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कथाकहानी

‘‘क्या समय और उम्र के साथ इंसान की सोच बदल सकती है‘-?

यही सवाल सुधा को पिछले कुछ दिनों से बहुत परेशान किए हुए था। उसका अंतर्मन इस द्वंद्व में फंस कर उलझ जाता था। बहुत कोशिश करने पर भी अब उसका ध्यान किसी अन्य विषय पर नहीं जाता था।

ये क्या हो गया था उसे? उम्र के इस पड़ाव परजब पचपन वसंत सूखे निकल गए, कभी व्यर्थ की बातों का ख्याल तक नहीं आया, अब वो ऐसा सोचने पर विवश क्यों हो रही है। सुधा के जीवन में अब ऐसी सुकोमल भावनाओं का आगमन जीवन में एक अलग सुखदायी अनुभूति देने लगा था। वह अपनी जिन्दगी का विश्लेषण-संश्लेषण करने में जुटी रहती। कॉलेज की सेवा से वह निवृत्ति लेने की सोच रही थी ताकि कुछ समय विदेश की सैर कर सके परन्तु अचानक उसकी जिन्दगी ऐसे मोड़ पर अटक गई थी जिसे वह खुद नहीं समझ पा रही थी।

कैसी विडम्बना थी कि पूर्ण और सफल जिन्दगी अचानक अपूर्ण, बोझिल और कृत्रिम लगने लगेगी सुधा ने शायद ऐसी कभी कल्पना भी नहीं कि थी। जिन्दगी की जिन कमियों को उसने सदैव अपनी ठोकर पर रखा था, वो अचानक उसे चिढ़ाने लगेंगी, यह अकल्पनीय था। शायद इसी का नाम जिन्दगी है जो नियति के नाम से ही सही किन्तु मानव मन को कभी न कभी मशीन से पृथक कर इंसान होने का अहसास करती है।

सुधा पूरा जीवन ऐसी दुनिया में रहती आई थी जिसमें किसी पुरूष का प्रवेश संभव नहीं था। पूरा जीवन अलग-एकाकी रहकर सुकून से बिता दिया था। पुरूष नाम से उसे इतनी चिढ़ होती थी और अपनी एकाकी जिन्दगी उसे गर्व का अनुभव कराती। प्रेम, रोमांस विवाह जैसे पहलू उसके लिए बेमानी हो चुके थे। हो भी क्यों ना? दर्शन पढ़ाते-पढ़ाते वह ‘स्थित’ प्रज्ञ हो चुकी थी। वो दशा जिसमें ना कोई कामना-तृष्णा मन को भटका सकती है और ना ही कोई सुख-दुःख उसके प्रण को डिगा सकते हैं। स्व नियंत्रण इसी को कहते हैं। इसी पर तो सुधा को गर्व था। जो कुछ उसने भुगता था शायद उसकी परिणति भी यही होनी थी।

आज कॉलेज का अवकाश था, इसलिए वह सोकर भी देर से उठी। अखबारों पर नजर डालते हुए चाय की चुस्कियों के साथ वह अपने घर के बगीचे में बैठी थी। उसके दिमाग में अब भी वही यक्ष प्रश्न ढीठ बनकर डटा खड़ा था। इतना बड़ा आलीशान घर जिसके बागीचे मे उसने अपने जीवन का लम्बा समय बिताया था, आज कुछ अपरिचित सा लग रहा था। मन की बेचैनी और अशांत दिमाग के आगे कुछ भी प्रिय नहीं लग रहा था। सामने चांदनी के पेड़ पर चिड़ियों का एक जोड़ा अपने नीड़ के निर्माण में जुटा था। सुधा सब कुछ छोड़ कर अब इसे देखने लगी। उसे लग रहा था, यह सब तो उसने पहले भी न जो कितनी बार देखा है लेकिन इस भाव को समझने की विवशता कभी महसूस नहीं की थी। फिर आज क्यों? चिड़ा तिनके ला-ला कर चिड़िया को सौंप रहा था और नन्हीं सी चिड़िया बड़े जतन से अपने नए आशियाने के निर्माण में जुटी थी। जो शायद कुछ दिन बाद उसकी ममता का आश्रय बनने वाला था।

