पड़ोसिन - गृहलक्ष्मी की कहानियां

नवीन विस्मय के साथ कहता, “ठीक यही बात मैं कहना चाहकर भी कह नहीं पाता था। पर तुम्हारे पास ये सारे भाव कहाँ से आ जुटते हैं?”

मैं कवि के समान उत्तर देता, “कल्पना से। कारण सत्य नीरव कल्पना ही घटना मुखर है। सत्य-भाव स्रोत को पत्थर के समान दबाए रखती है, कल्पना ही उसके पथ को उन्मुक्त कर देती है।”

नवीन ने गंभीर चेहरा बनाकर कुछ सोचकर कहा, “ऐसा ही तो देख रहा हूँ। ठीक ही है।” फिर कुछ देर तक सोचने के बाद बोला, “ठीक, बिलकुल ठीक।”

पहले ही कह चुका हूँ कि मेरे प्रेम में एक कातर संकोच था, इसलिए अपनी क़लम से किसी भी तरह कुछ नहीं लिख पाया। नवीन को पर्दे की तरह बीच में रखकर ही मेरी लेखनी मुँह खोल सकी। ये लेख मानो रस से भरपूर गर्मी से फटने लगे।

नवीन बोला, “यह तो तुमने ही लिखा है। तुम्हारे नाम से प्रकाशित करूँ?”

मैंने कहा, “ख़ूब कहा। यह तो तुम्हारा ही लेख है, तुम्हारे नाम से प्रकाशित करूँ?”

क्रमशः नवीन की भी यही धारणा बनी।

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ज्योतिर्विद जैसे नक्षत्रोदय की प्रतीक्षा में आकाश की ओर ताकता रहता है, मैं भी वैसे ही बीच-बीच में अपने पास के घर की खिड़की की ओर ताकता, मैं इस बात से अस्वीकार नहीं कर सकता। भक्त का वह व्याकुल दृष्टिपात कभी-कभी सार्थक भी होता। उस कर्मयोगरता ब्रह्मचारिणी के सौम्य मुखश्री से शांत स्निग्ध ज्योति प्रतिबिम्बित हो क्षणभर में मेरे समस्त चित्तक्षोभ का दमन कर देती।

लेकिन उस दिन सहसा ही यह क्या देखा! मेरे चंद्रलोक में अभी भी अग्नि उत्पात शेष है। वहाँ के जन्य शून्य समाधिमग्न गिरिगुफा में समस्त वह्निदाह क्या अभी भी संपूर्ण निर्वापित नहीं हुई है।

उस दिन वैशाख की दोपहरी में आकाश के उत्तर-पूर्व कोने में बादल सघन होते जा रहे थे। उस आसन्न झंझा के मेघ विच्छुरित रुद्र दीप्ति में मेरी पड़ोसिन अपनी खिड़की पर अकेली खड़ी थी। उस दिन उसकी शून्य निविष्ट घनी काली दृष्टि में कैसी सुदूर प्रसारित सघन वेदना दिखी।

है, अभी मेरे उस चंद्रलोक में ताप है। अभी भी वहाँ गर्म निश्वास बह रही है। देवता के लिए मनुष्य नहीं, मनुष्य के लिए देवता हैं। उसकी उन दोनों आँखों की विशाल व्याकुलता उस दिन की उस आँधी के आलोक में व्यग्र पक्षी के समान उड़ चली थी। स्वर्ग की ओर नहीं, मानव हृदय नीड़ की ओर।

उस उत्सुक आकांक्षा उद्दीप्त दृष्टिपात को देखने के बाद से अशांत चित्त को स्थिर बनाए रखना मेरे लिए दुस्साध्य हुआ। तब केवल दूसरे की अपक्व कविता संशोधित कर तृप्ति नहीं मिलती‒एक किसी प्रकार का कार्य करने की चंचलता जगी।

तब मैंने संकल्प किया कि बंगाल में विधवा-विवाह का प्रचलन करने के लिए अपने पूरे प्रयत्नों का प्रयोग करूँगा। केवल भाषण और लेख ही नहीं, आर्थिक सहायता के लिए भी आगे बढ़ा।

नवीन मेरे साथ तर्क करने लगा; उसने कहा, “चिर वैधव्य में एक पवित्र शांति है, एकादशी की क्षीण ज्योत्स्नालोकित समाधि भूमि के समान एक विराट रमणीयता है, विवाह की संभावना मात्र से ही क्या वह नष्ट नहीं हो जाती है?”

ऐसी कवित्व भरी बातें सुनते ही मुझे क्रोध आता। दुर्भिक्ष में जो व्यक्ति सूखकर मर रहा है, आहार-पुष्ट व्यक्ति उसके पास यदि खाद्य की स्थूलता के प्रति घृणा प्रकट करता हुआ फूल की सुगंधि और पक्षी के गान से मुमूर्षु का पेट भराना चाहे तो वह कैसा लगेगा।

मैंने क्रोध से कहा, “देखो नवी, कलाकार यह कहता है, दृश्य की दृष्टि से टूटे पुराने घर का भी अपना एक सौर्न्य है। लेकिन उस घर को केवल चित्र की दृष्टि से देखने से नहीं चलता, उसमें रहना पड़ता है, इसलिए कलाकार जो भी कहे, उसकी मरम्मत की आवश्यकता है। वैधव्य को लेकर तुम तो दूर से अच्छी-ख़ासी कविता लिखना चाहते हो, लेकिन उसमें एक आकांक्षापूर्ण मानव हृदय अपनी विचित्र वेदना को लेकर वास कर रहा है, उसे स्मरण रखना हमारा कर्तव्य है।”

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