Hindi Story: बस एक चुटकी सिंदूर और पल भर में रिश्ते बदल जाते हैं।
वही जो एक अजनबी था कभी, सबसे अजीज बन जाता है।
जिसके लिए और जिसके साथ पूरी जिंदगी साथ चलने की कसम खानी पड़ती है और हर पल अपनी परीक्षा भी देनी पड़ती है।
ऐसे ही एक कहानी में आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रही हूं जो की पूरी तरह से काल्पनिक है।
पहाड़ों की बहन पठार यानी कि छोटानागपुर का ग्रामीण अंचल…का एक क्षेत्र -चंबा ,जहां बचपन से मैं इस परिवेश में पला और बढ़ा क्योंकि मेरे पिता बैंक में थे और उनकी ट्रांसफरेबल जॉब थी।
उन्हें चंबा इतना अधिक पसंद आ गया था कि उन्होंने वहीं पर जमीन खरीदा और वही सारी जिंदगी रह गए।
वैसे भी झारखंड बहुत ही खूबसूरत जगह है। हरे भरे पेड़, झरने, नदी, तालाब, पहाड़ पठार क्या नहीं है वहां !!
और उससे भी ज्यादा वहां के सीधे-साधे भोले भाले लोग।
चंबा में जब पापा गए थे तब मेरी उम्र मुश्किल से 10– 11 साल रही होगी ।
हमारा स्कूल जिसमें लड़के लड़कियां दोनों पढ़ते थे, वही पापा ने मेरा नाम लिखवा दिया।
चंबा पब्लिक स्कूल में और मेरा भाई दोनों साथ में ही जाते थे।
मेरे क्लास में कई लड़कियां भी पढ़ती थीं मगर “उसकी” आंखें हमेशा कुछ कहती थी।
जबकि मैं बचपन के ही दायरे में था फिर भी न जाने क्या कशिश थी उसकी आंखों में! मैं हमेशा ही खिंचा सा चला जाता था। कभी वह स्कूल नहीं आती तो मैं उसके लिए नोट्स बनाया करता। उसे जाकर दिया करता था।
खेल के समय भी में जाकर उसके साथ खेलने लगता तो मेरे टीचर्स आकर मुझे डांटने लगते
” क्यों अनिमेष,तुम्हारे पास लड़के नहीं है क्या तुम लड़कियों से दोस्ती क्यों करते हो?”
फिर मैं खिसियानी हंसी के साथ आकर अपने दोस्तों को के साथ खेलने लगता था।
लेकिन हमारी यह दोस्ती बरकरार रही क्योंकि वह और उसके परिवार वाले हमारे घर में आना-जाना करते थे।
उसके पिताजी कॉलेज के प्रोफेसर थे। उसके तीन भाई बहन थे।
वह सबसे छोटी थी। बहुत ही खुश मिजाज।
” पुष्पा…!!!!” जब भी मैं उसे बुलाया करता वह मुस्कुरा कर मुझे देखा करती थी।
बिल्कुल ही नाम के अनुरूप, फूलों की तरह खूबसूरत थी।
बड़ी-बड़ी आंखें, काले घुंघराले बाल, चेहरे का गेहुंआ रंग, बड़ी ही निश्चल मुस्कुराहट!
न जाने कैसे वह मेरे दिल में उतरती चली गई। जैसे-जैसे में जवानी के आगोश में बढ़ता गया मेरे मन मस्तिष्क में पुष्पा बसती चली गई ।
मेरे मन में उसके अलावा कोई और थी ही नहीं ,ना ही मैं कभी उसके बिना जीने की कल्पना भी कर सकता था!
