुम कह रहे हो तो दे देते हैं,” कहते हुए वे मुस्कुरा देते।
शायद यही सादगी थी, या शायद लोगों को तुम पर भरोसा था।
आज भी जब सर्द हवाएँ मेरे तन को छूती हैं, तो अनायास ही तुम्हारी याद आ जाती है। मैंने माँ के लिए भेजी तुम्हारी वह पश्मीना शाल कसकर ओढ़ ली। ऐसा लगा, जैसे मैंने तुम्हारी यादों को अपने चारों ओर बाँध लिया हो—ठंड से नहीं, अकेलेपन से बचने के लिए।
यह प्यार एकतरफ़ा नहीं था—आज भी मुझे इस पर पूरा यक़ीन है।कई बार देखा है मैंने—तुम मुझे देखकर धूल से भरी कार के शीशे पर उँगली से कुछ लिखने की कोशिश करते थे। शायद मेरा नाम,या शायद मेरे नाम का पहला अक्षर।मैंने तुम्हें के बार रंगे हाथों पकड़ा था, जब मैं देख लेती, तो तुम झेंप जाते और घबराहट से हाथ पीछे कर लेते।
कितना पसंद था तुम्हें उड़ना।
दिन भर छत पर पतंग उड़ाना और रात को देर तक आसमान ताकते रहना। न जाने कब तुम्हारी यह पसंद मेरी पसंद बन गई। अब भी जब आसमान में कोई पतंग लहराती है या कोई जहाज़ गुजरता है, तो मेरी नज़र अनायास वहीं ठहर जाती है।
तुम अक्सर माँ से कहते—
“आंटी, मैं अपना प्लेन आपकी छत के ऊपर से ले जाऊँगा।”
और मैं पागल, हर हवाई जहाज़ की आवाज़ पर छत पर भागती। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कता—शायद यही वह पल हो।
पर तुम नहीं आए।
बस तुम्हारी ख़बर आई।
मिग-21 दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
पायलट की मौत हो चुकी थी।
दुनिया के लिए यह एक समाचार था—
मेरे लिए पूरा आसमान गिर पड़ा था।
दुनिया के लिए तुम चले गए,
पर मेरे लिए—
कल भी तुम यही थे,
और आज भी यही हो।
माँ कहा करती थी—सबके पेट में खाने अलग-अलग होते हैं। किसी को रोटी चाहिए, किसी को पानी। काश भावनाओं के भी खाने होते। तुम्हारे जाने के बाद मेरी भावनाएँ उफान मारती रहती हैं। कभी-कभी लगता है, काश उन्हें किसी भारी सिल से दबा पाती—जैसे आटे की लोई दबा दी जाती है।
माँ यह भी कहती थी—अच्छे लोगों की ज़रूरत भगवान को भी होती है।
शायद इसीलिए तुम जल्दी बुला लिए गए।
आज तुम नहीं हो,
पर तुम्हारे होने भर का अहसास—
वे चंद पल, वे छोटी-छोटी यादें—
मुझे ज़िंदा रखने के लिए काफ़ी हैं।
अक्सर तुम्हारे मुँह से सुना था—पीछे से आवाज़ नहीं देते, अपशकुन होता है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने तुम्हें एक बार भी पीछे से आवाज़ नहीं दी,
और तुम इसी गुमान में चले गए?
मैंने तुम्हें हमेशा दूर से देखा।
दूर से चाहा।
आज तुम्हारा पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा ताबूत बनकर लौट रहा था।
उस देह की खुशबू मैं आज भी महसूस कर रही थी—वही मिट्टी, वही सादगी।
ताबूत के ऊपर बड़े से फ्रेम में तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा था। फूलों के बीच से झाँकता हुआ—मानो कह रहा हो, “रो मत।”
हाय रे किस्मत!
बहुत कुछ कहना था तुम्हें,
और शायद मुझे भी।
जाते-जाते भी तुम्हारी तस्वीर पर वही सुर्ख़ लाल फूल थे।
फूलों की टोकरी मुझे मुँह चिढ़ा रही थी।
उस टोकरी को भरने वाले
लाल फूलों वाले हाथ
अब नहीं थे।
थी तो बस—
टोकरी भर बेहिसाब यादें,
अंतहीन यादें।
