Hindi Kahani
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Hindi Social Story: अरे सुनो, भाभी  अभी सुबह-सुबह ही अपने मायके चली  गयी हैं पन्द्रह दिनों बाद आयेंगी ।
 उस घर का खाना देख लेना”,
प्रभात के इन शब्दों ने सुगना के ज़ख्मों की पपड़ी उतार दी जैसे
पापड़ी  बेलते-बेलते उसके हाथ कुछ ज्यादा तेज़  चलने लगे।
उखड़े स्वर में बोली क्या करूँ उनका आये दिन का राग है ,मुझे न साथ में चैन था और न अलग में बरसों बीत गये तन की भर गयीं , पर  मन की चोटें आज भी दुखती हैं।
तो क्या हुआ अगर बना दोगी चार रोटियाँ उस परिवार की,प्रभात बोला
जब साथ थी तब बेस्वाद बनाती थी,जब से अलग हुए तब से अन्नपूर्णा मैया ने अपनी करछी थमा दी मेरे हाथों में?
प्रभात मौक़े की नज़ाकत भाँपते हुए चुपचाप उधर से निकल गया।
बुद-बुद करके एक तरफ़ भगौने में चाय उबल रही थी और  उससे भी ज्यादा उबल रहा था सुगना का मन,
पानी में पड़ते गोल-गोल  बुलबले नन्हें भवँर की तरह  घूम रहे थे,उधर उसके मन में भी यादों के भँवर तेज़-तेज़ घूमने लगे।
पर उनमें भी उतनी शक्ति न थी कि , मन की कड़वी यादों को बहा ले जाते कहीँ।
सामने  डिब्बे में रखे मायके से आये लड्डू और आम पर उसका ध्यान बराबर गया पर प्रतिशोध और क्रोध की मात्रा बढ़ी होने का कारण उसने उन्हें देखकर भी अनदेखा कर दिया।
हाथ डिब्बे तक जाता पर ढक्कन तक पहुँचने से पहले ही कोई अदृश्य शक्ति उसे रोक देती।हारकर उसने अपना इरादा बदल दिया ।
गिलास में चाय छानते समय उसका ध्यान उसकी दीवारों पर पड़ा भाप अब नन्हीं बूँदों की शक्ल में उसका आकार ले चुकी थी।
उसने गिलास  जाकर आँगन में बैठी सास के पास ख़ामोशी से रख दिया,फिर बोली “अम्मा परेठा खइहो  का”
बूढ़े हाथों ने इशारे से मना कर दिया,वो धीरे धीरे थके कदमों से छत पर बनी रसोई में लौट आई,और लौट आया उसका मन भी, करीब बाईस बरस पहले ,तब वो सुगना नहीं  कच्ची छत पर  हल्दी लगी सुग्गो थी।
अपने नाना नानी के साथ  बैठी  उनसे मिलने अनुभव शिक्षा के रूप में  ग्रहण कर रही थी।
नाना ने उसके कंकन बंधे  पीले हाथ को अपने हाथ में लेकर कहा,बिटिया अब तुम दुई कुल की लाज बनने जा रही हौ।
रसोई बनाना तो पँक्ति भेद न करेओ कभी”
उसने अचरज से  उनकी ओर देखा,इतने गूढ़ अर्थ उसकी समझ में भला आते भी तो किधर से।
उसके मन की उलझन को समझ ,मीठी मुस्कान से नाना से उत्तर दिया ,जो रसोईघर में बने वो सबको मिले,तेरा हाथ भरा पूरा रहेगा।
अन्नपूर्णा की यही तपस्या गृहणी को गृहलक्ष्मी बनावत है बिटिया।
सुग्गो से सुगना का सफ़र तो एक रात के मन्त्रों  और सात फेरों ने तय कर दिया,और उससे भी ज्यादा यह कि रसोई में सबको  एक सा भोजन देने के लिये उसे ही सबसे ज्यादा कोसा जाता।
जेठानी जहाँ रसोई में सबके खाने के बाद  अपने पति को अलग से छौंक बघार कर दाल और अलग अलग व्यंजन बनाती,उससे कभी ऐसा  हुआ ही नहीं।