लेकिन चंबा एक बहुत ही छोटा शहर था जहां प्रेम और प्यार किसी अपराध से कम नहीं था इसलिए मेरे मन की बात मेरे मन में ही रह गई।
धीरे-धीरे हम दोनों बड़े होते चले गए।
वह दूसरे शहर में जाकर कॉलेज करने लगी क्योंकि चंबा में बहुत अच्छा कॉलेज नहीं था ।
मेरे पिता की हार्दिक इच्छा थी कि मैं डॉक्टर ही बनूँ। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए मैंने कई एंट्रेंस एग्जामिनेशन दिए और निकाल भी लिया फिर मैं दिल्ली एम्स से मेडिकल पढ़ने लगा।
मेरी इच्छा बिल्कुल भी चंबा जाने की नहीं होती थी क्योंकि मुझे कहीं ना कहीं डर लगा रहता था कि पुष्पा की शादी किसी और से हो जाएगी और मैं इस सिचुएशन को फेस नहीं कर पाऊंगा! इसलिए मैंने धीरे-धीरे वहां आना-जाना ही कम कर दिया।
पढ़ाई के नाम पर फिर जॉब के नाम पर..!
बहुत दिनों बाद मां ने बताया पुष्पा की शादी तय हो गई है। उसके मम्मी पापा तुम्हें खोज रहे थे। तू छुट्टी लेकर आएगा क्या?”
” क्या बात कर रही हो मां!, भला पुष्पा की शादी में मैं आकर क्या करूंगा ?”
अपनी भीगे हुए आंखों से मैंने मां से कहा।
मां को क्या पता मैंने क्या खो दिया..! मेरा मन टूट गया था।
मैंने अपने आप को पढ़ाई में पूरी तरह से झोंक दिया।
जब फाइनल राउंड में कैंपस में मेरा सिलेक्शन हो गया तो मुझे बड़ा ही अच्छा लगा। मैं मसूरी के एक अच्छे से अस्पताल में सीनियर डॉक्टर के रूप में काम करने लगा था।
माता-पिता की उम्र भी हो रही थी।मां पापा चाहते थे कि मेरा घर बस जाए।
मगर मेरा टूटा हुआ दिल कुछ भी गवारा नहीं कर पा रहा था।
मां ने कई बार मुझसे कहा
“अनु,अगर तुम्हें कोई पसंद है तो मुझे बता दे मैं उसे ही घर बहू बनाकर ले आऊंगी। मुझे कोई आपत्ति नहीं।
लेकिन बेटा इतना पढ़ लिखकर, इतनी अच्छी तन्ख्वाह लेने वाला लड़का शादी के नाम से क्यों भागता है? क्या कमी है तुझमें.. मुझे बता?”
” मां ,कोई कमी नहीं है मगर मैं शादी कर किसी लड़की के साथ अन्याय नहीं करना चाहता।
कभी मां को शक हो जाता “कहीं ऐसा तो नहीं कि तुझे किसी से प्यार था..!” मैं जवाब टाल दिया करता था।
बहुत दिनों बाद दीपावली में मां ने कहा
“बेटा,कई बरस बीत गए हैं।एक अरसे से तुम त्योहार पर नहीं आए हो।तुम आओ इसबार।”
“ठीक है मां!”
समय हर जख्म का इलाज होता है। मैं भी सबकुछ भूलकर छुट्टी लेकर गांव चला गया।
कुछ वैसे ही था ,कुछ बदल भी गया था। मगर मेरा घर अभी भी बाहें फैला कर मेरा इंतजार कर रहा था।
मेरी आंखों में आंसू आ गए।
” मां ,सब कुछ वैसे ही है? शर्मा अंकल आंटी!”
” हां बेटा ,सब कुछ वैसे ही है। कुछ बदल गया है। कुछ नया बन गया ।कुछ पुराने लोग यहां से चले गए बाकी सब कुछ वैसा ही है। कल तुम घूम कर आओ ना! घर पर क्यों बैठे रहते हो?”
” हां मैं तो आज ही घूमने जाता हूं ।”
“ठीक है बेटा, जाओ।”
वहीं मंदिर था, जहां जाकर मैं हर दिन जाकर घंटी बजाकर पूजा किया करता था।
आज न जाने मेरे पैर उधर कैसे उठ गए थे और मैं उधर ही चला गया ।
मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैं पुरानी बातें याद कर रहा था।
किसी बहाने से पुष्पा भी रोज आया करती थी मंदिर में प्रणाम करने के लिए और मैं भी इधर से जाया करता था।
आंखों आंखों में हम दोनों में कुछ बातें हो भी जाया करती थी और एक दूसरे को देखकर हम मुस्कुरा दिया करते थे।
न जाने कितनी उमंगे थी और हर कुछ ऐसा लगता था जैसे मेरी मुट्ठी में आ जाएगा!
