पड़ोसिन - गृहलक्ष्मी की कहानियां

सोचा था, नवीन माधव को किसी प्रकार भी दल में खींच नहीं सकूँगा, इसलिए उस दिन कुछ अधिक गर्माहट से बातें की थीं। पर अचानक देखा, मेरे भाषण के अंत में नवीन माधव ने एक गहरी उसाँस भरकर मेरी सारी बातें मान लीं, बाक़ी और भी बहुत-सी अच्छी-अच्छी बातों के कहने का अवसर ही नहीं दिया।

एक सप्ताह के बाद नवीन ने आकर कहा, “तुम यदि सहायता करो तो मैं एक विधवा से विवाह करने के लिए तैयार हूँ।”

मैं इतना खुश हुआ कि मैंने नवीन को गले गला लिया और बोला, “इसमें जितने रुपए ख़र्च होंगे, मैं दूँगा।”

तब नवीन ने अपना इतिहास बताया।

तब मैं जान पाया कि उसकी प्रियतमा काल्पनिक नहीं है। कुछ दिनों से एक विधवा स्त्री से वह दूर से ही प्रेम करता, किसी के सामने उसने यह प्रकट नहीं किया है। जिस मासिक पत्रिका में ‘नवीन’ उर्फ़ मेरी कविताएँ प्रकाशित होतीं, वे पत्रिकाएँ यथास्थान पहुँच जातीं। कविताएँ बेकार नहीं गईं। बिन मिले चित्त-आकर्षण का एक उपाय मेरे बंधु ने ढूँढ़ निकाला।

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पर नवीन का कहना है कि उन्होंने किसी षड्यंत्र से यह सारे कौशल नहीं अपनाए हैं। यहाँ तक कि उन्हें विश्वास था कि विधवा पढ़ना नहीं जानती। वे विधवा के भाई के नाम पत्रिका बिना हस्ताक्षर किए, बिना मूल्य के ही भेज देते। यह केवल मन को सांत्वना देने का एक पागलपन मात्र था। मन में आता, देवता के उद्देश्य से पुष्पांजलि अर्पित की गई, वे जाने या न जानें, ग्रहण करें या न करें।

अनेकानेक बहानों से विधवा के भाई के साथ नवीन ने जो मैत्री स्थापित कर ली थी, नवीन कहते हैं, उसमें भी कोई उद्देश्य नहीं था। जिससे प्यार किया जाता है, उसके निकटवर्ती परिजनों का संग भी मधुर लगता है।

आख़िरकार उसके भाई के कठिन रोग को लेकर बहन के साथ कैसे मुलाक़ात हुई, वह लंबी बात है। कवि के साथ कविता आधारभूत विषय का प्रत्यक्ष परिचय होने से कविता के संबंध में बहुत सारी आलोचनाएँ हो गई हैं। आलोचना केवल कुछ छपी कई एक कविताओं में बद्ध हो, ऐसा भी नहीं।

हाल ही में मेरे साथ तर्क में परास्त होकर नवीन उस विधवा से मिलकर विवाह का प्रस्ताव दे बैठा था। पहले-पहल तो किसी भी तरह सहमति नहीं मिली। तब नवीन ने मेरे मुँह से निकली सारी युक्तियों का प्रयोग कर और उसके साथ अपनी आँखों के दो-चार बूँद पानी मिलाकर उसे बिलकुल हरा दिया। अब विधवा के अभिभावक फूफा कुछ रुपए चाह रहे थे।

मैंने कहा, “अभी लो।”

नवीन बोला, “इसके अतिरिक्त विवाह के बाद पहले पाँच-छह महीने तक पिताजी अवश्य ही मासिक ख़र्चा-पानी देना बंद कर देंगे, तब तक के लिए हम दोनों का ख़र्चा जुटाना होगा।”

मैंने बिना कुछ बोले चेक काट दिया। कहा, “अब उनका नाम तो बताओ मेरे साथ जब कोई होड़ ही नहीं, तब परिचय देने में कोई भय नहीं। मैं तुम्हारी देह छूकर सौगंध खाता हूँ कि मैं उनके नाम पर कविता नहीं लिखूँगा, और अगर लिखी भी तो उनके भाई को न भेजकर तुम्हारे पास भेज दूँगा।”

नवीन बोला, “अरे, उसके लिए मैं डराता नहीं। विधवा-विवाह की लज्जा से वे अत्यंत कातर हैं, इसीलिए तुमसे उनके बारे में आलोचना करने के लिए उन्होंने बहुत मना कर दिया था। लेकिन अब ढँक रखना मिथ्या है। वे तुम्हारी ही पड़ोसिन हैं, उन्नीस नंबर घर में रहती हैं।

मेरा हृत्पिण्ड अगर लोह का बाल होता तो एकबारगी धमाके से फट जाता। मैंने पूछा “विधवा-विवाह में उनकी अस्वीकृति नहीं है?”

नवीन ने हँसकर कहा, “हाल में तो नहीं।”

मैंने कहा, “केवल कविता पढ़कर ही वे मुग्ध हैं।”

नवीन बोला, “क्यों, मेरी वे कविताएँ तो कुछ बुरी नहीं हैं।”

मैंने मन-ही-मन कहा, ‘धिक्कार है!’

किसे धिक्कारा?

उन्हें, न अपने को और न विधाता को?

लेकिन धिक्कार है!

1. बंगाल में विवाह के तीसरे दिन ससुराल में नवदंपती का फूलों से सजी शय्या पर प्रथम शयन अनुष्ठान-सुहाग रात।

-रविंद्रनाथ टैगोर

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