मानव मन भी कितना निराला है, बड़ी से बड़ी घटनाओं को जज्ब कर जाता है और कभी साधारण सी नैसर्गिक क्रियाओं के कौतुहल में अटक जाता है। कुछ देर तक इस दृश्य को निहारने के बाद सुधा अंदर आ गई। उसे थकान महसूस हुई तो पलंग पर लेट गई। अतीत की स्मृतियां चलचित्र की भांति उसके मानस पटल पर सजीव होने लगी।

एक पुरुष ने उसकी मां को धोखा दिया था, जो प्रेम के नाम पर बार-बार छली गई। सरेआम जमाने के आगे बदनाम हुई और अनैतिक प्रेम की परिणति के रूप में आज सुधा स्वयं खड़ी थी। उसे अपने अनाम पिता के प्रति नफरत इस कदर बढ़ी कि अब पुरुष नाम से ही सुधा ने तौबा कर ली। पुरुष जो सिर्फ वासना में जीता है, जिसके दिल में प्रेम -संवेदनाअें की परिणति भी वासना के रूप में ही प्रकट होती है, वह स्त्री के मन को क्या समझ सकता है? मां के प्रति उसका सम्मान- श्रद्धा हमेशा रही, कारण न जाने उन्होंने कितने कष्ट और संघर्ष झेल कर सुधा को इस योग्य बना दिया था कि आज उसका समाज में नाम-सम्मान था। सुधा उनके प्रेम की निशानी थी जिसकी लाज उसने आजीवन निभाई।

सुधा को अब अपने जीवन में पुरूष की कमी जरूरत महसूस नहीं होती थी। युवावस्था की तूफानी उम्र को उसने बड़ी सहजता से सहेजा था जैसे उम्र से कहीं अधिक परिपक्वता आ जाने से उमंग, उल्लास, स्वप्न निरर्थक लगने लगते हैं। अपने विशाल घर में केवल दो महिला नौकरानियों के अलावा शायद ही कभी किसी पुरुष के कदम पड़े हों, किन्तु पिछले दो सप्ताह से बड़ा उलट -फेर हो गया था। शांत स्थिर समंदर में उठी लहरें तूफान बनकर अब रह रहकर उसे परेशान कर रही थीं। इस परिवर्तन के आगे सुधा अपने आप को लाचार महसूस कर ही थी।

उस दिन न जाने क्यों उसका मन अशांत था, तनाव को मिटाने वह झील के किनारे घूमने चली गई। सुधा का शहर हिमालय की तलहटी में बसा था जिसकी सीमा पाकिस्तान से लगती थी। जब भी सुधा तनाव महसूस करती दूर जंगल में प्रकृति की गोद में स्थित इस झील पर चली आती। यहां के नैसर्गिक सौन्दर्य से उसे बड़ा सुकून मिलता था। झील की दीवार पर बैठी वह चिन्तन में डूबी थी। अचानक न जाने क्या हुआ उसे चक्कर आया और अपने आप को नीचे झील में गिरता पाया। शून्य की ओर गिरते अथाह जल भराव की कल्पना से ही वह मूर्छित हो गई। पानी में डूबते समय की बस इतनी सी स्मृति याद थी कि उसका दम घुटता प्रतीत हुआ।

जब उसे थोड़ा होश आया तो वह ऐसी स्थिति में थी जो उसके लिए अकल्पनीय थी। एक जवान फौजी उसकी छाती को दबाकर पानी निकालने का प्रयास कर रहा था। रह-रह कर उसके पैरों के तलवे, हथेलियों को रगड़ रहा था। भीषण सर्द मौसम में उसका शरीर कंपकपा रहा था। वो पुरूष हर संभव कोशिश कर उसकी जान बचाने में जुटा था। सुधा को हल्का सा होश था। उसके पास में लकड़ियां जल रही थी जिसकी तपिश से उसे थोड़ी राहत महसूस हो रही थी। उसे अभी पूरी तरह होश नहीं आया था। अर्द्धबेहोशी अथवा तंद्रा की हालत में उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

