परावर्तन-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Paravartan

Hindi Kahani: गर्मी की छुट्टियों में सुबह-सुबह समुद्रतट पर रंगीन गुब्बारों के साथ दौड़ती मिताली को देख मन असीम आनंद से ओत-प्रोत हो गया। गौर से देखा तो उसके साथ सफेद कपड़ों में एक पुरुष भी भाग रहा था और दोनो के पीछे टहलती हुई दिखी नीति मिताली की माँ। मुझे देखते ही मुस्कुराई और मेरा परिचय कराया।
“ये सिद्धांत हैं मिताली के पिता और ये मिताली की क्लासटीचर !”
“अरे आप यूँ कहें कि ये आपके पति हैं” मैंने मुस्कुराकर उनका अभिवादन किया।
“पति-पत्नी ही थे जब तक नीति आपसे न मिली थी। अब हम सही मायने में माता-पिता हैं। हम दोनो को मिताली के प्रति जिम्मेदारियों का अहसास कराने और हमारी गृहस्थी बचाने के लिए आपका दिल से आभार!” इस बार सिद्धांत ने कहा।
“सच!आपसी विरोधों ने दिमाग खराब कर दिया था। मुझे तो पता ही ना चला कि मैंने ही इस मासूम के चेहरे की मुस्कान छीन ली थी। आपकी जितनी तारीफें करें कम है। आप जैसी शिक्षिकाएँ ही मोमबत्ती के समान स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में प्रकाश भरती हैं।”
“इतनी तारीफ न करें। मैंने तो अपना फ़र्ज़ निभाया।” नीति की बातें सुन मैं झेंप गयी तो यह कहकर निकल गयी। मुझे जो चाहिए था वह तो मिल ही गया था।
हँसिनी सी कुलाँचे भरती मिताली अपने माता-पिता को अपने दोनों हाथों से थामें जिस तरह से मेरी ओर देख रही थी उसकी नज़रों में वही आत्मविश्वास तो देखना चाहा था। आज उसकी खिलखिलाहट में संपूर्णता थी जिसे देखकर उन दिनों में खो गयी जब मैं उससे पहली बार मिली थी।
एक बेहद मासूम कली सी मिताली मात्र चार वर्ष की लड़की थी। जाने कैसे दिल के बहुत करीब आ गयी थी। नर्सरी स्कूल में काम करते हुए मुझे पंद्रह साल हो गये थे पर उसके जैसी बच्ची पहली बार मिली। ऐसे तो सभी बच्चे मासूम होते हैं पर वह अलग थी। चुपचाप बैठी रहती या ड्रॉइंग करती रहती। किसी से कोई बातचीत न थी उसकी। दूसरे बच्चे कोशिश करें तो उसकी नाराजगी देख दूर हो जाते थे। ये सेशन खत्म होने वाला था और सिर्फ मैं ही उसकी दोस्त थी। उसकी चिंता रहने लगी तो ग्रीष्मावकाश के पहले डायरी में लिखकर उसकी मम्मी को बुलाया।