उसकी आँखों के आगे घूम गया बर्तन धोने वाली गुड्डी दीदी के मासूम ऋषभ का चेहरा ,जिसे उसके हाथ के बनाये कटहल को कोफ़्ते बड़े पसन्द थे।
रात को बर्तन माँजने से पहले गुड्डी ने अपने बेटे को  दो रोटी सब्ज़ी देने को कह दिया।
उसने जेठानी से पूछकर ही उस बच्चे को खाना परोस दिया।पर अम्मा के तानाशाही रवैये और जेठानी के चुगलखोर स्वभाव ने उसे एक बार फिर दोषी बना दिया।
प्रभात अक्सर कहता भाभी अपने पति का कितना ध्यान रखती है और तुम मेरे साथ क्या कर रही हो, एकदम बेकार औरत हो,
अकेले में वो पूछ भी बैठती ,”बताओ किसका पेट काट लूँ मैं।”
बूढ़े सास ससुर या तुम्हारे भाई भतीजों का किससे दुभाँति कर लूँ,प्रभात निरुत्तर हो जाता
धीरे धीरे अम्मा की तानाशाही और डलहौज़ी नीति फूट डालो और राज करो ने घर में पहले कलह बढ़ाई फिर झगड़े।
फिर एक दिन भाई में मारपीट से बात बढ़कर स्त्रियों चली गयी,उस दिन मात्र चूल्हे अलग नहीं हुए थे।
 आँगन में दीवार भी खड़ी हुई थी,पहली बार बहुओं पर राज करने ,उनपर मनमानीकरने वाली अम्मा की हार हुई थी।
षडयंत्र में निपुण जेठ जेठानी अम्मा को छोड़ने को तैयार न थे ,और सरलमना सुगना उन्हें पुनः पहले सा मन न दे पाई,
पर उनकी अवज्ञा होने पर  रोटी देने की तपस्या में कोताही भी न कर सकी ,मन में गाँठ पड़ जाये तो मवाद बढ़ता ही जाता है।
तब तक उसकी बिटिया बोली मम्मी  पापड़ी चाट बनाओ न ,अचानक मन के घोड़े थमकर कहीं गुम हो गये।


हाँ अभी लो कहकर सुगना ने आलू की चाट बनाना शुरू कर दिया।,
थाली में आलू के कटे टुकड़ों में नमक मिर्च ,नींबू चने धनिया मिर्च ,खट्टी मीठी चटनी के साथ नायलॉन सेव की बरसात यूँ लग रही थी,मानों जिन्दगी का हर रँग हर स्वाद प्लेट में बिखर गया हो ।
बिटिया पापड़ी सँग आलू चाट ,चटखारे लेकर खाने लगी,मम्मी आप भी खाओ न ,अम्मा बहुत लड़ती हैं आपसे उन्हें मत देना,बेटी ने कान उसके  में फुसफुसाकर कहा।
सुगना ने तश्तरी में अपने लिये सब सजा लिया ,हाथ मुँह की ओर जाने को बढ़ा भी ,
पर न जाने कहाँ से नाना की आँखे उसके चेहरे पर जम गयीं,सुग्गो पँक्तिभेद मत करना।
रसोई पर अतिथि,भिखारी,कौआ कुत्ता ,चींटी तक का अधिकार होता होता है ,अन्नपूर्णा की यही तपस्या है,कानों में उनकी आवाज़ गूँजने लगी।
हाँ उसके होंठों से अकस्मात निकला मानो उसकी
तपस्या को अँतिम पलों में भँग होने से पहले किसी ने रोक लिया हो।
वह अकस्मात उठी ,नई तश्तरी में सब लगाकर सास के पास ले जाकर बोली ,अम्मा तुम्हारी पसन्द की पापड़ी चाट बनाई है थोड़ी देर हो गयी।
शौक़ीन अम्मा की आँखों और मुँह दोनों में पानी आया ,पछतावे और स्वाद का,उधर सुगना की आँखों में भी आँसू छलक उठे थे,अपनी आँखों में गिरने के अपराध से बचने के।
सहसा ऊपर भाग गई,बिटिया ने पूछा मन नहीं था तो क्यों दे आईं,लाड़ो बाबा की श्राद्ध में पण्डित और कौए को खिलाने से नहीं जानती उन्हें मिलता है या नहीं।
पर इन्हें तो मिल रहा है ये मैं भी देख रही और तू भी आज मैं पँक्तिभेद के पाप से बच गयी।