जब उसे होश आया तो वह भौचक्की रह गई। उसने अपने आप को एक छोटे से मिलिट्री टैन्ट में पाया। उसके शरीर पर पुरूष वस्त्र थे और वह फौजी लड़का उसकी सेवा सुश्रूषा में जुटा था।उसे होश में आता देख फौजी लड़का खुशी से चिल्लाया-‘‘मैडम जी कैसी हो आप?” सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया। लड़का पुनः बोला-‘‘आप इधर बहती हुई आई एकदम बेहोश निर्जीव।”

सुधा का चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा। एक पराये इंसान की इतनी हिम्मत? वह कैसे सहन कर सकती है? लेकिन लड़का निश्छल भाव से सब कुछ बयां कर रहा था। -‘‘’मैडम आपको देखकर मैं हैल्प के लिए चिल्लाया, लेकिन इधर जंगल में कौन सुनता है?” इस जंगल में हमारी वॉकीटॉकी काम नही करती, आपकी जान बचाना जरूरी था इसलिए…”

फौजी लड़के ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी। सुधा को काटो तो खून नहीं । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। लड़के की इतनी हिम्मत कैसे हुई? कुछ देर बाद सुधा को लगा, शायद जिन्दगी और मौत के क्षणों में ऐसी बातें गौण हो जाती होंगी। यह सोचकर वह अपने आपको संयत करने लगी। सुधा ने अपना मोबाइल तलाश किया लेकिन कहीं नहीं मिला। कुछ देर मौन रहकर सुधा ने उस लड़के से पूछा-‘‘कौन हो तुम?”

‘‘विरेन्द्र सिंह मैडम जी।” जवान ने चहकते हुए कहा।

‘‘कौन सी जगह है ये? अब मैं शहर कैसे जाऊंगी?” सुधा ने पूछा।

‘‘मैडम मैंने रेस्क्यू टीम को सूचना दे दी है। एम्बुलेन्स आती होगी।”

‘‘तुम यहां क्या कर रहे थे?” सुधा ने पूछा।

‘‘मैडम मैं कमांडो हूं, आप को पता है आप इस समय हिन्दुस्तान की सरहद पर है। आज मेरी यहां ड्यूटी थी, दोपहर में आप को झील में बहते देखा तो आपकी जान बचाई।”

सुधा के मस्तिष्क में न जाने कितने विचार आ-जा रहे थे। एक पराए पुरूष के, आज इतना करीब? जान हर जीव को प्यारी होती है इसलिए मौत के मुंह से वापस आने पर इंसान की सोच भी बदल जाती है। यह शाश्वत सत्य है कि जान की कीमत ऐसे अनुभव से ही समझ आती है। सुधा के शरीर पर कई जगह चोट के निशान थे। उन पर जड़ी-बूटी का लेप भी लगा दिखाई पड़ रहा था। तभी फौजी लड़का चाय बना कर ले आया। गर्म चाय से सुधा के शरीर में थोड़ी जान आई। उसने उठकर बैठने का प्रयास किया किन्तु दर्द से कराह उठी। फौजी जवान लपक कर आया और उसकी कमर में हाथ डालकर उसे बिठाने लगा। सुधा तटस्थ भाव सारी प्रक्रिया देखती रही।

इस समय उसे क्या हुआ था कुछ समझ नहीं आ रहा था। इस समय पुरुष स्पर्श से उसे नफरत नहीं हो रही थी। लड़के ने उसे सहारा देकर पीछे तकिया लगा कर बिठा दिया था। अब बड़ी समस्या उसे घर पहुंचने की थी। अस्पताल भी जरूरी थी। फौजी लड़का बहुत समझदार और अनुभवी था। शाम होने लगी थी इसलिए शीघ्रता जरूरी थी। जंगल में रात काटना किसी भी तरह मुनासिब नहीं था। सुधा को सहारा देकर जवान उसे पैरों पर खड़ा करने का प्रयास करने लगा। सुधा भी कम मजबूत नहीं थी, इसलिए उसने अपनी पूरी ताकत झौंकी और जैसे तैसे पहाड़ी पगडंडी पर चलने लगी। जवान ने अपना हाथ उसकी कमर में डाला और सुधा का दूसरा हाथ अपने गले एवं कन्धों पर लेकर उसका सारा वजन अपने ऊपर ले लिया। दो-दो कदम करके सुधा चलने लगी। फौजी जवान उसकी हालत को अच्छे से समझ रहा था। इसलिए एक जगह बिठाकर उसने सुधा के पैरों की मालिश् की ताकि शरीर में खून का संचार सही हो सके। खोई हुई शक्ति बटोर कर सुधा आगे बढ़ने लगी।