मगर आज हर कुछ फिसल गया है। पुष्पा तो अपने घर में मगन होगी! अपने बाल बच्चों के साथ खुश!
कभी मुझे हिम्मत भी नहीं पड़ती पूछने की कि पुष्पा की शादी कहां हुई और किसके साथ हुई?”
तभी मेरी नजर सामने पड़ी। एक सफेद साड़ी पहनी हुई पतली दुबली सी लड़की पर।
वह आंखें मैं कभी नहीं भूल सकता!
” यह तो पुष्पा है? अरे!मगर यह सफेद साड़ी में कैसे?” मेरा दिल धक से कर गया।
” पुष्पा ?”मेरे आवाज देने पर उसकी आंखों में आंसू आ गए।
” हां अनिमेष बोलो ?”
“पुष्पा.. मैं तो तुम्हें पहचान ही नहीं पाया…!”
“मगर मैंने तो तुम्हें पहचान ही लिया था ।
तुम्हें पहचान में कितनी देर लग गई?” उसने उलाहना देते हुए कहा।
मैं अवाक उसका चेहरा देखता रहा ।
मैंने कहा
” पुष्पा, यह सब क्या है? तुम यह सफेद कपड़े…?” मैंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।
“नियति है अनिमेष!भाग्य का लिखा हुआ। अब तो आदत पड़ गई है।”
“यह कब हुआ?”
” तीन साल पहले!”
” ओह..और तुम्हारे बच्चे?”
“एक बेटी है। आओ ना घर, मम्मी पापा बहुत खुश होंगे।”
“हां जरूर, मेरा दिल पहले से टूटा हुआ था। एक बार फिर से टूट गया।
कभी मैंने यह नहीं सोचा था कि पुष्पा मुझे इस रूप में कभी मिलेगी भी!” मेरी आंखों में आंसू आ गए।
मैं घर आया। अपनी मां से पूछा
” मां, पुष्पा के साथ क्या हादसा हुआ था ?”
“पुष्पा के साथ! अरे, वह तुम्हें कहां मिली ?”
“मंदिर में!, आज जब मैं मंदिर गया तो वह मंदिर में आई थी। मैं सदमे में आ गया।”
” अरे क्या बताऊं बेटा, लो चाय पियो ।बड़ी ही बदकिस्मत है वह बच्ची।
बड़ी धूमधाम से शर्मा जी ने उसका ब्याह किया था। लड़का भी बहुत अच्छा था। परिवार भी बहुत अच्छा दिखता था मगर उन लोगों ने कितनी चालाकी दिखाई। लड़के को दिल की बीमारी थी उन लोगों ने छुपा दिया।
उसे दिमाग में ट्यूमर था, उसे छुपा दिया जबकि वह कैंसर बन चुका था।
शादी के तीन साल भी नहीं हुए थे कि कैंसर अपनी असलियत में आने लगा और दिल की बीमारी के कारण उसका पति नहीं झेल पाया और उसकी मृत्यु हो गई।
एक साल की छोटी सी बच्ची उसकी गोद में थी।
ससुराल वालों ने पति के मृत्यु के बाद ही अपने रंग बदल दिए ।वह तो यहां आना ही नहीं चाहती थी अपने बच्ची के साथ पूरी जिंदगी काटना चाहती थी लेकिन उसके सास ससुर मिलकर उसे हरिद्वार विधवा आश्रम भेजने वाले थे।
जब शर्मा जी को पता चला तो वह जाकर अपनी बेटी और नतनी दोनों को उठाकर ले आए। तब से बेचारी यहीं रह रही है। बड़ी दुखियारी है।
अब शर्मा जी रिटायर कर गए हैं। भाई भाभी का बर्ताव बहुत अच्छा नहीं है।
पुष्पा स्कूल में पढ़ाती है और किसी तरह से अपनी और अपनी बच्ची को पाल रही है।”
” मां यह तो बड़ा बुरा हुआ।”
” हां बेटा, क्या करेगा… नियति है। भगवान की इच्छा के आगे किसकी चलती है?”