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हमारी पूरे एक घंटे बातें हुईं जिस दौरान नीति ने बताया कि वह इससे पहले वह अमेरिका में थी। जब मिताली 2 वर्ष की थी तभी उसने अपना दूसरे बच्चे को जन्म देने के दौरान खो दिया। गर्भ में कुछ जटिलतायें पैदा हो गई थीं। सिद्धांत ने पत्नी की जान बचाने पर ज़ोर दिया मगर उस घटना के बाद वह उससे दूरियाँ बनाने लगा। नीति दोबारा गर्भ धारण कर अपना परिवार पूरा करना चाहती थी। अपने माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण जो अकेलापन उसने झेला था वह बेटी को नहीं देना चाहती थी पर पति दूसरे बच्चे के लिए उसके जीवन पर दांव खेलने के लिये हरगिज़ तैयार न था। इस तरह पूरे एक वर्ष तक लगातार जद्दोजहद के बाद भी दोनो का आपसी सामंजस्य न बन सका। पति-पत्नी में मतभेद इतने बढ़ गए कि नौबत तलाक़ तक आ गयी और वह मिताली को लेकर मायके विजयवाड़ा में रहने आ आई।
मुझे उसकी बातों को सुनकर बहुत अचरज नहीं हुआ। मिताली के खामोशी की असली वजह पता लग गयी थी। वैसे मुझे उसके मन की बात का अंदाज़ा था। मैंने स्कूल के कबर्ड से निकाल कर उसकी सभी ड्रॉइंग्स शीट्स सामने रख दीं। जहाँ वह मम्मी-पापा के साथ थी और बेहद खुश थी। बाद वाले ड्रॉइंग्स में माँ का हाथ पकड़े उदास थी। उसे मेरी बात समझ मे आई या नहीं ये कह नही सकती। इतनी तसल्ली थी कि मिताली की उदासी की असली वजह की ओर इशारा कर दिया था। जिस बच्ची से इतने कम समय में इतना लगाव हो गया था उसके दर्द को खोलकर रखना मेरा काम था सो कर दिया।

“मैं जो कहने जा रही हूँ वह बात आपको बुरी लग सकती है मगर मिसेज़ नीति मगर मैंने न कहा तो आपकी बेटी के मन की बात आप तक कौन पहुंचाएगा? पिछले दिनों आप पर क्या गुज़री और वह अनुभव कितना दुखद रहा है इस विषय में आपको पता होगा मगर आपकी बच्ची जिस अबोध उम्र में अवसाद से गुज़र रही है उसके लिए आप जिम्मेदार हैं। भले ही दूसरे बच्चे का मुद्दा मिताली के तनहाइयों को दूर करने का रहा हो पर अभी तो मुझे यह मसला अहं का लग रहा है। आप मिताली को देखें अभी इसके आगे लम्बा जीवन है। माना एक सिबलिंग होना चाहिए पर इस चाहत की पूर्ति न होने पर उसे उसके पिता से अलग कर उसकी कितनी बड़ी खुशी छीन रहीं हैं आप!”

आँखे बहने लगी थी हमदोनों की, मिताली को पहले ही मैंने प्ले एरिया में आया माँ के साथ भेज दिया था।
“आपने मेरी आँखें खोल दीं। अनहोनी से सिद्धांत भी डर गए थे तभी उन्होंने हम तीनों की भलाई देखते हुए खुद को सयंमित कर लिया। वैवाहिक जीवन की दूरियों ने मेरे अंदर असुरक्षा को जन्म दिया कि शायद अब मैं उन्हें पसन्द नहीं। उनकी चिंताओं को अपने अहं पर वार के रूप में लिया और तलाक के कागजात भिजवा दिए।”
“चलिए! ये तो अच्छी बात है कि आपसी बातचीत से गलतफहमी हट गई मिताली के हित में कुछ ज़्यादा बोल गयी तो क्षमा करें। आपके सुखी दाम्पत्य के लिए अवश्य प्रार्थना करूँगी ताकि मेरी स्टूडेंट मिताली को भी अन्य बच्चों की ही तरह हँसती-खिलखिलाती देख सकूँ।”
उस दिन भारी मन से विदा लिया था पर आज उस छोटे से परिवार की हँसी-खुशी ने जैसे मेरे सांसों में प्राण फूँक दिए थे। उन्हें खुश देखकर मैं जी उठी थी।
वैसे तो सभी बच्चे अच्छे लगते थे मगर मिताली के लिए मेरी फ़िक्र अलग ही थी। नीति ने मेरी बात का का मान रखकर असीम खुशी दी थी। उसने एक गलत फ़ैसले को बदलकर तीन जिंदगियों को बचा लिया। सच कहूं तो एक पिता के परावर्तन ने तीनों का जीवन परिवर्तित कर दिया था।
अंततः मेरा उद्देश्य पूरा हो गया। एक बागवान के समान अपने उपवन के फूलों को खुश देखने के लिए स्कूल खुलने की राह देखने लगी थी। प्यारी मिताली के बदले रूप से मिलने की उत्कंठा थी।