कितनी अजीब स्थिति थी कि पुरुष के नाम से उसे नफरत थी उसने पूरी जिन्दगी अकेले निकाल दी थी, लेकिन आज वह लाचार होकर उसी पर निर्भर थी। विरेन्द्र का स्पर्श सुधा को नया अहसास करा रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। प्रकृति की व्यवस्था शायद इंसानी सोच से परे हैं। तभी तो ऐसे विलक्षण अवसर आ जाते हैं, जिनकी व्याख्या आसान नही। ऐसा ही कुछ आज सुधा के जीवन में घटित हो रहा था। सुधा की परेशानी देखकर विरेन्द्र ने उसे अपने कंधे पर लाद लिया। सुधा को आश्चर्य हो रहा था जैसे वह बहुत हल्की हो। उसने विरेन्द्र से पूछा-” तुम्हे मुझे लाद कर ले जाने में कष्ट नहीं हो रहा है क्या?”

विरेन्द्र थोड़ा शरमाया लेकिन चुप रहा। सुधा ने अपने स्वभाव के विपरीत पुनः पूछा- आज आपको मेरी वजह से बड़ी पेरशानी हो रही है?”

विरेन्द्र ने धीरे से कहा-” सच कहूं मैडम जी आज मुझे बहुत अच्छा लगा………।”

‘‘क्या? सुधा ने चौंकते हुए पूछा।

‘‘हां मैडम, आपकी जान बचाना मुझे बहुत अच्छा लगा।”

सुधा का नारी मन सहजता के भावों के साथ-साथ पुरुष जाति की व्याकुलता के चिन्ह भी स्पष्ट झलक रहे थे। उसने विरेन्द्र के मन की टोह लेने के लिए फिर पूछा-” आपकी शादी हो गई? ‘‘नहीं मैडम जी, अभी कहां? सेना में अविवाहितों की ही भर्ती होती है। ”

‘‘अच्छा एक बात बताओ, तुमने हर तरह मेरी हैल्प की, क्या कभी डर नहीं लगा कि जब मुझे होश आएगा तो मैं नाराज नहीं होउंगी?”

विरेन्द्र ने कुछ देर सोचकर जवाब दिया-” आप सही कहती है मैडम जी लेकिन उस समय तो मुझे सिर्फ आप की जान बचाना जरूरी लगा। आप महिला है ये ख्याल मुझे नहीं आया।”

‘‘फिर भी तुम्हें कुछ तो सोचना चाहिए था” सुधा ने कृत्रिम रोष प्रकट करते हुए कहा। ‘‘मैडम जी सैनिक कमाण्डो ट्रेनिंग में दो बातें सिखाई जाती है, जान लेना और जान बचाना- आपकी जान बचाना मेरे लिए जरूरी था इसीलिए मैंने ये सब किया………।”

सुधा के पास अब कोई उत्तर नहीं था। वह उस युवक के प्रति शुक्रगुजार थी। थोड़ी देर जंगली पगडंडी पर चलने के बाद मुख्य सड़क आ गई। जवान का वॉकीटॉकी काम करने लगा इसलिए थोड़ी देर बाद सेना की रेसक्यू टीम भी वहां पहुंच गई। पलक झपकते ही एम्बूलेंस द्वारा सुधा को सिविल अस्पताल पहुंचा दिया गया। विरेन्द्र उसे अस्पताल तक छोड़ने आया।

रात हो चुकी थी। प्राथमिक उपचार के बाद सुधा को घर जाने की इजाजत मिल गई। उसने अपनी एक महिला मित्र को फोन कर कार मंगवाई और देर रात वह अपने घर पहुंच गई। सुधा के दिलो दिमाग पर इस भीषण घटना का असर इस कदर छाया हुआ था कि एक पल के लिए भी इसे भुला नहीं पा रही थी। दो चार दिन के बाद वह कुछ नॉर्मल हुई। कॉलेज जाना भी शुरू हो गया।