दूसरे दिन मैं उठकर शर्मा अंकल और आंटी के घर चला गया।
वह दोनों मुझे देखकर ऐसे खुश हुए जैसे कि सगे मां बाप हों।
उन्होंने पुष्पा को आवाज देकर कहा “पुष्पा देखो कौन आया है ?”
पुष्पा अंदर से दौड़ती हुई आई
“अरे अनिमेष!तुम यहाँ।” वह मुस्कुरा तो रही थी लेकिन उसकी आंखों का सूनापन बरकरार थी।
उसकी आंखों में अब वह उमंगें नहीं थीं जो होनी चाहिए थीं ।
“भला, भरी जवानी में बेचारी पुष्पा कैसी गमगीन हो गई है!”मैं सोचने लगा।
“जा बेटा, चाय बना कर ले आ।” शर्मा आंटी ने कहा।
” हां ठीक है ।”यह कह कर पुष्पा चाय बनाने के लिए चली गई।
” आंटी, अंकल!, यह कैसे हुआ?”
” पता नहीं बेटा, हमारी किस्मत खराब थी ।आंटी रोने लगी,
अब तो बड़ी चिंता होती है। तुम्हारे अंकल भी रिटायर कर गए हैं और हमारी जिंदगी का क्या ठिकाना !
कल को क्या होगाऔर अरुण अपना परिवार संभालेगा कि इसे संभालेगा!
और इसके साथ एक बच्ची भी है, उसका क्या होगा? बड़ी चिंता लगी रहती है !”
“आंटी आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है।मैंने कहा
” बस एक चुटकी सिंदूर, किसी की किस्मत बदल देती है ,किसी की पहचान बदल देती है ।
मैं पुष्पा से शादी करूंगा।”
” यह तुम क्या कह रहे हो ?शर्मा आंटी घबराते हुए बोलीं ” तुम्हारी मम्मी सुन लेंगी तो नाराज हो जाएंगी।”
“क्यों आंटी! क्यों नाराज होंगी।
किस किताब में ऐसा लिखा है कि किसी विधवा से शादी करना कोई अपराध है?
क्या मुझे अपने समाज को बदलना है या अपने आप को बदलना है ।
अपनी सोच को बदलना है। मैं अपनी मां से को मना लूंगा आप चिंता मत कीजिए।”
शर्मा आंटी और अंकल दोनों की आंखों में आंसू आ गए।
मैं घर आया। अपनी मां से दृढ़ता से कहा “मां, आप चाहती है ना कि मेरा घर बस जाए !”
“हां बेटा, मां की आंखें चमक उठी.. तूने लड़की पसंद कर लिया।”
” हाँ मां, मैंने लड़की पसंद कर लिया।”
” कौन है वह?”
” पुष्पा!”
” पुष्पा???” मां एक बार हड़बड़ा गई। यह तू क्या कह रहा है ?वह तो एक बच्ची की मां है!!”
” तो क्या हुआ मां।हमारा यह समाज कितना रूढ़िवादी है, कितना संकुचित सोच है!
एक चुटकी सिंदूर एक लड़की का भाग्य बदल देता है अगर उसकी माथे पर सिंदूर नहीं है तो वह बेचारी हो जाती है.. ना घर की रहती है ना घाट की!
मां मुझे इस सोच को बदलना है। मुझे पुष्पा से ही शादी करनी है।
मैं उसे ऐसे घुटकर मरते हुए नहीं देख सकता!
मुझे अपनी मां को थोड़ा समझाना पड़ा।
मम्मी पापा को भी पता था पुष्पा एक बहुत ही सुलझी हुई अच्छी संस्कारी और घरेलू लड़की है और उसका घर बस जाए तो उसे अच्छी बात और क्या हो सकती है।
मां पापा दोनों ने हाथों में शगुन के लिफाफे और मिठाई के डिब्बे लेकर जाकर शादी पक्की कर आए।
बहुत ही सादगी के साथ मंदिर में फेरे लेने के बाद मैं पुष्पा की मांग में सिंदूर भर दिया।
अब वह मेरी थी हमेशा के लिए…!
यह सिंदूर एक सुदृढ पहचान है.. मेरी…एक ढाल जो मैं हूँ अपनी पत्नी के साथ…!
