chutakee kee soojh
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

जयपुर का रेलवे स्टेशन। शाम का समय। बड़ी चहल पहल थी। चुटकी अपने मम्मी-पापा के साथ चटर-चटर बोलती चली जा रही थी। उसकी ममेरी बहन तन्वी भी उसके साथ थी। लेकिन वह तो चुपचाप चल रही थी। कभी इधर देखती, कभी उधर देखती।

चुटकी चहचहाती एवं फुदकती चिड़िया की तरह अपने पापा को अपने अनुभव सुना रही थी। कितनी अच्छी जगह है मांउट आबू। कितना बड़ा आश्रम। कितने सारे लोग अपनी-अपनी तरह से काम करते हुए। उसने जिज्ञासावश पूछा, “पापा, पहाड़ पर इतने बड़े आश्रम क्यों नहीं होते?”

“पहाड़ में भी होते हैं। क्या तुम नहीं जानती कि साधु संत, तापस-तपस्वी सभी पहाड़ की कन्दराओं में बैठ कर ही तो अपनी समाधि या ध्यान लगाते हैं। और वह पालमपुर के नजदीक वाला कण्डबाड़ी में स्थित आश्रम नहीं देखा तूने? कहते हैं आश्रम के गुरु जी की उम्र चार सौ वर्ष है।”

“पापा, आप डॉक्टर हैं? फिर भी ऐसा मानते हैं। यह तो एकदम झूठ है।” चुटकी ने पापा की खिल्ली उड़ाते हुए कहा। वह फिर बोली, “जो मांउट आबू के आश्रम में डॉक्टर अंकल हैं, वह जर्मनी में अपनी नौकरी छोड़ आए और यहां सेवा करने लगे। क्या आप भी अपनी नौकरी छोड़ देंगे?”

“सभी तो नौकरी नहीं छोड़ सकते। मैं नौकरी छोड़ दूं तो तुम्हें और तुम्हारे भाई को कौन पालेगा, कौन पढ़ाएगा तुम्हें?”

“तो उन्होंने क्यों छोड़ी?”

“यह उनसे पूछो न।”

“अच्छा” कहकर चुटकी चुप हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या गोरख धन्धा है। ब्रह्मकुमारियों का इतना बड़ा आश्रम और उसमें इतने लोग। बड़ी-बड़ी मशीनें, आटा गूंधने वाली और रोटियां पकाने वाली। जब चाहो जूस पी लो, चाहो तो दूध पी लो। सब कितना अच्छा है। उसने सोचा।

स्टेशन पर कोई चाय पी रहा था, कोई जल्दी-जल्दी आलू पूरी खा रहा था। लेकिन चुटकी तो अपने अनुभव चटखारे लेकर सुना रही थी। पापा ने कहा, “जल्दी-जल्दी चलो, हम पहले ही लेट हैं। तन्वी तुम सामान का ध्यान रखो और कुली अंकल के साथ-साथ चलो।”

तभी माइक पर एक घोषणा हुई- “सभी यात्री ध्यान दें। दिल्ली को जाने वाली जोधपुर एक्सप्रैस गाड़ी एक नम्बर प्लैटफार्म की बजाए अब प्लैटफार्म नम्बर चार पर आ रही है।”

एकदम भगदड़ मच गई। सीढ़ियां चढ़कर फिर चार नम्बर पर उतरना था।

चुटकी अपनी ही धुन में आगे चलती गई। उसे पता ही नहीं चला कि वह कब अपने मम्मी-पापा से अलग हो गई है। ऐसा देखते ही वह रोने लगी। उसकी आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगे। उसने सुन रखा था कि बच्चे उठाने वाले लोग ऐसे अलग-थलग बच्चों को उठाकर ले जाते हैं। अभी तक तो वह बड़ी-बड़ी बातें कर रही थी। परन्तु अब एकदम रोने लगी। डर गई थी वह। इतनी भीड़ में कहां ढूंढे अपने माता-पिता को। वह फफककर रोने लगी। आस-पास के लोगों ने उसे दयालु आंखों से देखा लेकिन अपनी-अपनी गाड़ी की तलाश में आगे बढ़ गए। वह कभी आगे जाती और कभी पीछे मुड़ कर देखने लगती। अब उसे कोई भी चीज अच्छी नहीं लग रही थी।

वह बेबस होकर गिरने ही वाली थी कि उसे पुलिस का सिपाही दिखाई दे गया। उसकी जान में जान आ गई। उसे याद आया कि एक बार पुलिस वाले अंकल उनके स्कूल में आए थे और उन्होंने पुलिस के बारे में बताया था कि कभी भी कोई समस्या हो तो पुलिस को बतानी चाहिए। पुलिस जनता की सुरक्षा और सेवा के लिए होती है। चुटकी ने हिम्मत बांधी और पुलिस अंकल से बोली, “अंकल मैं अपने मां-बाप से बिछुड़ गई हूं। वे अभी मेरे साथ थे। आप मुझे अपना फोन दोगे?”

पुलिस वाला स्थिति को समझ गया। उसने प्यार से कहा, “बेटी घबराओ नहीं। यह लो फोन और अपने पापा का फोन मिलाओ। मैं माइक पर घोषणा भी करवा देता हूं।”

चुटकी ने डरते-डरते अपने पापा का फोन मिलाया और कहा, “पापा, मैं यहां हूं पुलिस अंकल के पास, एक नम्बर प्लेटफार्म पर। आप आ जाओ।”

तभी उसके पापा दौड़ते-दौड़ते आए और चुटकी उनसे लिपट गई। वह जोर-जोर से रोने लगी।

पापा ने कहा, “चुटकी पहले पुलिस अंकल का धन्यवाद करो जिन्होंने तुम्हें हमसे मिलवाया है।”

पुलिस के सिपाही ने कहा, “यह तो बड़ी समझदार बच्ची है जो सहायता के लिए मेरे पास आ गई। इसकी सूझबूझ ने ही इसे बचाया है। आगे से यह अपना और ध्यान रखेगी। हम तो हैं ही जनता की मदद के लिए।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’