आज संडे था दोपहर में नौकरानी ने उसे सूचना दी कि कोई युवक उससे मिलने आया है। सुधा ने देखा तो विरेन्द्र सिविल ड्रेस में फूलों का गुच्छा लिए दरवाजे पर खड़ा था। उसके चेहरे पर चमक और मुस्कान उभरी। शायद पहली बार किसी पुरुष को उसने अपने घर अंदर प्रवेश करने की इजाजत दी।

नियति का भी खूब कमाल होता है असंभव को संभव होने में जरा भी वक्त नहीं लगता। विरेन्द्र ने फूलों का गुच्छा सुधा को देते हुए मुस्कराकर पूछा-”कैसी है मैडम जी, आपको देखने चला आया।”

‘‘अच्छी हूं, तुम्हें देखकर कर तो अब और अच्छी हो गई हूं।” सुधा ने मुस्कराकर कहा।

‘‘मैडम मैने आपको बहुत याद किया। आज छुट्टी थी इसलिए मुझे आपको देखने आना ही था।” विरेन्द्र सहजभाव से बोल रहा था।

‘‘यह तो तुमने बहुत अच्छा किया विरेन्द्र। सच में मैं तुम्हें ही याद कर रही थी। उस दिन तुम्हारा शुक्रिया भी अदा नहीं कर पाई।”

‘‘चलो पहले खाना खा लेते हैं, फिर आराम से बैठकर बातें करेंगे।” सुधा ने अपनेपन से जवाब दिया।

‘‘अरे नहीं मैडम, मैं खाना खाकर आया हूं। आप खाना खाएं प्लीज। आप रिकवर हुई?

‘‘मैडम आपको मेरा आना बुरा तो नहीं लगा?” विरेन्द्र ने सकुचाते हुए पूछा।

‘‘अरे बुरा क्यों लगेगा?” सुधा ने मुस्कराते हुए कहा।

‘‘सच में मैडम, मैंने आपको अपना दोस्त बनाया है। आप बुरा मत मानना।”

‘‘मुझे दोस्त मानते हो तो फिर खाना क्यों नहीं खा रहे? सुधा ने पूछा।

विरेन्द्र थोड़ा शरमाया फिर बोला-‘‘मैं खाना खाने नहीं आपको देखने आया हूं। हमें एक छुट्टी मिलती है, लेकिन हम यूनिट से कभी बाहर नहीं जाते, यहां परदेश में हमारा कौन है। आपसे मिलने आज पहली बार यूनिट से बाहर आया हूं।”

‘‘पहली बार?”

‘‘हां मैडम आज आपकी छुट्टी होगी, यही सोचकर आपके यहां आने का प्लान बनाया।” विरेन्द्र सजह भाव से बताने लगा।

‘‘ओह बहुत अलग तरह की लाइफ होती है तुम्हारी।”

‘‘मैडम जी आप मूवी देखती हैं? बहुत अच्छी मूवी लगी है अगर आप मेरे साथ चलना चाहें?”

‘‘मूवी और मैं? सुधा को ऐसा लगा जैसे युवक कोई बहुत बेसिर पैर की बात कह दी हो। विरेन्द्र का मुंह लटक गया। विरेन्द्र को उदास देख सुधा बोली-‘‘ ठीक है अगर तुम्हारा मन करता है तो मैं चलती हूं।”

खाना खाकर विरेन्द्र और सुधा बाइक पर सवार होकर मूवी देखने चल पड़े। सुधा की जिन्दगी में बाइक की सवारी का ये पहला और नया अनुभव था। विरेन्द्र पूरे रास्ते कुछ ना कुछ बोलता-बताता रहा। उसकी खुशी और उमंग स्पष्ट झलक रही थी। उसकी बातें सुधा को ऐसे लग रही थी जैसे वो अपने मन की सारी बातें इसी समय सुधा के सामने प्रकट कर देना चाहता हो। तभी स्पीड ब्रेकर से बाइक को अचानक जोरदार ब्रेक लगे। सुधा का पूरा शरीर विरेन्द्र के बदन से जा टकराया। विरेन्द्र ‘‘सारी मैम” कहने लगा। सुधा ने उसे प्यार से धमकाया-‘‘क्या करते हो विरेन्द्र फिर से मुझे गिराओगे क्या?”

‘‘अरे नहीं मैडम आपकी सेफ्टी तो मेरी पहली डयूटी है” विरेन्द्र के चेहरे पर निश्छल भाव प्रकट हुए।

सुधा ने बात नोट की कि विरेन्द्र का व्यवहार बहुत शालीन और सभ्य था। उसके साथ दो बार की भेंट में उसे कभी ऐसा नहीं लगा जो नारी मन को व्यथित करें। सम्मान, केयरिंग और अदब में विरेन्द्र का कोई जवाब नहीं था। दोनों अब मल्टीप्लेक्स में मूवी देखने लगे। जाने-अंजाने में सुधा को विरेन्द्र का स्पर्श महसूस हो जाता था। किन्तु अब उसे यह आसामान्य नहीं लग रहा था।

फिल्म बहुत अच्छी थी और विरेन्द्र बड़े मनोयोग से फिल्म देखने में मग्न था। बच्चे की तरह उसने उसके चेहरे के भाव फिल्म की कहानी के अनुरूप बदलते रहे। सुधा उन्हें देखती रही शायद उम्र के अन्तर से उसकी मानसिक दूरी विरेन्द्र से बहुत ज्यादा थी। कुछ भी हो लेकिन सुधा को विरेन्द्र का ऐसा व्यवहार अच्छा लगने लगा था। अचानक वह सुधा के मुंह के एकदम करीब आकर उसके कान में फुसफुसाया-‘‘थैक्यू मैडम।”

सुधा ने मौन आंखों से विरेन्द्र के चेहरे को प्रश्न सूचक नजरों से देखा। वह थोड़ा सकपकाया फिर बोला-”आप मेरे साथ फिल्म देखने आई ये मेरे लिए आप का बहुत बड़ा गिफ्ट है।”

‘‘गिफ्ट ? इसे गिफ्ट कहते हुए विरेन्द्र? सुधा ने पूछा।

‘‘हां मैम-इतनी सुन्दर सेलिब्रिटी के साथ-।” विरेन्द्र आगे कुछ नहीं बोल पाया।

‘‘मैं सुंदर हूं? सुधा ने पहली बार स्त्रीमन की सामान्य जिज्ञासा व्यक्त करते हुए पूछा।

‘‘आप बहुत सुंदर है मैम-मैं आपसे बहुत इम्प्रैस हूं।‘‘ विरेन्द्र के चेहरे पर सहज भाव नजर आ रहे थे।

‘‘तुम्हारी कोई गर्ल फ्रैण्ड नहीं है क्या?” क्या?” सुधा ने मुस्कुराते हुए पूछा।

‘‘कैसी बात करती है मैम? हमारी लाइफ बहुत रफ-टफ है, नहीं, कब शहीद हो जाएं। हम इस विषय में सोच भी नहीं सकते लेकिन आप मुझे सच में बहुत अच्छी लगती है-।”

‘‘विरेन्द्र ऐसा मत कहो, आप मुझसे उम्र में बहुत छोटे हैं।” सुधा ने गंभीर स्वर में कहा।

‘‘मैम क्या दोस्ती में उम्र का अंतर रूकावट होता है? आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं तो बस लगती हैं…..इसे आप ना मानें तो भी मेरी फीलिगं अपने मन तक सीमित रहेगी। मैं आपसे कोई एक्सपेक्टेशन नहीं करता।”

विरेन्द्र ने अपने मन की सारी सच्चाई खोल कर रख दी। सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसका चेहरा मंद पड़ गया। शायद वह द्वंद्व में खो गई जो अब उसे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने लगी। मूवी के बाद विरेन्द्र उसे घर छोड़ गया। बाद में वाट्सअप पर वह सुधा से लगातार सम्पर्क में रहने लगा।

इस घटनाक्रम को घटित हुए एक महीना हो गया था। लेकिन सुधा अभी तक कोई निर्णय नहीं ले पाई। उचित-अनुचित के बीच के अन्तर को पहचानना शायद इस मुकाम पर आसान नहीं था। एक असामान्य घटना ने सुधा के आसामान्य जीवन को सामान्य कर दिया था। उसकी बदलती सोच कुछ और सोचने पर विवश होने लगी, जिसे वह हमेशा दरकिनार करती आई थी। विरेन्द्र उसके जीवन में एक नई उम्मीद -उमंग जागृत कर गया जिससे उसके मन की कोमलता-संवदेनाओं को पुनजीर्वित होने का अवसर मिलने लगा। सुधा को लगता जैसे विरेन्द्र ने उसे एक सबक सिखा दिया है। वह एक स्त्री है और महिला की तरह उसमें भी भावनाएं हैं, विरेन्द्र इस तथ्य को समझाने में सफल हुआ।

सुधा को याद नहीं कि उसने कभी अपना बर्थ-डे मनाया हो। न जाने कैसे विरेन्द्र को उसके बर्थ-डे का पता चल गया। कितना खूबसूरत सरप्राईज दिया था विरेन्द्र ने। वो कई दिनों से जिद कर रहा था कि सुधा उसकी मिलिट्री कैम्प को देखने उसके साथ चले। काफी ना नुकूर के बाद आखिर सुधा ने हां कर दी। तारीख भी वहीं रखी जो विरेन्द्र चाहता था। तब भी उसे कुछ याद नहीं आया। जनवरी की 10 तारीख थी, विरेन्द्र सुधा को लेने घर आ गया। आज बड़े जोश में उसने सुधा के आगे अपना हाथ बढ़ाया । कुछ देर के लिए सुधा भौंचक्की रह गई लेकिन फिर उसने विरेन्द्र से हाथ मिला लिया। विरेन्द्र के शेकहैण्ड से सुधा को पुरुष की ताकत नारी पर कोमलता पर हावी होती महसूस हुई।

मिलिट्री की जीप ने सुधा को इस तरह ले जाया गया जैसे वह कोई शाही शख्सियत हो। जब उनकी जीप मिलिट््री एरिया में विरेन्द्र की यूनिट में प्रविष्ट हुई तो सुधा ने देखा उसके स्वागत की बड़ी जोरदार तैयारी की गई थी । सामने हॉल था जिसे बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया था। बीच में एक बड़ी टेबल पर एक बड़ा सा केक रखा था। हॉल में सुधा के प्रवेश करते ही हैप्पी-बर्थडे की गूंज सुनाई पड़ने लगी। उसको अचानक याद आया कि आज उसका जन्मदिन था। विरेन्द्र के साथी कमाण्डो ने उसे जोरदार सेल्यूट कर सलामी दी। आखिर वह विरेन्द्र की गर्लफ्रेंड है।” 

‘‘व्हाट? कैसी बात करते हो विरेन्द्र?” सुधा ने आश्चर्य से पूछा।

‘‘मैम, फ्रेण्ड का मीनिंग क्या है? जिससे हम अपने दिल की बातें शेयर कर सकें।

वो हमारी फीलिंग को समझ सके।

‘‘तो मैं तुम्हें क्यों अच्छी लगती हूं?” सुधा ने पूछा।

‘‘कहा ना आप बहुत सुंदर है, आपसे बात करने से मुझे इंस्पिरेशन मिलती है।

यहां मुझे आपसे बातकर ऐसा लगता है जैसे मैं अपनी मां के पास हूं।

विरेन्द्र की बातें सुधा को जीवन का वह सच समझाने लगीं जो शायद अभी तक उसने समझा नहीं था। यही उसके जीवन की परिणति थी। सुधा एक बात अच्छे से समझ गई थी। विरेन्द्र उसका दोस्त था, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन सुधा ने उसको उस रूप में कभी नहीं देखा जैसी पुरुषों में प्रायः कमजोरी होती है। विरेन्द्र बहुत आकर्षक व्यक्तित्व का धनी था। कमाण्डो के रूप में उसकी काबिलियत की धाक पूरी यूनिट में थी लेकिन विरेन्द्र की सबसे खूबसूरत खासियत उसका दिलो-दिमाग था। सुधा के जीवन को उसका सर्वश्रेष्ठ उपहार भी यही था कि उसने सुधा की सोच बदल दी थी। उसे मशीन की जगह नारी बना दिया था जिसमें भावनाओं की समझ और परिपक्व हो गई। इस बेमेल जोड़ी ने मानवीय रिश्तों-संबंधों को बदलकर रख दिया।

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